नज़रिया: बीजेपी के 'कोविंद चक्रव्यूह' में फंसा विपक्ष?

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भारतीय जनता पार्टी की ओर से रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद के लिए नमांकन दाख़िल कर दिया है.

भारतीय जनता पार्टी कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने के साथ लगातार ये कह रही है कि कोविंद दलित हैं.

दरअसल, दलित को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना कोई चैरेटी का काम नहीं है, बल्कि ये पूरी तरह राजनीति है.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी और संघ ने रणनीति बनाई थी जाटव बनाम गैर-जाटव की.

बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को ये अंदाज़ा हो गया था कि जाटव, मायावती का साथ नहीं छोड़ रहा है, ऐसे में उन्होंने गैर-जाटव दलितों को ये संदेश देने की कोशिश की बीजेपी उनकी हितैषी है.

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दलितों में ध्रुवीकरण की कोशिश

राष्ट्रपति चुनाव के लिए रामनाथ कोविंद को सामने लाना, गैर जाटव दलितों के ध्रुवीकरण की कोशिश है. और उनकी रणनीति इतनी क़ामयाब रही है कि विपक्ष भी उनके खेल में फंस गया.

विपक्ष ने जिन मीरा कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया है, वो भी जाटव ही हैं यानी भारतीय जनता पार्टी जिस तरह का ध्रुवीकरण चाहती है, वैसा ध्रुवीकरण हो गया है.

एक ओर जाटव उम्मीदवार है और दूसरा गैर-जाटव उम्मीदवार.

विपक्ष चाहता तो बीजेपी की रणनीति की हवा निकाल सकता था और इसके कई तरीक़े भी थे.

वो दक्षिण भारत से किसी दलित नेता को सामने ला सकता था, महाराष्ट्र के किसी दलित नेता को सामने कर सकता था या फिर गैर दलित उम्मीदवार को खड़ा कर सकता था.

ऐसे आदमी को खड़ा किया जा सकता था जिसकी ख़ासियत उनकी जातीय पहचान से बड़ी होती, लेकिन कांग्रेस का नेतृत्व ऐसा नहीं कर पाया.

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बीजेपी क्यों चाहती है दलितों में दरार?

यूपीए ने एक बार फिर बीजेपी को विभाजनकारी राजनीति चलाने का मौका दे दिया है.

ऐसी राजनीति वो दल करता रहा है, जो हारने की कगार पर हो, जिसके सामने अस्तित्व का संकट हो.

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भारतीय जनता पार्टी के सामने ऐसी कोई स्थिति नहीं है, केंद्र में बहुमत की सरकार और देश के अनेक राज्यों में उनकी सरकार है.

ऐसे में सवाल ये है कि भारतीय जनता पार्टी दलितों में विभाजन की राजनीति क्यों कर रही है?

इसे समझने के लिए हमें थोड़ा अतीत में जाना पड़ेगा और ये भी समझना होगा कि बीजेपी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहमति से ये कर रही है.

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गैर जाटव दलितों को एकजुट करने पर ज़ोर

जाटव पूरी तरह से हिंदू रीति-रिवाजों को नहीं मानते हैं. उनके यहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश की भी पूजा नहीं होती.

लिहाजा संघ को ये लगता है कि उसके दीर्घकालीन एजेंडे में 'भारत माता की जय' बोलने वाले और 'वंदे मातरम' गाने वालों की भीड़ गैर-जाटव दलित समुदाय से भी जुट सकती है, ये तबका हिंदू राष्ट्र के निर्माण में मददगार हो सकता है.

यही वजह है कि बीजेपी भी संघ की मुहिम को बढ़ावा दे रही है. ये एक तरह से व्यवहारिकता का तकाज़ा भी है.

बीजेपी के लोग तो सरकार में हैं, संघ के लोग क्या करेंगे.

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गैर-जाटवों को जुटाना और उन्हें कट्टर हिंदुत्व में ढालना, इस तरह उन लोगों को सांस्कृतिक हिंदू राष्ट्र की कल्पना को आगे बढ़ाने का मौका मिल जाएगा.

लेकिन इससे दलितों को कोई भला हो पाएगा, ये मुझे नहीं लगता.

जिन रामनाथ कोविंद के दलित होने की दुहाई दी जा रही है, वो कितने दलित हैं, इसको समझना होगा.

मैं बीते 27 साल से दलित समाज और दलित आंदोलन के लिए काम कर रहा हूं. जब उनका नाम सामने आया, तब तक मुझे मालूम ही नहीं था कि रामनाथ कोविंद हैं कौन?

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दलित कम संघ के प्रतिनिधि ज़्यादा

उन्होंने अब तक दलित समाज के लिए क्या किया है, दलित आंदोलन को किस तरह से मज़बूत किया है, दलितों की समस्याओं पर क्या किया है, ये जानने का हक मुझे ही नहीं, देश की जनता को है.

दरअसल, ये साफ़ है कि वह बीजेपी और संघ के प्रतिनिधि के तौर पर दलित समाज में आते जाते रहे हैं.

दलित समाज के प्रतिनिधि के तौर पर बीजेपी और आरएसएस में उनकी कोई भूमिका कभी नहीं रही.

(बीबीसी संवाददाता प्रदीप कुमार से बातचीत पर आधारित)

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