#PehlaPeriod: 'जब पापा को बताया तो वो झेंप गए'

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कैसा लगता है जब 10-12 साल की एक बच्ची को अपनी फ्रॉक पर खून के धब्बे दिखाई देते हैं? कितना समझते हैं आप इसके बारे में?

वजाइना से निकलने वाले खून से सने कपड़े को धोना, सुखाना, अगली बार फिर उसे इस्तेमाल करना और अख़बार में लिपटे हुए पैड को छिपाकर बाथरूम में ले जाना...कैसे होते हैं ये अनुभव?

'माहवारी में मैं क्यों उस झोपड़े में रहूँ'

यही जानने के लिए हमने महिलाओं से उनकी पहली माहवारी का अनुभव साझा करने को कहा. इस सिरीज़ की पहली किस्त में अपने पहले पीरियड से जुड़े अनुभव शेयर कर रही हैं प्रीति झा और नूतन शर्मा.

प्रीति झा की जुबानी

पहले पीरियड का मेरा एक्सपीरियंस ऐसा है कि किसी को भी हंसी आ जाए. लेकिन मुझे ग़ुस्सा आता है. क्योंकि यह जानकारी न होने और मां के न समझ पाने की वजह से हुआ.

जब मुझे पहली बार पीरियड्स हुए तो मैंने किसी को बताया नहीं. मैं बहुत डरी हुई थी.

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Image caption प्रीति झा

पूरे दो दिन बीतने के बाद मैंने अपने घरवालों के सामने ही कह दिया,"पापा, अब मैं शायद नहीं बचूंगी क्योंकि मेरे पेशाब के साथ खून आ रहा है.''

ये सुनकर पापा झेंप गए और वहां से चले गए. फिर मम्मी ने दीदी को मेरे साथ भेज दिया और दीदी ने विस्तार से समझाया.

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नूतन शर्मा की जुबानी

मैं 9वीं क्लास में थी जब पहली बार पीरियड्स आए. चूंकि मुझे पहले से जानकारी थी इसलिए घबराई नहीं. उस वक़्त मुझे इंदिरा अवॉर्ड्स में डांस परफॉर्म करना था. तब बहुत ब्लीडिंग होती थी और कपड़े गंदे हो जाते थे.

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Image caption नूतन शर्मा

मुझे उस डांस से निकाल दिया गया क्योंकि मैं अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाती थी और पूछे जाने पर उसकी वजह भी नहीं बता पाई थी.

छोटी भी थी और लापरवाह भी, बहुत बुरा अनुभव था वो. बहुत संघर्ष करना पड़ा था, आज भी करना पड़ता है.

मेट्रो में जाते वक्त मैं कई बार दर्द और परेशानी की वजह से रो पड़ी हूं. अब भी परेशानी होती है, अब भी मुझसे कपड़े गंदे हो जाते हैं.

कोई देख लेगा, सिर्फ इस बात की टेंशन लेना फिज़ूल लगता है लेकिन समाज ऐसा ही है.

नीरू सिसोदिया की ज़ुबानी

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उस वक़्त मैं 12 साल की थी, थोड़ा-बहुत समझ तो आ गया था लेकिन असल में क्या होता है, पता नहीं था.

मम्मी ने समझाया कि कैसे कपड़ा रखना है और क्या करना है (गांवों में आज भी कपड़ा ही इस्तेमाल करते हैं).

अक्सर कपड़ा अपनी जगह से हिल जाता था और ख़ून लग जाता था. इसलिए मम्मी कपड़े को पैंटी के साथ सिल देती थीं. कपड़ा धोने के लिए हर बार सिलाई तोड़नी पड़ती थी.

और दिमाग में कहीं से आ गया था कि जिनको पीरियड्स नहीं आते उनको बेटा नहीं होता. मैंने मम्मी से कहा था कि मुझे बेटा नहीं चाहिए, फिर क्यों आ रहे हैं पीरियड्स? फिर सोचा था कि यूट्रस ही निकलवा देना है.

ख़ून भी इतना बहता था और आठ दिन तक 'कार्यक्रम' चलता था और बीस दिन बाद फिर लौट आता था. बहुत रोना-धोना पागलपंथी हुई, फिर धीरे-धीरे समझ आ गया कि ये ज़िंदग़ी का एक हिस्सा है. कितना भी नफ़रत कर लो, इससे भाग नहीं पाओगे.

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