एक ज़िले से निकले बीजेपी के दो मुख्यमंत्री पर ज़मीन आसमान का है अंतर

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उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री, योगी आदित्यनाथ और त्रिवेंद्र सिंह रावत एक ही ज़िले के हैं. दोनों एक ही पार्टी से जुड़े हैं, दोनों ने मुख्यमंत्री के तौर पर अपने 100 दिन पूरे कर लिए हैं. इन समानताओं का असर इनकी कामकाज शैली पर कितना है, यहीं आंकने की कोशिश इस रिपोर्ट में है.

पहले बात योगी आदित्यनाथ की, उनकी सरकार ने 19 मार्च 2017 को शपथ लेने के बाद सौ दिन में अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखने का वादा किया था.

योगी आदित्यनाथ ने न सिर्फ़ मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद काफी तल्ख़ी से कथित तौर पर भ्रष्ट और बेईमान अधिकारियों और अपराधियों को राज्य से बाहर जाने की सलाह दी थी बल्कि इस बात को वो कई बार दोहराते भी रहे हैं.

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सरकार ने सौ दिन में अपने करने के लिए कुछ लक्ष्य भी निर्धारित किए थे. ये लक्ष्य उन्हीं वादों में से थे जो चुनाव के वक़्त पार्टी के घोषणा पत्र का हिस्सा थे और जिन्हें लेकर भारतीय जनता पार्टी पिछली सरकार को लगातार घेरा करती थी.

इन दावों में क़ानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा, किसानों की कर्ज़ माफ़ी, बिजली और सड़क व्यवस्था जैसे कई मुद्दे थे और इन्हें लागू करने के लिए सरकार ने फ़ौरी तौर पर आदेश भी जारी किए.

राज्य सरकार का दावा है कि उसने सौ दिन का जो एजेंडा तय किया था, उसे काफ़ी हद तक पूरा किया है.

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Image caption कैबिनेट मंत्री श्रीकांत शर्मा

दावे और हकीक़त

राज्य सरकार के प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री श्रीकांत शर्मा बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "हमारी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि तो यही है कि पहली बार किसी सरकार ने सौ दिन के का काम का लेखा-जोखा जनता के सामने रखने का लक्ष्य तय किया. जिन क्षेत्रों के लिए लक्ष्य तय किया गया उसे लगभग पूरा कर लिया गया है. जो कुछ थोड़ा बहुत बचा है उसे अगले कुछ दिनों में पूरा कर लिया जाएगा. इसके बाद हम छह महीने और फिर साल भर का एजेंडा तय करेंगे."

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श्रीकांत शर्मा ऊर्जा मंत्री भी हैं और दावा करते हैं कि हम अपने घोषणा पत्र के वादे के मुताबिक गांवों को 18 घंटे और शहरों को 24 घंटे बिजली दे रहे हैं. लेकिन न सिर्फ़ विपक्षी दल बल्कि आम नागरिक भी इन दावों से इत्तिफाक़ नहीं रखते. हालांकि ग्रामीण इलाक़ों में बिजली व्यवस्था सुधरने की बात कई लोग कर रहे हैं.

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कानून व्यवस्था रहा बड़ा मुद्दा

सरकार बनने के बाद ही मुख्यमंत्री की सक्रियता को देखते हुए अधिकारियों ने भी बीजेपी के घोषणा पत्र के आधार पर फ़ैसले लेने शुरू कर दिए.

महिला सुरक्षा के लिए गठित एंटी रोमियो दस्ते का गठन इनमें से एक था जिसके लिए सरकारी आदेश जारी होने से पहले ही अधिकारियों ने इस पर कार्रवाई शुरू कर दी.

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लेकिन सौ दिन के भीतर ही न सिर्फ़ ये सक्रियता कमज़ोर पड़ने लगी बल्कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा और छेड़छाड़ की ख़बरें आम सी हो गईं. यही नहीं, क़ानून व्यवस्था को लेकर सरकार को विपक्षी दल लगातार घेर रहे हैं.

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं, "बीजेपी सरकार हर मोर्चे पर फ़ेल रही है. जिस तरह से केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री सिर्फ़ बातों से सब कुछ ठीक होने अच्छे दिन आने की याद दिलाते हैं, उसी प्रकार उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भी है. न तो किसानों का कर्ज़ माफ़ हुआ, न गन्ना किसानों को उनका भुगतान मिला, क़ानून व्यवस्था बद से बदतर हो गई है."

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Image caption समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी

शोर बहुत, काम कम हुआ

योगी सरकार ने सौ दिन के एजेंडे में 15 जून तक सभी सड़कों को गड्ढामुक्त करने का भी लक्ष्य तय किया था लेकिन ख़ुद सरकार के मुताबिक 15 जून तक महज़ 63 प्रतिशत सड़कें ही गड्ढामुक्त हो पाईं.

हालांकि जानकारों का कहना है कि जिन सड़कों को गड्ढामुक्त किया भी गया है वो मानसून की बरसात शायद ही झेल पाएं.

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लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "सरकार को ये समझना होगा कि पिछली सरकार को कोसने भर से काम नहीं चलेगा बल्कि कुछ करके दिखाना होगा. कुछ करने की तो छोड़ दीजिए, सरकार ने एक वादा ये भी किया था कि पिछली सरकार के कार्यों की जांच कराई जाएगी. जांच का ढिंढोरा पीटा भी गया लेकिन अभी तक गोमती रिवर फ्रंट से लेकर अवैध खनन तक एक भी मामले की जांच में सरकार कोई बहुत सार्थक कदम नहीं उठा पाई है."

योगेश मिश्र कहते हैं कि सरकार ने कर्ज़ माफ़ी का फ़ैसला चुनावी वादे के दबाव में ले तो लिया लेकिन केंद्र सरकार से मदद ने मिलने के कारण उसे अमल में लाने का तरीक़ा नहीं जुटा पा रही है क्योंकि इतनी बड़ी धनराशि के इंतज़ाम की कोई योजना नहीं बनाई गई है.

सरकार सौ दिन के कामकाज पर 25 जून को ही श्वेत पत्र जारी करने वाली थी लेकिन इसे भी दो दिन के लिए बढ़ा दिया गया है. अब 27 जून को सभी विभागों को श्वेत पत्र जारी किया जाएगा.

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ख़ामोशी से काम करते उत्तराखंड के सीएम

उत्तराखंड में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार ने अपने सौ दिन पूरे कर लिए हैं. प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने वाली बीजेपी के लिए ये सौ दिन सहज तो नहीं रहे हैं.

हालांकि मुख्यमंत्री रावत ख़ामोशी से काम करना पसंद करते हैं लेकिन इन सौ दिनों में ऐसा अभूतपूर्व कार्य नहीं हुआ जिनसे ये दिखे कि वास्तव में सरकार, बड़े भारी कर्ज़ में डूबे राज्य को बदहाली से निकालने के लिए जी जान एक किए हुए हो.

हां ये जरूर है कि जहां पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में इस दौरान हिंसा, लूटपाट, और अपराध की घटनाओं में यकायक तेजी देखी गई और एंटी रोमियो स्क्वाड और कथित गो रक्षकों का हिंसक उत्पात दिखा, वैसी घटनाएं उत्तराखंड में नहीं हुईं और राज्य में नई सरकार के आने के बाद कमोबेश शांति का माहौल बना रहा.

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पिछले मामले सुलझाने में ही बीत गए 100 दिन

वो आंदोलन था महिलाओं का- शराब के ठेकों के विरोध में पहाड़ से लेकर मैदानी इलाकों तक. सरकार की आबकारी नीति ने लोगों को आक्रोश में भर दिया है और इसके लिए वो बीजेपी और कांग्रेस दोनों को जिम्मेदार मानते हैं.

आलम ये है कि आंदोलन भी जारी है और शराब बेचने की सरकार की कवायद भी. शांत सौम्य छवि वाले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पूर्ववर्ती सरकार की शराब नीति को घेरते हुए सत्ता में आए हैं लेकिन वो अब खुद ही बाड़ के उस तरफ हैं जहां आंदोलनों की आवाजें जरा कम सुनाई देने लगती हैं.

बहरहाल उनका कहना है कि सौ दिन तो वे पाप धुलने में बीत गए जो पहले की सरकार ने किए थे.

यानी पुरानी सरकार के फैसले पलटे जा रहे हैं, नई प्राथमिकताएं तय की जा रही हैं, विकास के नये निशान उकेरे जा रहे हैं और धीमी ही सही जैसा कि मुख्यमंत्री कहते हैं एक रफ्तार तो पकड़ी है.

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लोकायुक्त ठंडे बस्ते में

मुख्यमंत्री रावत कहते हैं, "हमारी रफ़्तार लंबी दौड़ वाली है. मेरा ये मानना है कि विकास में सबसे बड़ी बाधा है भ्रष्टाचार. हमें इस पर चोट करनी है और हमने इसके संकेत दे दिए हैं. "

इतने भी संकोची और शर्मीले नहीं कि वो कोई क्रेडिट ही न लें. लिहाजा वो अपनी पीठ थपथपाते हैं भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टॉलरेंस के मामले पर और अवस्थापना विकास पर.

भ्रष्टाचार पर सख्ती की मिसाल के लिए उनके पास उधमसिंह नगर में नेशनल हाईवे 74 के निर्माण में हुए घोटाले की जांच का आदेश है.

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी जांच से पहले लीगल ओपिनियन लेने की सलाह दे चुके हैं इसलिए मुख्यमंत्री के पास राज्य स्तरीय एसआईटी से जांच कराने के सिवाय कोई चारा न था. दूसरा मामला लोकायुक्त के गठन का है.

सरकार बनते ही जितने तूफानी जोरशोर से लोकायुक्त बिल सदन में रखा गया उतने ही हैरान कर देने वाले सन्नाटे में उसे प्रवर समिति को सौंप दिया गया. प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस इसे ही मुद्दा बना रही है.

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Image caption इंदिरा हृदयेश और हरीश रावत (फ़ाइल फ़ोटो)

कांग्रेस का आरोप

कांग्रेस नेता इंदिरा हृदयेश चुनौती देते हुए कहती हैं, "हम तो भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में आगे रहना चाहते हैं, आईए पिछली सभी सरकारों के भ्रष्टाचार उजागर करके उसपर कमेटी गठित करें, उसे सीबीआई के हवाले करें."

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मुख्यमंत्री रावत के पास भले ही सौ दिन का कोई चमकदार चार्ट न हो लेकिन आगे के लिए उनके मुताबिक उनके पास एक व्यापक विज़न है.

केंद्र से भी उसे सौगातें रह रह कर मिल ही रही हैं जैसे देहरादून के एक बड़े हिस्से को स्मार्ट सिटी का दर्जा, चारधाम हाईवे, रेल संपर्क आदि.

पर्यटन के 13 ठिकानों का विकास, इस साल के अंत तक हर गांव को बिजली 2019 तक पूर्ण साक्षरता, 2022 तक हर बेघर को आवास मुहैया कराने का इरादा इस सरकार का है.

लेकिन कांग्रेस को लगता है कि नौ दिन चले अढाई कोस की तर्ज पर बीजेपी सरकार तो सौ दिन में बस अढ़ाई कोस ही चल पाई है. उसका ये भी मानना है कि सरकार और संगठन के अंतर्विरोध उसे कमजोर कर देंगे.

हालांकि कांग्रेस की ये आशंका उसके अपने लिए तो सच ही निकली. बहरहाल सरकार से मुकाबले के लिए, इंदिरा हृदयेश अपनी पार्टी में नयी एकजुटता और गद्दी का मोह न करने की हिदायत देती हैं.

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योगी और रावत में फ़र्क

अगर उत्तर प्रदेश के मुकाबले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कार्यशैली देखें तो ज़मीन आसमान का अंतर है. रावत मीडिया से बात करते हैं, इंटरव्यू देते हैं, लेकिन भारी भरकम अंदाज़ में नहीं बोलते.

वे कहीं भी नहीं पहुंच जाते. इंतजार और मशविरा उनके बुनियादी लक्षण हैं. अपने अफसरों पर भरोसा करते हैं और बहुत संभल कर बोलते हैं.

अपशगुन जैसे अंधविश्वासों को नहीं मानते इसीलिए शपथ लेते ही चंद रोज में उस अद्भुत वास्तुकला वाले लेकिन कथित रूप से शापित सरकारी आवास में सपरिवार रहने चले गए जहां जाने की हिम्मत पिछले तीन मुख्यमंत्रियों ने नहीं की.

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