आधार नहीं तो टीबी इलाज के लिए नहीं मिलेगा कैश

Image caption शालू अपने बीमार पति और बच्चों को संभाल रहीं हैं

बड़े से गलियारे में एक माँ किसी तरह चार बच्चों को संभाल रही है लेकिन नज़र उसकी कहीं और है.

करीब 50 मीटर दूर वाले बड़े हॉल के सामने व्हीलचेयर पर एक शख़्स अपना नंबर आने का इंतज़ार कर रहा है.

हड्डियों का ढांचा भर रह गए इस व्यक्ति का नाम अशोक है और दो महीने से दिल्ली में भारत के प्रतिष्ठित राजन बाबू टीबी अस्पताल में इनका इलाज चल रहा है.

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अस्पताल के ओपीडी के पास से इन्हें निहार रही महिला, शालू, हर तीसरे दिन अपने बच्चों के साथ मंगोलपुरी से इन्हें बस में बैठाकर लाती है.

शालू ने बताया, "मेरी सबसे छोटी बच्ची में भी अब टीबी के लक्षण बताए जा रहे हैं. मेरे जेठ को टीबी हुआ था और वो तीन महीने इस अस्पताल में रह कर गए हैं. चिंता अपने पति की ज़्यादा है क्योंकि डॉक्टर कह रहे हैं उनका टीबी बुरे हाल में है."

Image caption राजन बाबू टीबी अस्पताल

कपड़े की एक फ़ैक्ट्री में पांच हज़ार महीने की नौकरी कर शालू अपने पति का इलाज भी करवा रहीं हैं और बच्चों का पेट भी पाल रही हैं.

सरकारी सहायता की जानकारी नहीं

लेकिन शालू को इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं है कि भारत सरकार ने सात दिन पहले ये अधिसूचना जारी कर दी थी कि अगर किसी टीबी मरीज़ के पास आधार कार्ड है तो उसके बैंक खाते में नकद सहायता भी मिलेगी.

शालू ने कहा, "अगर ये सही है तो मुझे बड़ी मदद मिल सकेगी. मेरे और पति दोनों के पास आधार कार्ड है लेकिन सरकार या कर्मचारियों को हमें बताना भी तो चाहिए."

भारत के सरकारी अस्पतालों में टीबी का इलाज मुफ़्त होता है और बिना आधार कार्ड दिखाए भी मुफ़्त रहेगा.

Image caption राहुल के पिता को आखिरी स्टेज का कैंसर है दूसरी तरफ़ माँ का इलाज जारी है.

लेकिन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ये निर्देश जारी किए हैं कि अगर किसी को सरकार से आर्थिक मदद चाहिए तो उसके लिए आधार कार्ड होना या उसके आवेदन की रसीद होना अनिवार्य है.

साल 2015 में आई विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 25 लाख से भी ज़्यादा टीबी के मरीज़ थे.

चिंता का बड़ा विषय ये भी रहा है कि टीबी का प्रकोप शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक फैला हुआ है.

ग्लोबल कोएलेशन ऑफ़ टीबी ऐक्टिविस्ट नामक अंतररराष्ट्रीय संस्था की ब्लेसीना कुमार के मुताबिक़ "आधार कार्ड की पहल अच्छी है लेकिन इस पर फ़ैसला सुनाना जल्दबाज़ी होगी".

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उन्होंने बताया, "अभी तक मरीज़ों के लिए कोई वित्तीय मदद नहीं थी. आधार दिखाने पर हर मरीज़ को अपने बैंक खाते में 3000 रुपए मिलेंगे ऐसा सरकार का कहना है. लेकिन ये इतना आसान नहीं है क्योंकि दिल्ली में बनने वाली स्कीमें गांवों में टीबी डॉट केंद्रों तक पहुँचते हुए बहुत बदल जाती हैं. वहां अक्सर मरीज़ों को राशन कार्ड या कोई भी पहचान न होने पर वापस भेज दिया जाता है. गरीब-पिछड़े इलाकों में आधार तो दूर वोटर आईडी भी बमुश्किल ही होता है."

हैरानी की बात यही दिखी कि दिल्ली के राजन बाबू टीबी अस्पताल में सात मरीज़ों और उनके परिवार में से किसी को सरकार के इस फ़ैसले के बारे में पता नहीं है.

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खजूरी के रहने वाले 19 वर्ष के राहुल यहाँ अपनी माता का इलाज करा रहे हैं और उनकी मदद के लिए उनकी मौसी और बुआ पहुँच जाती हैं.

राहुल के पिता को आखिरी स्टेज का कैंसर है दूसरी तरफ़ माँ के इलाज में पैसे की तंगी बढ़ती जा रही है.

उन्होंने कहा, "हम गरीबों के लिए कोई भी स्कीम का पैसा पहुँचता कहाँ है सर. पिछले चार दिनों में तीन बार यहाँ आए हैं किसी ने बताया तक नहीं कि आधार दिखाने पर आर्थिक मदद मिलेगी. थोड़ा दिलासा मिल जाता, भले पैसा मिले न मिले."

Image caption राजन बाबू टीबी अस्पताल

डॉक्टरों की भी राय है कि इस तरह के कदम की ज़रूरत थी लेकिन वे इसकी वजह दूसरी बताते हैं.

एम्स अस्पताल में टीबी मरीज़ों का इलाज करने के बाद डॉक्टर विग्नेश माथरम अब मद्रास मेडिकल कॉलेज में हैं.

उन्होंने कहा, "सरकार की ये स्कीम वैसे ही है जैसे जननी सुरक्षा योजना के तहत प्रेग्नेंट महिलाओं को थोड़ी आर्थिक मदद मिलती है. अभी तक टीबी के मरीज़ों को राशन कार्ड या पहचान पत्र इसलिए दिखाना पड़ता था ताकि उनेक घरों के पास वाले टीबी डॉट केंद्रों में उनका इलाज सुनिश्चित कराया जा सके. आधार कार्ड से पैसा भी सीधा उनके खातों में जाएगा और धांधली भी नहीं हो सकेगी."

इस बीच सरकारी अधिसूचना में कहा गया है कि असम, मेघालय और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में आधिकारिक गज़ट के प्रकाशन की तारीख ( 19 जून) से ये स्कीम प्रभावी हो जाएगी.

टीबी मरीज़ों के लिए काम करने वाली कार्यकर्ता ब्लेसीना कुमार बस एक ही बात से आगाह करती हैं.

"पहल बहुत अच्छी है लेकिन जब दिल्ली जैसी जगह लोगों को इसके बारे में जागरूक नहीं कराया जा सका है तो सोचिए किसी प्रदेश के सबसे पिछड़े इलाके में लोग इसे कब जान सकेंगे. सरकार को एक साथ ही सभी ज़िला प्रशासनों से इस पर लगातार जवाब मांगते रहने होंगे."

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