लिंचिंग पर राजनीतिक दलों की निष्क्रियता का मतलब

Image caption जुनैद का परिवार

ईद से ऐन पहले बीते गुरुवार को जब देश की राजधानी के नजदीक तुगलकाबाद और बल्लभगढ़ के बीच चलती ट्रेन में 16 साल के जुनैद की पीट-पीट कर और छुरे मारकर हत्या की जा रही थी, तो वहां लोगों की कमी नहीं थी. पर सभी तमाशबीन बने रहे.

किसी ने रोका या हस्तक्षेप नहीं किया. इसके पीछे तीन कारण हो सकते हैं, ट्रेन के दूसरे सहयात्री हत्यारों के समूह से भयभीत रहे होंगे कि हस्तक्षेप करने पर वे भी हत्यारों के निशाने पर आ जाएंगे या उनकी मौन सहमति रही होगी या फिर उन्होंने सोचा होगा कि होने दो जो हो रहा है, इसमें उनका क्या जाता है!

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अपने मुल्क में सन् 2014 से पहले भी भीड़ द्वारा हत्याएं हुई हैं. मसलन, झारखंड और कुछ दूसरे क्षेत्रों में 'डायन' होने के शक़ में कुछ महिलाओं की हत्याएं की गईं. लेकिन सन् 2014 के बाद भीड़ द्वारा हत्या के ज्यादातर मामले सांप्रदायिक-जातिगत द्वेष या फिर सोशल मीडिया के जरिये प्रचारित किसी दुर्भावना से प्रेरित रहे हैं.

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बल्लभगढ़ में घटनास्थल पर मौजूद लोगों की तरह देश के राजनीतिक दलों का बड़ा हिस्सा भी हमारे समाज में उभरती इस ख़तरनाक हिंसक प्रवृत्ति पर लगभग निष्क्रिय भूमिका में दिख रहा है.

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लेकिन इसकी वजह वह नहीं, जो आमतौर पर तमाशबीन भीड़ की निष्क्रियता के पीछे होती है.

राजनीतिक दलों की उदासीनता

वामपंथी दलों और कुछ अन्य छोटे-मझोले राजनीतिक समूहों को छोड़कर आमतौर पर बड़े राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया कुछेक घटनाओं पर सिर्फ एक सधा और सतर्क ढंग से लिखा बयान जारी करने तक सीमित रही है.

कश्मीर में श्रीनगर के जामा मस्जिद क्षेत्र में पुलिस उपाधीक्षक की भीड़ द्वारा की गई नृशंस हत्या पर ज्यादातर राजनीतिक दलों ने बयान जारी किये क्योंकि उस मुद्दे पर शायद उन्हें ज़्यादा सियासी-जोख़िम नहीं नज़र आया.

लेकिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और राजस्थान सहित देश के विभिन्न हलकों में हो रही ऐसी हत्याओं पर राजनीतिक दलों ने दबी ज़ुबान में हल्की-फुल्की टिप्पणियां की है.

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सांप्रदायिक द्वेष से प्रेरित भीड़ की हिंसा और उसके दूरगामी ख़तरों पर कम से कम वे सक्रिय भूमिका में तो कतई नहीं दिखे.

अगर ध्यान से देखें तो ऐसी हत्याओं के पीछे एक पैटर्न साफ़-साफ़ दिखता है. यह पैटर्न है-हमारे समाज में उभरती हिंसक बघनखी मानसिकता का, जो कानून, संविधान और शासन की परवाह नहीं करती, जो अपनी निजी ताक़त को एक धर्म या संप्रदाय आधारित राष्ट्रवाद की ताक़त से जोड़कर देखने लगी है.

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गोवा के पोंडा, यूपी के फतेहपुर या गोरखपुर या उन्नाव, झारखंड के पलामू, मध्यप्रदेश के खरगौन, छत्तीसगढ़ के रायपुर या दिल्ली के सुल्तानपुरी में जब कोई 'साध्वी', 'महराज' या 'योगी' ऐलान करती या करता है कि जो कोई 'बीफ़' खाएगा, मारा जाएगा या जो कोई अपने धर्म से बाहर की लड़की से मोहब्बत (लव-जिहाद) करेगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा या जो कोई पार्कों या कॉलेजों के पास अपनी गर्ल-फ्रेंड के साथ मंडराता पाया जाएगा, उसे दंडित किया जाएगा तो मीडिया के बड़े हिस्से की तरह राजनीतिक दल भी उसे महज एक आम बयान की तरह लेते हैं.

सामाजिक-धार्मिक जीवन में ज़हर

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मध्य प्रदेश के एक पिछड़े इलाके से आने वाली एक 'साध्वी' ने पिछले दिनों एक धार्मिंक सम्मेलन में खुलेआम कहा था कि 'लव-जिहाद' के ख़िलाफ़ हिन्दू भाई हथियार इकट्ठा करें!

हमने हाल के दिनों में ऐसे कई मौके देखे, जब किसी टीवी चैनल के पठानकोट-कवरेज, किसी उपन्यासकार के लेखन या किसी पत्रकार की रिपोर्ट को 'आपत्तिजनक' बताते हुए केंद्र या राज्यों के शासन ने कार्रवाई शुरू की.

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25 जून 2017

छत्तीसगढ़ में तो कई पत्रकारों को जेल में डाला गया. पर 'साध्वियों', 'संत-महराजों', 'योगियों' या कट्टरपंथी 'गोरक्षकों' के उत्तेजक, हिंसा और नफ़रत फैलाने वाले बयानों के लिए क्या आज तक किसी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई हुई?

मुझे साफ़-साफ़ दिखता है कि सामाजिक-धार्मिक जीवन में ज़हर घोलने वाले ऐसे तत्वों और सोशल मीडिया पर सक्रिय इनके 'इंटरनेटी-कारिंदों' या इनके पक्ष में विरोधियों की 'ट्रोलिंग' करने वालों ने हमारे समाज को अनुदार, असहिष्णु और हिंसक बनाने में अहम भूमिका निभाई है.

इन्होंने हमारे समाज के उदात्त और मानवीय मूल्यों के क्रमशः सफाए का अभियान सा चला रखा है.

बड़ा सवाल है, आख़िर हमारे देश के प्रमुख राजनीतिक दल किन वजहों से समाज के माहौल को विषैला बना रहे ऐसे तत्वों पर मुलायम बने हुए हैं?

कुछेक दलों ने तो ऐसे विवादास्पद चरित्रों को राजसी-ठाटबाट दे दिया है.

राजनीति का सांप्रदायीकरण

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एक दिन मैं एक टीवी चैनल पर सायंकालीन राजनीतिक चर्चा सुन रहा था. अचानक मेरी नज़र एक ऐसे 'पैनेलिस्ट' पर गई, जो देश के एक विख्यात अधिवक्ता और मानवाधिकार मामलों के पैरोकार पर हिंसक-हमले का नामजद अभियुक्त है.

वह जेल से जमानत पर छूटा है. पर वह उक्त चैनल की चर्चा में देश की सबसे प्रमुख पार्टी की तरफ़ से बोल रहा था. क्या ऐसे दृष्टांत दुनिया के किसी अन्य लोकतांत्रिक मुल्क में मिल सकते हैं?

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हाल के वर्षों में अपने मुल्क की राजनीति का सिर्फ़ कारपोरेटीकरण और अपराधीकरण ही नहीं हुआ है, इसके बड़े हिस्से का सांप्रदायीकरण भी हुआ है.

आज़ादी के बाद के शुरुआती वर्षों में सांप्रदायिकता-आधारित राजनीति करने वाले दल इक्का-दुक्का होते थे, जो आज बड़ी ताक़त बनकर उभरे हैं, पर इस प्रवृत्ति का सबसे ख़तरनाक पहलू है कि दर्जन भर से ऊपर शक्तिशाली क्षेत्रीय और सूबाई दल भी सांप्रदायिकता की तरफ मुख़ातिब हो गये हैं.

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राजनीति को सामाजिक मूल्य आधारित-प्रक्रिया के रूप में देखने के बजाए वे अब इसे वोट-आधारित संरचना के रूप में देखने लगे हैं और इस संरचना में उन्हें बहुसंख्यकवाद का पक्ष (चाहे वह ग़लत हो या सही!) लेना जरूरी लगने लगा है.

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संभवतः यही कारण है कि जाति या संप्रदाय आधारित नफ़रत या विभेद से प्रभावित होकर किसी भीड़ द्वारा की गई बर्बर हत्या (मॉब लिंचिंग) के ख़िलाफ़ भी वे किसी बड़े कदम या सामाजिक-राजनीतिक कार्यक्रम के साथ सामने नहीं आ पाते.

नैतिक बल खो दिया है

यह इस बात का ठोस सबूत है कि आज़ादी के बीते साढ़े छह दशकों में हमारी संसदीय राजनीति ने क्रमशः अपनी मानवीय भूमिका और नैतिक बल खो दिया है.

सच बोलने में राजनीतिक दलों को डर लगता है कि कहीं इससे उनका वोट तो कम नहीं हो जाएगा या चुनाव के दौरान किसी के पक्ष या विपक्ष में ध्रुवीकरण तो नहीं हो जाएगा?

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मूल्यहीनता और नैतिक बल-विहीनता के जंगल में फंसी भारत की संसदीय राजनीति का यह सबसे बड़ा संकट है!

यह स्थिति न सिर्फ समाज की एकता, सामाजिक-सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए ख़तरनाक है बल्कि संसदीय राजनीति और लोकतंत्र के भविष्य के लिए भी बड़ा ख़तरा है.

ज्यादातर राजनीतिक दलों की निष्क्रिय भूमिका से पैदा हुई निराशा भरे आज के माहौल का एक खुशनुमा और आशा भरा पक्ष भी है.

दलों से दुखी और क्षुब्ध आम लोग उठ रहे हैं. बर्बरता और विद्वेष-भरी हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए वे सड़कों पर आ रहे हैं.

बुधवार शाम दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित आम लोगों के विरोध-प्रदर्शन के ख़ास मायने हैं.

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