'महफ़िल दो चीज़ों ने लूटी- पीएम मोदी और वो चटाइयां'

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लखनऊ के रमाबाई आंबेडकर मैदान में प्रधानमंत्री के साथ क़रीब 50 हज़ार लोगों का योग करने का कार्यक्रम 80 मिनट का था, जो बारिश के चलते महज़ 40 मिनट में ही निपट गया.

लेकिन इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए लखनऊ के लोगों को जो 'बलिदान' देना पड़ा उसकी बानगी मुझे अपने टैक्सी ड्राइवर की बातों से मिल गई.

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युवा टैक्सी ड्राइवर ने बताया कि लोगों को इतना 'परेशान करके' क्या मिला? टैक्सी वाले ने जो और सवाल किए वो मेरे समेत तमाम लोगों के ज़ेहन में भी आ रहे थे.

उसका कहना था कि इनमें से कितने लोग ऐसे हैं जो इस योग को रोज़ अपने घर जाकर करेंगे? करोड़ों रुपये जो बहाए गए उससे हमें मतलब नहीं लेकिन दो दिन से सड़क जाम करके रखा हुआ है, किसलिए?

बहरहाल, ये सवाल तो उन लोगों को भी बेचैन कर रहे होंगे जो प्रधानमंत्री के साथ योग करने के लिए रात के दो बजे से ही आयुष विभाग की ओर से बांटी गई ख़ास टी-शर्ट पहने अपनी जगह सुनिश्चित करने के लिए मैदान में पहुंचने लगे थे.

लेकिन शायद इस 'अभूतपूर्व क्षण' की खुशी उनकी इस बेचैनी पर भारी पड़ रही थी.

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ये बात अलग है कि जब कुछ लोग योग करने के लिए बिछाई गईं रबड़ की चटाइयों को अपने साथ घर ले जाने लगे तो इसके लिए उन्हें पुलिस वालों से भले ही संघर्ष करना पड़ा हो, लेकिन लोगों को ये कहते हुए भी सुना गया कि 'आख़िर इस पूरे कार्यक्रम का 'आउटपुट' तो यही था, जो पाया वो सफल रहा, जो नहीं पाया- अब उसे क्या कहें?'

मान्यता है कि किसी आयोजन के बाद यदि इंद्रदेव अपनी खुशी ज़ाहिर कर दें यानी बारिश हो जाए तो वो 'महान' कार्य सफल हो जाता है लेकिन इस महान कार्य के शुरू होने से पहले ही इंद्रदेव ने भरपूर कृपा कर दी और ये कृपा कार्यक्रम के दौरान भी जारी रही.

खुले आसमान में बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं को भीगते हुए देख प्रधानमंत्री भी द्रवित हो गए और तय जगह की बजाय खुले आसमान के नीचे बच्चों के साथ आकर भीगते हुए योग करने लगे और मंच पर अपने साथियों- राज्यपाल राम नाइक, मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी और दोनों उपमुख्यमंत्रियों को उन्होंने अपने से दूर भेज दिया.

इससे पहले योग करने के लिए ज़मीन में बिछाई गई रबड़ की चटाइयों का इस्तेमाल लोग भीगने से बचने के 'जुगाड़' के रूप में कर चुके थे.

चूंकि बारिश जारी थी तो चटाइयों की जगह लोगों के सिर पर ही बनी रही, लिहाज़ा प्रधानमंत्री के साथ योग करने वालों की संख्या और जगह दोनों सीमित ही रहीं.

चटाइयों का ये सदुपयोग करने में पत्रकार बंधु भी पीछे नहीं थे. ख़ुद को और अपने कैमरों को बचाने की तमाम जद्दोज़हद कर रहे थे.

बारिश और व्यवस्था से परेशान लोग ये कहते हुए भी मिले कि योग तो शरीर को स्वस्थ रखने के लिए किया जाता है लेकिन यहां से लौटकर तो लोग बीमार ही होंगे, ये तय है.

फिर भी जोशीले लोगों और नारेबाज़ी करने वालों की संख्या भी कम नहीं थी.

इसका अंदाज़ा इस बात से लग रहा था कि मंच से एंकरिंग करने वाली महिला की कोई बात लाउडस्पीकर में भले ही समझ में न आ रही हो लेकिन किसी कविता या शेरनुमा लाइन के पढ़ते ही भीड़ से 'भारत माता की जय' के नारे त्वरित जवाब के रूप में गूंजने लगते.

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन 21 जून को होना था लेकिन कई दिन पहले से ही लखनऊ की सड़कें इस कार्यक्रम के विज्ञापनों से पटी पड़ी थीं.

लोगों से बड़ी संख्या में पहुंचने की अपील की जा रही थी, सरकारी दफ़्तरों में आने वालों से बाक़ायदा फ़ार्म भरवाए गए थे ताकि सबको सिक्योरिटी पास दिया जा सके.

आयुष मंत्रालय की ओर से लोगों को योग दिवस के लोगो बने हुए टी-शर्ट भी बांटे गए थे और इस टी-शर्ट को न सिर्फ़ योग करने वाले बल्कि वहां पहुंचे तमाम सरकारी अफ़सर भी धारण किए हुए थे.

कार्यक्रम साढ़े छह बजे से शुरू होना था और प्रधानमंत्री की सुरक्षा का मसला था, इसलिए लोग 'चार बजे तक पहुंचने' की सरकारी हिदायत का सख़्ती से पालन कर रहे थे.

यहां तक कि योग करने के लिए कार्यक्रम स्थल तक पहुंचाए जाने वाले बच्चों को डेढ़-दो बजे रात से ही वहां ले जाने की क़वायद होनी लगी जिसका असर ये हुआ कि कार्यक्रम के दौरान ही कई बच्चे बीमार हो गए.

सरकारी इंतज़ाम ऐसे थे कि जगह जगह लोग कार्यक्रम स्थल तक बेरोक-टोक पहुंचने के लिए पुलिस वालों से उलझते दिख रहे थे और इस उलझन में कभी पुलिस वाले बाज़ी मार रहे थे तो कभी उलझने वाले.

बताने के लिए तो वैसे काफी बातें हैं लेकिन इस 'विशाल कार्यक्रम' में बारिश के अलावा महफ़िल लूटने वाले सिर्फ़ दो ही थे- एक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरी वो चटाइयां.

प्रधानमंत्री भीगते बच्चों के पास पहुंचकर जब योग करने लगे तो टीवी चैनलों के रिपोर्टरों की पीटीसी इसी पर केंद्रित हो गई और अगले दिन शायद अख़बारों की हेडलाइन भी यहीं से निकले.

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वहीं रबड़ की चटाइयां तो ज़बर्दस्त उपयोगी साबित हुईं. मैदान में बैठकर योग करने के काम भले न आ सकी हों लेकिन बारिश से बचाने में भरपूर काम आईं.

यही कार्यक्रम के बाद जो लोग इन्हें अपने साथ ले जाने में सफल रहे, ज़ाहिर है, ये अगले साल तक घर में बैठकर उनके योग करने के काम में भी सकती हैं.

अगले साल फिर देखी जाएगी.

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