खाना, पानी, इंटरनेट भी नहीं...कैसे करेंगे रिपोर्टिंग!

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'सामने एटीएम है. कैश निकाल लीजिए. दार्जिलिंग में नहीं मिलेगा....यहां पूड़ी-सब्जी मिलेगी. खा लीजिए. वहां खाना भी नहीं मिलेगा...इंटरनेट कैफे से प्रेस का स्टिकर प्रिंट कर लीजिए. इसे लगाकर ही आगे बढ़ेंगे...'

सिलिगुड़ी मे टैक्सी ड्राईवर विकास साहा की इन हिदायतों से खीझ हुई. फिर भी उसकी बात मान ली. तब पता नहीं था. दार्जिलिंग पहुंचा तो मुझे उसकी हिदायतों का मतलब समझ आया.

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मेरे दार्जिलिंग पहुंचने से कुछ घंटे पहले वहां बेमियादी बंद की घोषणा की जा चुकी थी. दरअसल, पुलिस ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा प्रमुख विमल गुरुंग के पाटलेबास स्थित दफ़्तर को सील कर दिया था. बंद की घोषणा इस कार्रवाई के बाद की गयी. जगह-जगह प्रदर्शन होने लगे. मीडिया कवरेज से नाराज़ लोगों ने एक टीवी चैनल की गाड़ी भी फूंक दी.

पर्यटकों में होटल छोड़ने की होड़ थी. तभी मैं पहले से बुक कराए अपने होटल पहुंचा.

मैनेजर ने कहा, "लोग चेक आउट कर रहे हैं. आपका पैसा फुल रिफंड हो जाएगा. चेक-इन मत करिए."

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काफी अनुरोध के बाद वह मुझे रखने को राज़ी हुआ. मैनेजर ने लंच के साथ ही डिनर का भी आर्डर देने को कहा. क्योंकि, उनके सारे कर्मचारी शाम चार बजे से पहले ही घर लौटना चाह रहे थे.

बंद का पहला दिन (15 जून)

गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर आहूत बेमियादी बंद का वह पहला दिन था. पूरा शहर बंद था. चाय-पान की दुकानें भी नहीं खुली थीं. बैंक बंद. एटीएम बंद. सिर्फ दवा की दुकानें खुली थीं. पूरे माहौल मे तनाव था. अनिश्चितता थी. कानों में 'वी वांट गोरखालैंड' की आवाज़.

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मुझे पाटलेबास जाना था लेकिन कोई टैक्सी नहीं. मनमाने चार्ज और मिन्नतों के बाद एक टैक्सी वाला मिला. उसी ने बाकी के दिनो में भी मेरा साथ दिया.

पाटलेबास पहुंचे तो वहां सीआरपीएफ की तैनाती थी. ज़ी न्यूज की गाड़ी अभी तक जल रही थी.

दार्जिलिंग प्रेस गिल्ड के बाहर स्वराज थापा मिले. मैं उन्हें पत्रकार के तौर पर जानता था. यहां आकर पता चला कि वे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा से भी जुड़े हैं.

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दूसरा दिन (16 जून)

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फिर से दिन में ही डिनर का आर्डर. हाउस किपिंग की स्टाफ ने कमरे की सफाई कर दी. इस दौरान बातचीत हुई.

सुशीला लेप्चा नाम था उनका. उन्होंने कहा, "इस बार गोरखालैंड लिए बगैर नहीं मानेंगे. भूखे रहेंगे लेकिन आंदोलन करेंगे."

फिर से लंच के साथ ही डिनर का आर्डर. मैं चौक बाजार पहुंचा तो पुलिस थाने के पास हजारों लोगों की लाइन लगी थी. सब पर्यटक थे, जिन्हें पुलिस रेसक्यू करा कर अपनी बसों से सिलिगुड़ी भेज रही थी. लोगों का प्रदर्शन उस दिन भी जारी रहा.

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तीसरा दिन (17 जून)

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गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने शांति जुलूस निकालने का आह्वान किया था. इसके लिए हजारों लोग दार्जिलिंग पहुंचने लगे, तो पुलिस ने जगह-जगह बैरिकेटिंग लगा दी.

शांति मार्च के दौरान सिंगमारी में हिंसा हुई और इसमें तीन आंदोलकारियों की मौत हो गयी. दो दर्जन से भी अधिक पुलिसवाले भी घायल हुए.

मेरे होटल का शटर गिरा रहा. आज से हाउसकिपिंग बंद. मेरे सामने गंदे कमरे में ही रहने की मजबूरी थी.

पानी की बोतलें खत्म हो गयीं. सो, टंकी का पानी पीकर ही रहने की विवशता. खाना भी लिमिटेड. लंच और डिनर एक साथ सर्व कर दिया गया. मतलब, हर रात ठंडा खाना खाने की मजबूरी.

चौथा दिन (18 जून)

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मैनेजर ने कहा कि आज कमरा खाली कर दीजिए. पुलिस ने प्रेसवालों को भी रखने से मना कर दिया है. मैंने अनुरोध किया तो वह खाना नहीं खिलाने की शर्त पर रहने देने को राज़ी हुआ. मुझे पता था कि बाहर कुछ भी खाने को नहीं मिलेगा लेकिन कोई उपाय नहीं था. सो, मैंने मैनेजर की शर्त मान ली.

शांति जुलूस के दौरान मारे गए लोगों की लाशों के साथ हजारों लोगों ने जुलूस निकाला. दोपहर में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गयीं.

मेरे होटल का वाई-फाई काम कर रहा था. सो अपनी रिपोर्ट भेज सका. रात में किचन में खुद गया, तो डिनर मिला. आज लंच नहीं मिल सका था.

पांचवा दिन (19 जून)

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सुबह नींद खुलते ही वही मैनेजर. सर, आज तो खाली करना ही होगा होटल. पार्टी (गोरखा जनमुक्ति मोर्चा) का आदेश है. टंकी का पानी भी खत्म हो गया है. पानी नहीं आ रहा. कैसे रखें आपको. आज वाई-फाई ने भी काम करना बंद कर दिया.

थोड़ी देर के लिए मेरे मोबाइल पर नेट का सिग्नल मिला, तो मैंने अपनी रिपोर्ट भेजी.

बाहर मुख्यमंत्री के पुतले के साथ उनके मुर्दाबाद के नारे थे.

आज खाना नहीं मिला. एक दवा की दुकान से जूस खरीद लाए. वही पीकर सोना पड़ा.

छठा दिन (20 जून)

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होटल खाली करने का भारी दबाव था. इंटरनेट कंप्लीट बंद था. वाई-फाई भी नहीं. अब दार्जिलिंग छोड़कर वहां जाने की मजबूरी थी, जहां इंटरनेट सिग्नल मिले. मैंने कोलकाता में अपने एक एडीजी मित्र से बात की.

उन्होंने एसपी को कहा. एसपी ने डीएसपी और डीएसपी ने ओसी को. नतीज़ा शून्य निकला. सिलिगुड़ी जाने के लिए पुलिस गाड़ी उपलब्ध नहीं करा पाई.

दस हज़ार से मोल-तोल करते हुए एक टैक्सी वाला आठ हज़ार रुपए लेकर सिलिगुड़ी चलने पर राजी हुआ.

शाम होने से पहले मैं सिलिगुड़ी में था. यहां इंटरनेट था, पानी की ठंडी बोतलें और खाना भी. मैंने चैन की सांस ली.

सातवां दिन (21 जून)

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मैं वापसी के लिए तैयार था. यह जानते हुए भी कि दार्जिलिंग में लोग आज भी वैसे ही रह रहे होंगे.

आज इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध सात और दिनों के लिए बढ़ा दिया गया. केबल टीवी का प्रसारण बंद करा दिया गया.

इसके बावजूद पहाड़ पर लोग आज भी नारे लगा रहे हैं - "वी वांट गोरखालैंड."

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