'नेपाली बोलते हैं लेकिन हम नेपाली नहीं'

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पहाड़ पर सबुछ ठीक था. लोग अपनी धुन मे मस्त थे. सैलानियों का आना जारी था और दार्जिलिंग के चौरस्ता पर खड़ी नेपाली कवि भानुभक्त आचार्य की आदमकद प्रतिमा गोरखाओं के अपनी मातृभाषा नेपाली को हमेशा की तरह याद दिला रही थी.

तभी पश्चिम बंगाल सरकार ने नौवीं कक्षा तक के छात्रों के लिए बांग्ला को अनिवार्य कर दिया.

इसका उत्तर बंगाल के पहाड़ी इलाकों में व्यापक विरोध हुआ. गोरखालैंड की धीमी पड़ चुकी आग इस निर्णय के बाद फिर से सुलग उठी है.

चौक बाजार पर 'हाम्रौ मांग गेरखाल्याण्ड' (हमारी मांग गोरखालैंड) का नारा लगा रहे प्रीतम कार्की अपनी मातृभाषा को लेकर काफ़ी संजीदा हैं.

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Image caption दार्जिलिंग के चौरस्ता पर खड़ी नेपाली कवि भानुभक्त आचार्य की आदमकद प्रतिमा

वे कहते हैं कि नेपाली सिर्फ उनकी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि मां के समान है.

तो सवाल उठता है कि भाषा का मुद्दा इतना महत्वपूर्ण क्यों है और दिक्कत कहां है?

प्रीतम कार्की ने कहा, " हां, हम नेपाली बोलते हैं. नेपाली ही पढ़ना-लिखना भी चाहते हैं. यह हमारी मातृभाषा है. लेकिन, हमारा घर दार्जिलिंग में हैं. यह शहर भारत की सरहद का हिस्सा है. नेपाली बोलने वाले हम जैसे लाखों लोग भारतीय हैं. और हमें भारतीय होने पर गर्व है."

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Image caption दार्जिलिंग से छपने वाले अखबारों की सुर्खियां

नहीं छोड़ सकते भाषा

दार्जिलिंग हिल्स में नेपाली अखबार हिमालय दर्पण के संपादक शिव छेत्री मानते हैं कि सरकार को बांग्ला भाषा की पढ़ाई अनिवार्य करने की बात करनी ही नहीं चाहिए थी.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "किसी भी जाति को ख़त्म करने के लिए न्यूक्लियर बम की जरूरत नहीं. उसकी भाषा खत्म कर दो. पहाड़ के लोग मानते हैं कि बांग्ला को अनिवार्य कर सरकार ने वहीं कोशिश की. इसलिए इसका व्यापक विरोध है. वैसे भी जब नेपाली भारत सरकार की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा है, तो पश्चिम बंगाल की सरकार बांग्ला क्यों थोपना चाहती है."

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फ़ैक्ट फाइल

भारत में नेपाली बोलने वाली सबसे बड़ी आबादी पश्चिम बंगाल में रहती है. 2001 की जनगणना के मुताबिक़, यहां 10.23 लाख लोगों की मातृभाषा नेपाली है.

अब यह संख्या 12 लाख से भी अधिक हो चुकी है. दार्जिलिंग से सटे सिक्किम राज्य के 62.6 फ़ीसदी लोग नेपाली बोलते हैं.

मतलब, इन दोनों राज्यों में नेपाली मातृभाषा के लोगों का बहुमत है. सन 1977 से ही यहां के लोगों ने नेपाली को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग की.

साल 1992 में भारत सरकार ने लंबी लड़ाई के बाद उऩकी मांग मान ली थी.

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बांग्लाभाषी बुद्धिजीवियों की राय

बांग्ला की चर्चित कॉलमनिस्ट शर्मिष्ठा बाग पहाड़ पर भाषा को लेकर चल रहे आंदोलन को जायज मानती हैं.

उन्होंने कहा कि भाषा के बहाने गोरखालैंड आंदोलन को ऑक्सीजन मिल गया है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपने निर्णय पर पुर्नविचार करना चाहिए.

शर्मिष्ठा बाग आगे कहती हैं, "70 के दशक मे पूर्वी बंगाल में भाषा को लेकर सबसे बड़ा आंदोलन हुआ. पाकिस्तान की सरकार उस इलाके में उर्दू थोपना चाहती थी. इसके ख़िलाफ़ लोग सड़कों पर उतरे और उनके विरोध के कारण पाकिस्तान का नक्शा ही बदल गया. क्योंकि, वे लोग बांग्ला बोलते थे. उर्दू उन्हें नहीं चाहिए थी. बांग्ला उनकी मातृभाषा थी. इसलिए गोरखालैंड की मांग और भाषा को लेकर पहाड़ के लोगों की संवेदना दोनों जायज है. इसका सम्मान करना चाहिए."

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सौतेला व्यवहार

दार्जिलिंग की एक्टिविस्ट और गोरखालैंड आंदोलन में बढ़कर हिस्सा लेने वाली कोमल गुरुंग कहती हैं कि नेपाली बोलने वाले लोगों के साथ पश्चिम बंगाल की सरकार हमेशा सौतेला व्यवहार करती रही है. गोरखा लोग भारत की सरहद पर जान गंवाते हैं और सरकार हमें सेकेंड सिटिज़न मानती है. यह ग़लत है.

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के प्रमुख सलाहकार और चर्चित स्तंभकार स्वराज थापा भी कहते हैं कि वो नेपाली बोलते हैं इसका मतलब यह नहीं कि हम दूरी भाषाओं का सम्मान नहीं करते. लेकिन, उन्हें जबरन कोई भाषा पढ़ने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता.

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स्वाराज थापा ने कहा, "अब आंदोलन शुरू हो चुका है. तो गोरखालैंड की मांग तक इसे जारी रखेंगे. यह अच्छी बात है कि भाषा इसमें अपना रोल अदा कर रही है."

भाषा के लेकर पहाड़ पर चल रहा आंदोलन तबतक चलेगा जब तक कि सरकार बीच का कोई रास्ता न निकाल ले.

क्योंकि, इस बार के आंदोलन को न केवल दार्जिलिंग बल्कि देश के दूसरे हिस्सों के बुद्धिजीवीयों का भी समर्थन मिल रहा है.

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