ममता बनर्जी से क्यों नाराज़ हैं विमल गुरुंग

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ममता बनर्जी कभी विमल गुरुंग की 'दीदी' हुआ करती थीं. वह साल-2011 के सितंबर महीने की 2 तारीख़ थी. चार साल तक चले गोरखालैंड आंदोलन के बाद पश्चिम बंगाल की विधानसभा ने गोरखा क्षेत्रीय प्रशासन (जीटीए) के गठन संबंधी बिल को पास किया.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसकी पहल की थी. तब गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता विमल गुरुंग और ममता बनर्जी के रिश्ते काफ़ी मधुर थे.

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समझौता

इस बिल के पास होने से पहले 18 जुलाई 2011 को केंद्र सरकार, पश्चिम बंगाल की सरकार और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बीच ऐतिहासिक समझौता हुआ था. सिलिगुड़ी के पास पिंटैल गांव में हुए समझौते की पहल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने की थी. उस वक़्त केंद्र में यूपीए की सरकार थी.

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समझौते के वक्त तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम और ममता बनर्जी भी मौजूद रहीं. तब भारत की राष्ट्रपति रहीं प्रतिभा पाटिल ने 7 मार्च 2012 को इस बिल पर अपनी सहमति दी.

14 मार्च को इसका नोटिफिकेशन हुआ और चुनावो के बाद 4 अगस्त 2012 को ममता बनर्जी की मौजूदगी में जीटीए के नवनिर्वाचित सदस्यों ने शपथ ली.

इसके बाद पहाड़ पर जश्न मना और विमल गुरुंग ने सार्वजनिक मंचों पर ममता बनर्जी की तारीफ की.

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वरिष्ठ स्तंभकार डॉ. कृपाशंकर चौबे मानते हैं कि उस वक्त ममता बनर्जी को लगा कि शायद अब पहाड़ की समस्या का हल निकल गया है. जबकि विमल गुरुंग इसे गोरखालैंड की तरफ बढ़ा एक मजबूत कदम भर मानते रहे. इनके बीच के रिश्तों की कड़वाहट की मूल वजह यही है.

दोनों नेताओं ने जीटीए की अपनी-अपनी परिभाषाएं तय कीं. तभी लग गया था कि यह रिश्ता लंबे समय तक ठीक नहीं रहने वाला. वैसे भी विमल गुरुंग गोरखा नेता मदन तमांग की हत्या के अभियुक्त हैं और सीबीआई इसकी जांच कर रही है.

मौजूदा हालात

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पिछले 8 जून से दार्जिलिंग हिल्स पर चल रहे आंदोलन के दौरान ममता बनर्जी और विमल गुरुंग ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ कई बयान दिए हैं.

विमल गुरुंग ने जीटीए की संवैधानिक व्यवस्था को नकार कर कहा कि मैं पहाड़ का मुख्यमंत्री हूं. यहां बंगाल का शासन नही चलेगा. वहीं ममता बनर्जी ने कहा कि वे जीटीए का ऑडिट कराएंगी और अगर कोई दोषी पाया गया तो उसके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी. बस यही बात विमल गुरुंग को चुभ गई.

कृपाशंकर चौबे ने बीबीसी से कहा, "ममता बनर्जी के इस बयान ने तमाम गोरखा नेताओं को नाराज़ कर दिया. इसी दौरान बंगाल के स्कूलों मे बांग्ला की पढ़ाई अनिवार्य करने की घोषणा और 8 जून को दार्जिलिंग में राज्य कैबिनेट की बैठक के आयोजन से परिस्थितियां काफ़ी बिगड़ गयीं. यह ममता बनर्जी की भूल थी. क्योंकि 44 साल बाद दार्जिलिंग में कैबिनेट मीटिंग का कोई औचित्य नहीं था. इसे टाला जा सकता था."

टीएमसी की जीत

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वरिष्ठ पत्रकार जयकृष्ण वाजपेयी मई में हुए निकाय चुनाव और गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट की कद्दावर नेता शांता छेत्री को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाने की ममता बनर्जी की पहल को भी विमल गुरुंग से उनके रिश्ते ख़राब होने की वजह मानते हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि मई मे हुए निकाय चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी ने पहाड़ी इलाके मिरिक की नगरपालिका पर कब्जा जमा लिया. इसे विमल गुरुंग नाराज़ हुए और इसे पहाड़ पर ममता बनर्जी की दखलअंदाजी माना. हालांकि बाक़ी की सभी सीटों पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने अपनी जीत दर्ज की.

ममता की चाहत

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दरअसल, पश्चिम बंगाल में अपार बहुमत हासिल कर चुकीं तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी पहाड़ पर विमल गुरुंग के वर्चस्व को तोड़ना चाहती हैं. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसी उद्देश्य से दार्जिलिंग की कई बार यात्राएं कीं.

शुरू में उन्हें लगा कि जीटीए के गठन का श्रेय लेकर वे दार्जिलिंग हिल्स मे अपने पैर जमा पाएंगी. लेकिन, विमल गुरुंग की पहाड़ पर लोकप्रियता और सियासी महात्वाकांक्षा के कारण वे इसमें सफल नही हो पाईं.

गोरखालैंड का भविष्य

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दार्जिलिंग के विधायक और गोरखा जन मुक्ति मोर्चा के नेता अमर सिंह राई विमल गुरुंग में गोरखालैंड का भविष्य देखते हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "विमल सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं. सुलझे हुए नेता हैं. वे जीटीए में सिर्फ इसलिए गए ताकि गोरखालैंड की मांग और मज़बूत हो. ममता बनर्जी की अपनी दिक्कतें हैं. वे कहती हैं कि बंगाल का बंटवारा नहीं होगा. विमल गुरुंग भी बंगाल का बंटवारा नहीं चाहते. वे चाहते हैं कि गोरखालैंड राज्य बने और इतिहास बताता है कि दार्जिलिंग कभी बंगाल का हिस्सा नहीं रहा. क्योंकि, दोनों की समझ एक-दूसरे के उलट है. इस कारण उनके रिश्ते अब ठीक नहीं रहे."

साल 2016 में ममता बनर्जी के दूसरे शपथ ग्रहण समारोह में मौजूद रहने वाले विमल गुरुंग क्या फिर से ममता बनर्जी के दोस्त बनेंगे. इस सवाल का जवाब देना कठिन है. गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता रोशन गिरि कहते हैं कि अब गोरखालैंड का निर्माण ही तमाम रिश्तों को तय करेगा.

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