किस ओर जा रहा है कश्मीर का समाज?

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Image caption दिवंगत मोहम्मद अयूब पंडित

शब-ए-क़दर की रात को इस्लामी कैलेंडर में सबसे पवित्र रात माना जाता है. मुसलमान मानते हैं कि इसी रात को पैगंबर मुहम्मद को क़ुरान की आयतें नाज़िर हुई थीं.

श्रीनगर के नौहट्टा में जामा मस्जिद में इस मौक़े पर एक बड़ी प्रर्थना सभा का आयोजन किया जाता है.

मस्जिद के भीतर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के चेयरमैन और मस्जिद के मौलवी मीरवाइज़ उमर फ़ारूख़ लोगों से कह रहे हैं कि आज की रात सारे गुनाह माफ़ हो जाते हैं, अल्लाह से की सभी प्रार्थना स्वीकार होती है और सभी पर अल्लाह की मेहर बरसती है.

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उसी मस्जिद के बाद 100 से 200 युवा लाठियों, लोहे की छड़ों और पत्थरों से अपने ही एक साथी - एक इंसान के - कपड़े उतरवा कर उन्हें पीटे जा रहे हैं.

आख़िर हुआ क्या था?

उन्हें पीट-पीट कर उनकी हत्या कर दी गई और उसके बाद उनके शव को पास ही के एक नाले में फेंक दिया गया. वहां मौजूद सैंकड़ों लोगों ने ये नज़ारा देखा लेकिन किसी ने कुछ नहीं कहा.

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हालांकि प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो जब मार-पीट शुरू हुई तब कुछ लोगों ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन जान लेने पर आमादा भीड़ ने उन्हें चुप करा दिया.

पूरी रात चलने वाली इस बरकत की रात में जो लोग नमाज़ पढ़ने आ रहे थे उनकी सुरक्षा के लिए डीएसपी अयूब पंडित श्रीनगर के जामिया मस्जिद के बाहर ही तैनात थे.

अयूब पंडित की मौत ने पूरी घाटी को सकते में झकझोर कर रख दिया. सवाल उठा कि आख़िर कश्मीर का समाज किस दिशा में जा रहा है. कुछ लोगों ने घटना की निंदा की लेकिन अधिकतर लोग दबी आवाज़ों में ही बातें करते रहे.

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Image caption दिवंगत पुलिस अधिकारी मोहम्मद अयूब पंडित

अयूब पंडित की मौत कैसे हुई इसे ले कर कई कहानियां कही जा रही हैं.

कुछ लोगों का कहना है कि अयूब तस्वीरें ले रहे थे जब कुछ युवाओं को उन पर शक़ हुआ और उन्होंने उन पर हमला किया. अयूब में अपने बचाव में गोलियां चलाईं जिसके बाद भीड़ ने उन पर हमला किया और उनकी हत्या कर दी.

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कुछ लोगों का कहना है कि वो तस्वीरें नहीं ले रहे थे. वो इधर-उधर चक्कर लगा रहे थे जिस पर कुछ युवाओं को उन पर शक़ हुआ. युवाओं ने उनसे पूछताछ की और उनके पुलिस अधिकारी होने के बारे में पता चलने के बाद उनके साथ हाथापाई की. जवाब में अयूब ने अपनी पिस्टल निकाली और गोलियां चलाईं लेकिन भीड़ के आगे कुछ अधिक न कर सके.

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Image caption दिवंगत मोहम्मद अयूब पंडित की मौत के गम में उनकी पत्नी

बातें जो भी हो रही हों, सच्चाई यही है कि सबसे पवित्र मानी जाने वाली बरकत की रात को जब मस्जिद के भीतर मौलवी लोगों को धर्मोपदेश दे रहे थे मस्जिद के बाहर हिंसक भीड़ ने एक व्यक्ति ने की हत्या कर दी.

भारतीय और पाकिस्तानी पाठकों के लिए भीड़ की किसी व्यक्ति को पीट-पीट कर मार देना शायद बड़ी बात नहीं होगी, लेकिन कश्मीर के लिए यह बड़ी घटना होगा.

हिंसक होता समाज

बीते कुछ समय में भीड़ की हिंसा जैसी कुछ घटनाएं हुई हैं, कुछ लोगों की जान भी गई है. लेकिन कभी भी कोई हत्या जानबूझ कर नहीं की गई जैसा कि अयूब पंडित के मामले में.

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सच्चाई यह है कि कश्मीर का समाज धीरे-धीरे ज़्यादा से ज़्यादा हिंसक हो रहा है. लगभग पिछले तीन दशकों से आपस में झगड़ रहे गुटों ने समाज को अमानवीय बना दिया है और अब यह ऐसे मुकाम तक पहुंच गया है जहां कुछ लोग पीट-पीट कर एक व्यक्ति की जान ले लेते हैं और लोग मूकदर्शक बने रहते हैं.

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वो युवा जिन्होंने अयूब पंडित की हत्या करने वाले वहीं युवा हैं जो आम तौर पर पुलिस और सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकते नज़र आते हैं. अक्सर ऐसा देखा गया है कि ये पत्थरबाज़ किसी भी चीज़ पर हमला कर सकते हैं, यहां तक ​​कि आम नागरिकों को भी नहीं बख़्शते.

इन पत्थरबाज़ों को अलगाववादी नेताओं के ज़रिए समाज में सुरक्षा मिली हुई है और वो गुंडागर्दी में शामिल रहने के लिए खुद को आज़ाद महसूस करते हैं. उन्होंने ख़ून का स्वाद चख लिया है और उन्हें किसी भी हिंसक गतिविधि में शामिल होने के लिए एक लाइसेंस मिल गया है. उनके लिए हिंसा उनके जीवन का आदर्श बन गई है.

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Image caption दिवंगत अयूब पंडित को सलामी देते जवान

इन युवाओं की मानसिक स्थिति को देखें तो पता चलता है कि वो खुद सुरक्षाबलों के कड़े रुख का सामना करते हैं और खुद भी हिंसा का शिकार हैं. अब वो इतने कठोर हो गए हैं कि यही भावना उन्हें किसी इंसान को मारने के लिए उकसाती है.

इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को एक भयानक ट्रेंड की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है जिसका एक समाज के तौर पर कश्मीरी पर घातक असर होगा.

इस एक घटना ने पूरे कश्मीर को सकते में डाल दिया है. यहां तक कि मीरवाइज़ उमर फ़ारुख को भी कड़े शब्दों में इसकी आलोचना करनी पड़ी.

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