सिख महिलाएं क्यों पहनती हैं पगड़ी ?

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Image caption पलबिंदर कौर शेरगिल

कनाडा के ब्रिटिश कोलंबियाई सुप्रीम कोर्ट में पहली बार किसी पगड़ीधारी महिला सिख को जज बनाया गया है. 48 वर्षीय पलबिंदर कौर शेरगिल की नियुक्ति पर कनाडा में रहने वाले भारतीय प्रसन्न हैं.

उन्हें वहां मानव अधिकारों की एक नामी वकील माना जाता है. ख़बरों के मुताबिक, वह पंजाब में ही जन्मी थीं और चार साल की उम्र में उनका परिवार कनाडा चला गया था.

भारत में भी उनके रिश्तेदारों में ख़ुशी और जश्न की ख़बरें छपी हैं. इस बीच एक महिला सिख के पगड़ी धारण करने पर इसके नियमों को लेकर जिज्ञासा भी ज़ाहिर की जा रही है.

ज़ाहिर है, क्योंकि ज़्यादातर सिख पुरुष पगड़ी पहने नज़र आते हैं, लेकिन पगड़ी पहनने वाली महिलाओं की संख्या उतनी नहीं हैं.

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रेहत मर्यादा

सिखों की सबसे बड़ी संस्था, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के सदस्य जसविंदर सिंह एडवोकेट कहते हैं, '1699 में दसवें गुरु गोविंद सिंह ने अपने पंज प्यारों को अमृत और बाणा दिया था. तब उन्होंने उनके लिए जो वेशभूषा तय की थी, उसमें पगड़ी भी शामिल थी.'

दल खालसा के प्रवक्ता कंवरपाल सिंह बताते हैं कि अकाल तख्त ने सिखों के लिए जो नियम बनाए हैं, उसके मुताबिक, सारे अमृतधारी सिख पुरुषों और महिलाओं को दस्तार पहननी ज़रूरी है. सिखों की 'रेहत मर्यादा' में 'क्या करें और क्या नहीं' का पूरा ब्योरा दिया गया है और यह पुरुष-महिला दोनों पर समान रूप से लागू होता है.

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महिलाओं के लिए पगड़ी के ऊपर चुन्नी

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मान्यता है कि सिख रेहत मर्यादा को गुरुओं के निर्देश, दर्शन और सिख सिद्धांत के आधार पर लिखा गया है.

जसविंदर सिंह एडवोकेट कहते हैं कि सभी सिखों के लिए पगड़ी पहननी जरूरी है क्योंकि यह सिखों की धार्मिक संस्कृति का हिस्सा है. महिलाओं के सवाल पर उन्होंने कहा कि आदर्श तौर पर प्रत्येक सिख महिला को पगड़ी के ऊपर चुन्नी पहननी चाहिए, हालांकि पगड़ी की लंबाई और रंग के बारे में कोई सीमा नहीं है.

उन्होंने कहा कि एक सिख के लिए पगड़ी आस्था का प्रतीक है, जो उसका सम्मान, आत्मसम्मान, हौसला, आध्यात्मिकता दिखाती है और जिन्होंने अमृत चखा है, उन्हें पांचों 'क' (केश, कड़ा, कंघा, कच्छा, कृपाण) धारण करने होते हैं और अपने बाल नहीं कटाने होते हैं. उन बालों को उन्हे पगड़ी से ढंकना होता है.

उनका कहना है कि हाल के दिनों में बहुत सारी महिलाएं भी पगड़ियां पहन रही हैं. हालांकि वह ये भी कहते हैं कि एसजीपीसी और दूसरी सिख संस्थाएं पगड़ी के महत्व को अच्छे से प्रसारित करने में नाकाम रही हैं.

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