ईदगाह की देखभाल कर रहा है एक हिंदू परिवार

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करीब 100 सालों से कानपुर के ईदगाह की देखभाल, चौकीदारी और साफ-सफाई का ज़िम्मा एक हिन्दू परिवार के ज़िम्मे है.

ईदगाह ही सफाई में लगे बबलू उस परिवार की तीसरी पीढ़ी के हैं.

ईदगाह की ज़िम्मेदारी सबसे पहले बबलू के दादा पर थी. फिर उनकी मां ने ईदगाह की देखभाल की. अब ईदगाह की देखरेख बबलू कर रहे हैं.

ईदगाहों में सिर्फ ईद और बकरीद के दिन नमाज़ पढ़ी जाती है.

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भूखे को मिला ईदगाह का सहारा

बबलू बताते हैं, "मेरे दादा का नाम महावीर था. वो बस्ती ज़िले के रहने वाले थे और गरीब घर से थे. 15 साल की उम्र में वह घर से भागकर कानपुर आ गए."

वो कहते हैं, "कानपुर का बस अड्डा तब घंटा घर में हुआ करता था. वे पांच दिन भूखे काम तलाशते रहे."

"फिर उनकी मुलाकात ईदगाह के उस वक्त के मुत्तवल्ली फ़ख़रुद्दीन से हुई जो उन्हें ईदगाह ले आये और एक पनाह दी. मेरे दादा को ईदगाह में माली और साफ़ सफाई का काम सौंपा गया."

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बबलू ने कहा, "ईद से पहले मेरे दादा ईदगाह को साफ़ और नमाज़ियों के लिए तैयार किया करते थे."

महावीर को छत और आमदनी का ज़रिया मिला तो उन्होंने शादी कर ली और उनके चार बच्चे हुए. उनकी झोपड़ी धीरे-धीरे एक पक्के मकान में तब्दील हो गयी.

पिता का काम अब रहे हैं बेटे

जो ईदगाह के देख-रेख और साफ़-सफाई का काम महावीर ने शुरू किया वो काम आज बबलू कर रहे हैं. बबलू 45 साल के हैं.

ईद से करीब 15 दिन पहले बबलू ईदगाह की सफाई का काम शुरू कर देते हैं. जैसे-जैसे त्योहार नज़दीक आने लगता है, साफ़ सफाई के लिए और भी मज़दूर लगाए जाते हैं जो बबलू की देख-रेख में काम करते हैं. और ईद के दिन ईदगाह पूरी तरह से नमाज़ियों के लिए तैयार हो जाता है.

कानपुर के बीचों-बीच बेनाझाबर इलाके में स्थित यह ईदगाह ऊंचे, लम्बे और हरे पेड़ों से भरा है. ईदगाह में आम, इमली, नीम, नींबू और कटहल के करीब 600 पेड़ हैं.

"आप यहां जितने भी बड़े पेड़ देख रहे हैं, सबमें दादा के ही लगाए हुए हैं," बबलू कहते हैं.

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महावीर की मृत्यु 1984 में हुई. उसके बाद के ईदगाह के देखरेख, चौकीदारी और सफाई का काम बबलू की माँ दौलत देवी करने लगीं. .

दौलत देवी ने 30 साल तक ईदगाह को संभाला.

"अब बढ़ती उम्र की वजह से ज़िम्मेदारी मुझसे साफ़ सफाई का काम हो नहीं सकता है," दौलत देवी ने कहा. "करीब पांच साल पहले तक मैं ही सब काम किया करती थी."

किसी को मेरे हिंदू होने पर आपत्ति नहीं

अब ज़िम्मेदारी बबलू के ऊपर है. ईदगाह में ही बड़े हुए बबलू वहां के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं.

बबलू कहते हैं, "मुझे जो मिला है मई उसे पूरी ईमानदारी से निभाता हूं. पर और हिन्दुओं की तरह मैं भी हिन्दू हूं. मैं अपने त्योहार अपनी तरह से मनाता हूँ. उसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है."

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वे कहते हैं, "ईद के दिन मैं ख़ुफ़िया विभाग वालों के साथ रहता हूं और देखता हूं कि कोई असामाजिक तत्व ईदगाह में न घुस आये.

कानपुर ऐसा शहर है जहां कई बार सांप्रदायिक दंगे हुए हैं. पर न कभी दौलत देवी ने ईदगाह छोड़ने की सोची और न ही कभी किसी ने उनको वहां से हटने कहा.

ईदगाह समिति के सदस्य मोहम्मद फकरे आलम कहते हैं कि कानपुर की ईदगाह करीब 150 साल पुरानी है और उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी ईदगाह है.

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Image caption मोहम्मद फकरे आलम

वे कहते हैं, "हिन्दू-मुस्लिम एकता की ये सबसे बड़ी मिसाल है कि बबलू, एक हिन्दू, ईदगाह की देखभाल करता है. आज तक न हमें उनसे तकलीफ़ हुई है और न उन्हें हम लोगों से कोई दिक्कत है."

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