नज़रिया: हिंदुओं के 'सैन्यीकरण' की पहली आहट है जुनैद की हत्या

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दिल्ली से बल्लभगढ़ होते हुए मथुरा जा रही ट्रेन में 16 साल के जुनैद की हत्या भीड़ के हाथों अब तक की गई इस तरह की सभी हत्याओं से अलग है.

ये घटना हिंदुओं के सैन्यीकरण की पहली आहट है और इससे पता चलता है कि पिछले तीन साल में भारत में भीड़ के दिमाग़ को किस क़दर बदल दिया गया है.

ऐसा पहली बार हुआ है कि यात्रियों से भरे रेलगाड़ी के डिब्बे में चार लड़कों - जुनैद, हाशिम, मोईन और शाकिर - को बिना क़सूर मार-मार लहूलुहान किया जा रहा हो और डिब्बे में बैठे लोग हमलावरों को उकसा रहे हों. ख़बरों के मुताबिक़ ये बात गिरफ़्तार किए गए एक आरोपी ने ख़ुद स्वीकार की है.

'जो हमारे साथ हुआ वो किसी के साथ ना हो'

ईद की ख़रीददारी कर ट्रेन से जा रहे नौजवान की हत्या

सिर्फ़ मुसलमान जैसी दाढ़ी थी इसलिए

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इससे पहले आम लोग ऐसी हिंसक वारदात की अनदेखी करके आगे बढ़ जाया करते थे क्योंकि वो किसी झंझट में नहीं फंसना चाहते थे. ऐसा भी शायद पहली बार हुआ है कि चार लोगों पर क़ातिलाना हमला सिर्फ़ इस वजह से किया गया कि वो मुसलमानों जैसी दाढ़ी रखे थे और गोल टोपी पहने हुए थे.

उन पर न गोमांस रखने या छिपाने का आरोप लगाया गया, न गाय-भैंसों की तस्करी का. न वो आतंकवादी थे, न बच्चे उठाने वाले गिरोह के सदस्य और न ही चोर-उचक्के या अपराधी.

दिल्ली के सदर बाज़ार से ईद की ख़रीदारी कर रेलगाड़ी में बैठकर ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर जा रहे ये तीन भाई और उनका एक दोस्त भारतीय गणतंत्र के नागरिक थे.

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सभी इसी देश के नागरिक थे

अभी तक मिली जानकारी के मुताबिक़ उनको घेरकर मारने वाले भी उन्हीं की तरह न अपराधी थे, न पेशेवर लुटेरे, न डाकू या बदमाश.

वो सब भी भारतीय गणतंत्र के नागरिक और वोटर थे. और रेलगाड़ी के उस भीड़ से सटे डिब्बे में बैठकर अपने सामने हो रही हत्या के चश्मदीद गवाह भी इसी गणतंत्र के नागरिक ही थे.

जुनैद की हत्या हिंदू समाज के एक उग्रवादी समाज में बदलते जाने का पहला स्पष्ट निशान है. ये गणतंत्र के नागरिकों को एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा करने की राजनीति का असर है जिसमें नागरिकों का एक हिस्सा दूसरे हिस्से को सिर्फ़ उसके मुसलमान होने या मुसलमान जैसा दिखने के 'अपराध' की सज़ा देने की हिम्मत जुटा पाता है.

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ये हिंदुत्व के सिद्धांतकार विनायक दामोदर सावरकर के एक पुराने सपने के साकार होने का पहला निशान भी है. सावरकर का नारा था - पूरी राजनीति का हिंदूकरण करो और सभी हिंदुओं का सैन्यीकरण करो.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी ने राजनीति के हिंदूकरण की जो मुहिम शुरू की थी उसका नतीजा है कि काँग्रेस जैसी पार्टी भी बहुमत के दबाव में आकर बार बार नरम हिंदुत्व का सहारा लेती है.

क्या ये हिंदुओं का सैन्यीकरण है?

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जब हालात किसी भड़की हुई भीड़ के नियंत्रण में हो तो ऐसा हो सकता है.

गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान सोनिया गाँधी ने नरेंद्र मोदी को एक बार मौत का सौदागर कहा जिसके बाद से कांग्रेस वहां आज तक अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाई है.

उस झटके के बाद सोनिया गांधी या राहुल गांधी ने फिर कभी गुजरात के मुसलमान विरोधी दंगों को राजनीतिक मुद्दा बनाने की भूल नहीं की.

दो साल पहले जब दिल्ली के पास दादरी में अख़लाक़ को भीड़ ने उनके घर से खींच कर हत्या कर दी थी तो राहुल गाँधी सहित विपक्षी पार्टियों के कई नेताओं ने अख़लाक़ के घर पहुँचकर उनके परिवार वालों से हमदर्दी जताई.

यहां तक कि केंद्र सरकार के संस्कृति राज्य मंत्री महेश शर्मा भी वहाँ गए हालाँकि उन्होंने अख़लाक़ की हत्या को "दुर्घटना" बताया था.

पर उसके बाद ऐसी हत्याओं पर धीरे धीरे विपक्ष की आत्मा ने कलपना कम कर दिया. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में अख़लाक़ की मातमपुर्सी करने वाली पार्टियों का सफ़ाया हो गया.

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Image caption पहलू ख़ान के रिश्तेदार (फ़ाइल फ़ोटो)

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ये राजनीति के हिंदूकरण का नतीजा है कि मुख्यधारा की कथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ भी मुसलमानों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं की निंदा करते समय नापतोल कर बोलने को मजबूर हैं.

ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान में कोई पार्टी या व्यक्ति मज़हब के बारे में सार्वजनिक तौर पर खुलकर अपनी राय ज़ाहिर करने से पहले दो बार सोचता है कि कहीं उसका हश्र भी सलमान तासीर जैसा न हो जाए.

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तेज़ हो गई है 'हिंदुओं के सैन्यीकरण' की प्रक्रिया

भारतीय राजनीति के हिंदूकरण की प्रक्रिया के साथ साथ तीन साल पहले नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही 'हिंदुओं के सैन्यीकरण' की प्रक्रिया भी तेज़ हो गई है हालांकि इसकी शुरुआत बरसों पहले हो चुकी थी.

पर इस प्रक्रिया का असर अब सामने आने लगा है.

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हिन्दुओं के सैन्यीकरण का ये अर्थ क़तई नहीं है कि हर हिंदू फ़ौजी वर्दी पहनकर लाम पर जाने को तैयार होगा. लेकिन हर हिंदू ख़ुद को देश का सिपाही मानने लगेगा और एक सैनिक की तरह 'देश के दुश्मनों' को ख़त्म कर देने के जज़्बे से लबरेज़ होगा.

ये हिंदू सैनिक मोहल्ले के शाखा प्रमुख से लेकर बड़े बड़े मंत्रियों और यहाँ तक कि देश के प्रधानमंत्री तक से एक ही संदेश हासिल करता है: आंतरिक दुश्मनों से मातृभूमि की रक्षा करनी है.

आंतरिक दुश्मन के तौर पर संघ के जन्मदाताओं ने मुसलमानों को (ईसाइयों और कम्युनिस्टों को भी) बहुत पहले से चिन्हित कर रखा है.

राजनीतिक तौर पर कम्युनिस्ट इस स्थिति में नहीं हैं कि उनको एक बड़ा ख़तरा माना जाए. लेकिन बौद्धिक लिहाज़ से वो अब भी आरएसएस के लिए एक बड़ा ख़तरा बने हुए हैं.

फिलहाल ईसाई हिंदू राष्ट्रवादी जूनून के निशाने पर नहीं दिख रहे. भारत में ईसाइयों पर हमला होने से सरकार की अंतरराष्ट्रीय छवि धूमिल होने की आशंका बनी रहती है.

लेकिन मुसलमानों पर निशाना बनाए जाने में इस तरह का कोई ख़तरा नहीं है क्योंकि अमरीका से यूरोप, मध्य पूर्व और ऐशिया तक में इस्लामी दुनिया एक उथल-पुथल से गुज़र रही है. और ज़्यादातर मामलों में इस हालत के लिए खुद मुसलमानों को ही ज़िम्मेदार माना जाता है.

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बदल रही है भारतीय समाज की सोच

दिल्ली से ईद की ख़रीदारी करके लौट रहे जुनैद और उसके भाइयों को घेर कर बेइज़्ज़त करके पीटने और अंत में चाक़ू मारकर जुनैद की हत्या करने वाले अपनी नज़र में 'देशद्रोहियों' से बदला ले रहे थे. उनका परोक्ष सैन्यीकरण इसी काम के लिए किया गया था.

जुनैद के भाई हाशिम ने हमले का जो ब्यौरा दिया है वो पूरे भारतीय समाज की सोच में लाए जा रहे बदलाव की कहानी कहता है.

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हाशिम ने बीबीसी से कहा, "हमसे कहा गया तुम मुसलमान हो, देशद्रोही हो, गोमांस खाते हो. फिर एक आदमी ने मेरी टोपी पर हाथ मारकर उसे गिरा दिया. मेरी दाढ़ी को पकड़ने की भी कोशिश की गई. और इस दौरान वहां मौजूद भीड़ हमलावरों को उकसाती रही."

यही वो घटना है जो जुनैद की हत्या को लिंचिग की ऐसी दूसरी घटनाओं से अलग करती है. चार लड़कों को मार डालने की कोशिश कर रहे लोगों को रोकना तो दूर डिब्बे में मौजूद मुसाफ़िर उन्हें उकसा रहे थे.

जुनैद की हत्या पिछली ऐसी हत्याओं से इस मायने में भी अलग है कि हमलावरों को इस बार मार पीट करने या हत्या का कोई 'कारण' बताने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी.

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क़ातिल भीड़ के लिए जुनैद और उनके साथ सफ़र कर रहे लड़कों का मुसलमान होना ही उन्हें मार डालने का पर्याप्त कारण था.

जबकि पिछली हत्याओं के लिए हमलावरों ने बाक़ायदा कारण गिनवाए थे - दादरी के अख़लाक़ ने फ्रिज में गोमांस छिपाया था; अलवर में पहलू ख़ान को इसलिए पीट पीट कर मार डाला गया क्योंकि वो गायों की तस्करी करता हुआ पकड़ा गया; झारखंड के लातेहार में मोहम्मद मज़लूम (35) और इनायतुल्ला खान (12) को इसलिए पेड़ से लटका कर मार डाला गया क्योंकि वो गाय बैल ख़रीद कर ले जा रहे थे और स्थानीय गोरक्षक समिति को शक हुआ कि जानवरों को क़त्ल के लिए ले जाया जा रहा है.

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राजस्थान में कथित गोरक्षकों के हमले में पहलू खां की मौत के बाद उनके घर में गम का माहौल है.

गहरे पैठ चुकी है नफ़रत

बल्लभगढ़ की घटना बताती है कि भारतीय समाज में मुसलमानों या मुसलमान जैसे दिखने वाले लोगों के प्रति फैलाया गया शक अब कितने गहरे पैठ चुका है.

इससे यह भी पता चलता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुसलमानों की टोपी पहनने से इनकार करने, मोदी और उनके मंत्रियों का राष्ट्रपति की ओर से दी गई इफ़्तार दावत का बहिष्कार करने और बजरंग दल के 'आत्मरक्षा' शिविरों में आयोजित नाटकीय दंगों में आतंकवादियों और देशद्रोहियों को मुसलमानों की तरह दिखाए जाने का निहितार्थ क्या है.

देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे हुए लोगों के इन फ़ैसलों से गली मोहल्लों में फैले हुए 'गोरक्षकों' की टोली को साफ़ संदेश मिल रहा होता है साथ ही 'देशद्रोहियों' को चिन्हित करने का आसान फ़ॉर्मूला भी.

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पर अगर जुनैद की हत्या हिंदुओं के सैन्यीकरण का नतीजा है तो फिर कश्मीर में मस्जिद के बाहर तैनात पुलिस अफ़सर मोहम्मद अयूब की 'लिंचिंग' को क्या समझा जाए?

साफ़ है कि जिस तरह दिल्ली-मथुरा ट्रेन में भीड़ ने जुनैद और उनके भाइयों की पहचान 'देशद्रोही' के तौर पर की ठीक उसी तरह श्रीनगर की नौहट्टा मस्जिद के बाहर इकट्ठा कश्मीरी मुसलमानों की भीड़ ने डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित की शिनाख़्त 'इंडियन एजेंट' के तौर पर की और उन्हें ख़ुद 'सज़ा' देने का फ़ैसला कर लिया.

कश्मीर हो या बल्लभगढ़ - समाज का सैन्यीकरण हमेशा ख़तरनाक नतीजों की तरफ़ ले जाता है.

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