नज़रिया: 'अभी देश बदल रहा है, उसके बाद आगे बढ़ेगा'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इमेज कॉपीरइट SANJAY KANOJIA/AFP/Getty Images

मामूली सरकारें देश चलाती हैं, महान सरकारें देश को बदलती हैं. मोदी सरकार का कम-से-कम एक नारा पूरी तरह सच है--'मेरा देश बदल रहा है...'

मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर 'इंडियन एक्सप्रेस' में भाजपा के मीडिया सेल के प्रभारी अनिल बलूनी ने सच ही लिखा था कि "जनादेश सरकार या पीएम बदलने के लिए नहीं, बल्कि देश को बदलने के लिए मिला है."

देश को बदलना और चलाना दोनों एक साथ नहीं हो सकते, चलती गाड़ी की मरम्मत नहीं हो सकती, उसे रोककर ही उसके कल-पुर्जे बदले जा सकते हैं.

सरकार देश ठीक से चलाएगी, धीरज रखिए, पहले उसे वैसा देश बना तो लेने दीजिए जैसा वो चाहती है. देश को बदलने का जनादेश आपने दिया था या नहीं, ये 2019 में बताइएगा, अभी तो देखिए कि सरकार ने कितना कुछ बदल दिया है.

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सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी

मोदी सरकार में रक्षा मंत्री रहे मनोहर पर्रिकर ने कुछ दिनों पहले कमाल की बात कही थी, उनका कहना था कि सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी ये है कि उसने लोगों की सोच बदल दी है.

उन्होंने कहा कि "सोच बदल गई है और अब वो समय निकट है जब देशद्रोहियों और राष्ट्रवाद का विरोध करने वालों को जनता जवाब देगी."

पर्रिकर सही कह रहे हैं, जनता जवाब दे रही है वो जिसे भी 'देशद्रोही' मानती है, बदली हुई सोच के तहत ही उससे निबट रही है.

ख़बरें बता रही हैं कि वल्लभगढ़ के जुनैद को मारने वालों ने उसे पहले देशद्रोही, पाकिस्तानी और गौमाँस खाने वाला कहा, उसके बाद अपना 'जवाब' दिया.

देश की सोच वाक़ई बदल गई है कि जुनैद के क़त्ल पर चुप्पी रही. जिनकी सोच नहीं बदली है उन्होंने मुँह खोला तो उनसे बदली हुई सोच वालों ने पूछा- "कश्मीर में अयूब पंडित की हत्या पर चुप क्यों हो?"

फिर उन्होंने जवाब भी दिया, "क्योंकि तुम हिंदुओं को बदनाम करना चाहते हो, मुसलमान-परस्त हो और कश्मीरी देशद्रोहियों की तरफ़दारी करते हो."

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'साथ है, विश्वास है, हो रहा विकास है'

सरकार देश को बदलने में पूरी तरह जुटी हुई है. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बदल रहा है, 'विपक्ष मुक्त' लोकतंत्र इससे पहले संसार में कहीं देखा-सुना नहीं गया है.

पुरानी परंपराएँ बदली जा रही हैं, राष्ट्रपति के अंतिम इफ़्तार का मान रखना ज़रूरी नहीं रह गया है, मंत्री उसका बायकॉट कर रहे हैं, प्रधानमंत्री तो इफ़्तार बंद कर ही चुके हैं.

सोच बदल रही है, मुसलमानों का तुष्टीकरण बंद हुआ, हिंदुओं का तुष्टीकरण जैसी कोई चीज़ नहीं होती.

'सबका साथ, सबका विकास', ये नारा भी बदल चुका है. अब ये--'साथ है, विश्वास है, हो रहा विकास है'--हो गया है.

जब मुसलमानों का साथ नहीं है तो उनके विकास की बात क्यों की जाए, इस नारे में ग़लती थी, उसे दुरुस्त कर लिया गया है, जिसको विश्वास है, उसी का विकास होगा.

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संस्कारी सिनेमा

जीवन के हर क्षेत्र में बदलाव हुआ है. सिनेमा संस्कारी हो गया है, यहाँ तक कि सिनेमा देखने का ढंग भी बदल गया है, शो शुरू होने से पहले मन में देशभक्ति की भावना भरने के बाद ही सनी लियोनी के ठुमकों पर झूमा जा सकता है.

देश के विकलांग अब दिव्यांग बनकर कितने ख़ुश हैं, ये किसी ने कभी जानने की कोशिश नहीं की. इसी तरह गाय अगर बोल सकती तो बताती कि वह सरकार से कितनी ख़ुश है.

शिक्षा की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, यूनिवर्सिटियों के बीच होड़ लगी है कि कौन कितना ऊँचा झंडा लहरा सकता है.

संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने विश्वविद्यालयों के कुलपतियों पर ख़ास ध्यान दिया है, विशेष सम्मेलन करके उन्होंने विज्ञान में वेद-पुराण जोड़ने की सलाह भी दी है.

ये कोई मामूली बदलाव है कि छात्र अपने प्रोफ़ेसरों को बता रहे हैं कि उन्हें देशभक्ति के पाठ पढ़ना कितना पसंद है, उनकी पसंद का सम्मान न करने वाले प्रोफ़ेसरों के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद तो है ही.

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सेना का डर

मीडिया भरोसेमंद हो गया है यानी ऐसा मीडिया जिस पर सरकार भरोसा कर सकती है, जिन पर भरोसा नहीं कर सकती उनको अज्ञात शक्तियों ने ख़रीद लिया है इसलिए स्पष्ट कर दिया गया है कि वो बिकाऊ मीडिया है.

देश की सेना बदल रही है, सेनाध्यक्ष और अधिकारी अब प्रेस कॉन्फ्रेंस करने लगे हैं, जनरल लोगों को बता रहे हैं कि जनता के मन में सेना का डर होना चाहिए.

देश का वर्तमान ही नहीं, इतिहास भी बदल रहा है, अकबर को गिराकर महाराणा प्रताप को उठाया जा रहा है, देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह चाहते हैं कि जिन राणा प्रताप के नाम के आगे महा जोड़कर उन्हें पहले ही महाराणा कहा जाता है, अब उन्हें 'महान महा-राणा' कहा जाए.

सड़कों और संस्थानों के नाम बदल रहे हैं, औरंगज़ेब रोड और योजना आयोग अब अतीत हो चुके हैं, ठीक वैसे ही जैसे एक हज़ार रुपए का नोट.

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देश बदलने में जुटी सरकार

बीसियों योजनाओं के नाम बदल गए हैं, 'निर्मल भारत' अब 'स्वच्छ भारत' हो गया है. वैट बदल जाएगा, जीएसटी हो जाएगा.

कहाँ तक बताएँ, गालियाँ भी बदल गई हैं--सेकुलर, वामपंथी, लिबरल और बुद्धिजीवी अब नई गालियाँ हैं.

इसी तरह उग्र, कट्टर और हिंदुत्ववादी अब सराहना के शब्दों में बदल दिए गए हैं.

अभी एक चीज़ है जो बदली जानी बाक़ी है वो है भारत का संविधान, जिसमें से सेकुलर काटकर हिंदू जोड़ा जाना है, बाक़ी सारे बदलाव उसी लक्ष्य को बिना बाधा के हासिल करने के लिए किए जा रहे हैं.

सरकार अभी देश को बदलने में जुटी है, उससे देश चलाने की माँग करने वाले राजनीति से प्रेरित हैं.

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