सलाहुद्दीन को 'आतंकवादी' क़रार देने से कश्मीर में क्या बदल जाएगा?

सैयद सलाहुद्दीन इमेज कॉपीरइट ARIF ALI/AFP/Getty Images

ट्रंप प्रशासन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमरीका दौरे की पूर्व संध्या पर भारत प्रशासित कश्मीर के सशस्त्र नेता मोहम्मद यूसुफ शाह उर्फ सैयद सलाहुद्दीन को 'अंतरराष्ट्रीय आंतकवादियों की सूची में शामिल' कर दिया है.

अमरीकी विदेश मंत्रालय का कहना है कि सैयद सलाहुद्दीन ने सितंबर, 2016 में कश्मीर विवाद के शांतिपूर्ण समाधान का रास्ता रोकने और घाटी में आत्मघाती हमलावरों को प्रशिक्षण देने और इसे भारतीय फौज़ की कब्रगाह में बदलने का संकेत दिया था.

अमरीका के इस कदम से कश्मीर में जारी 'अलगाववादी आंदोलन' पर तीन महत्वपूर्ण असर हो सकते हैं.

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कश्मीरी 'अलगाववादी आंदोलन' ग्लोबलाइज़ हो सकता है

हिज़बुल मुजाहिदीन, जिसके पुराने मुखिया सलाहुद्दीन ही हैं, कश्मीरियों का स्थानीय सशस्त्र संगठन है. हिज़बुल ने 27 साल के दौरान कभी किसी ग्लोबल एजेंडे का जिक्र नहीं किया.

यह संगठन संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के अनुसार कश्मीर में जनमत संग्रह चाहता रहा है और उसने अलकायदा और इस्लामिक स्टेट दोनों से दूरी बनाए रखी है.

बीते कुछ सालों में घाटी में चंद कश्मीरी प्रदर्शनकारी इस्लामिक स्टेट का झंडा फहराने लगे तो सलाहुद्दीन ने लोगों से 'आईएस लहर' से दूर रहने की अपील की थी.

इस वजह से कश्मीर में सक्रिय हिज़बुल मुजाहिदीन के कुछ कमांडर सलाहुद्दीन से नाराज भी हुए.

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वर्तमान में ज़ाकिर मूसा जैसे चरमपंथियों ने कश्मीर के अलगाववादी आंदोलन के सेकुलर किरदार पर सवाल उठाया. उनकी नज़र में कश्मीर की लड़ाई सियासी नहीं, इस्लाम के लिए है. और विरोध प्रदर्शनों में पाकिस्तानी नहीं इस्लामी परचम लहराया जाना चाहिए.

सलाहुद्दीन को 'वैश्विक आतंकवादी' करार दिए जाने के बाद कश्मीरी चरमपंथी स्थानीय एजेंडे की जरूरत पर सवाल उठा सकते हैं और कश्मीर की लड़ाई को सीरिया और अफगानिस्तान में जारी सशस्त्र संघर्ष के रास्ते पर ले जाने की कोशिश कर सकते हैं.

इस तरह कश्मीर का सशस्त्र संघर्ष, जिसका किरदार और एजेंडा अब तक स्थानीय रहा है, संभव है कि वे एक वैश्विक जिहादी नेटवर्क का हिस्सा बनने की कोशिश करना चाहें.

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यह सवाल है उस कश्मीरी नौजवान का, जिसे मानव ढाल के तौर पर जीप के आगे बांध दिया था.

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कश्मीर के सशस्त्र संघर्ष से भारतीय सेना अब तक असरदार तरीके से निपटती रही है.

जाहिर है इस दौरान मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले भी सामने आए हैं. अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने इसके लिए भारत की आलोचना भी की थी.

इसलिए जब कश्मीर के सबसे पुराने चरमपंथी संगठन के लीडर को 'ग्लोबल आतंकवादी' करार दिया जाता है तो भारत को चरमपंथ के खिलाफ लड़ाई में अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल जाएगा.

लेकिन इसके साथ ही कश्मीर में हो रही हिंसा को अब 'ग्लोबल टेरर' के विस्तार के तौर पर देखा जा सकता है. इस तरह एक तरफ सशस्त्र समूह 'वैश्विक जिहाद के नाम पर सक्रिय होगा, और दूसरी तरफ भारतीय कार्रवाई का वैश्विक औचित्य होगा.

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हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की मुश्किलें

अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का पुराना स्टैंड रहा है कि वह कश्मीर समस्या का 'शांतिपूर्ण' समाधान चाहता है लेकिन सार्वजनिक तौर पर पर वे 'चरमपंथी आंदोलन' को महान निवेश करार देते हैं और सुरक्षा बलों के साथ झड़पों में मारे गए चरमपंथियों की अंत्येष्टि में हुर्रियत नेता भाग लेते रहे हैं.

इस तरह हुर्रियत का कश्मीर के सशस्त्र आंदोलन के साथ एक 'जैविक' संबंध रहा है लेकिन अमरीकी विदेश मंत्रालय की घोषणा से अब हुर्रियत भी सतर्क रवैया अपनाने पर मज़बूर हो सकती है.

इन तीन फौरी असर के बावजूद कुछ लोग कहते हैं कि सलाहुद्दीन को 'वैश्विक आतंकवादी सूची' में शामिल करना भारतीय प्रधानमंत्री के लिए ट्रंप की तरफ से एक 'टोकन छूट' हो सकती है कि उन्हें दो से तीन अरब डॉलर की क़ीमत वाली हथियारों की डील बदले में दी जाएगी.

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विश्लेषक हिमायत फारूक कहते हैं, 'भारत को उम्मीद थी कि अमरीका पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता रद्द कर इस्लामाबाद को हथियारों की आपूर्ति रोक देगा, क्योंकि ऐसा नहीं हुआ, इसलिए अमरीका को कुछ न कुछ तो करना था.'

पत्रकार अशफाक तांत्रे कहते हैं, "सलाहुद्दीन को उस सूची में शामिल नहीं किया गया जिस वजह से पाकिस्तान में उन्हें भारत को सुपुर्द करने के लिए बाध्य हो जाए. और फिर विदेश मंत्रालय के बयान में कश्मीर को 'भारत प्रशासित कश्मीर' कहा गया है. इसका मतलब ये है कि अमरीका कश्मीर को विवादित मानता है. मुझे लगता है कि यह केवल मोदी को ख़ुश करने के लिए किया गया."

कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि कश्मीर के अलगाववादी आंदोलन के लिए पश्चिम में नफ़रत जैसी कोई बात है ही नहीं.

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