अवार्ड लौटाने वाली शबनम ने कहा- मोदी मेरे प्रतिनिधि नहीं

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सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने देशभर में भीड़ के हाथों कई लोगों के मारे जाने की घटना के विरोध में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार अवार्ड लौटा दिया है. कांग्रेस की सरकार के समय वर्ष 2008 में उन्हें यह पुरस्कार दिया गया था.

हाल ही में हरियाणा के बल्लभगढ़ में ट्रेन से जा रहे एक युवक जुनैद की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी. दो साल पहले उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद अख़लाक़ की भीड़ ने हत्या कर दी थी. उस समय भी कई जाने-माने लेखक फ़िल्मकारों और वैज्ञानिकों ने इस घटना के विरोध में अपने अवार्ड लौटा दिए थे.

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बीबीसी संवाददाता पंकज प्रियदर्शी ने इन सारे मुद्दों पर शबनम हाशमी से बात की.

आपने यह पुरस्कार वापस करने का फ़ैसला क्यों लिया?

जिस तरह लगातार अल्पसंख्यकों ख़ासकर मुसलमानों पर हमले हो रहे हैं, मॉब लिंचिंग हो रही है, उसके विरोध में मैंने अपना प्रतिरोध रजिस्टर किया है. इसमें पूरी तरह सरकार नाकामयाब रही है. अल्पसंख्यों को सुरक्षा प्रदान करने में सरकार पूरी तरह फेल रही है.

लेकिन इसके क्या फ़ायदा होगा? क्या आपको लगता है कि इससे सरकार पर दबाव बनेगा? क्योंकि पहले भी जब देश में असहिष्णुता की बात उठी थी, कई लोगों ने अपने अवार्ड वापस किए थे.

एक आम नागरिक के पास प्रतिरोध के जो तरीक़े होते हैं, वो उनका इस्तेमाल करता है. हम सरकार की तरह गोली और डंडा लेकर तो चल नहीं सकते. या जिस तरह दुर्गा वाहिनी जैसी संस्थाएँ को वो हथियार दे रहे हैं, वो हम तो कर नहीं सकते. हमारे प्रतिरोध का यही तरीक़ा है कि या तो हम नारे लगाए, सड़कों पर उतरें या इस तरह का सरकार का कोई अवार्ड है, तो उसे वापस करें. मैं इससे सहमत हूँ कि ये सांकेतिक होता है, लेकिन ऐसे समय में जब चारों तरफ़ अंधेरा दिख रहा हो, तो अपना प्रतिरोध व्यक्त करना बहुत ज़रूरी होता है. ऐसे समय में जब पूरा अल्पसंख्यक समाज भय में रह रहा हो और ऐसा लग रहा हो कि कोई आवाज़ उनके साथ नहीं है, उस वक़्त ये आवाज़ उठाना उनके लिए भी ज़रूरी होता है ताकि लोग ये न समझे कि वे अकेले हैं.

लेकिन शबनम जी, सरकार का ये तर्क रहता है ख़ासकर बल्लभगढ़ की घटना के संबंध में हरियाणा की बीजेपी सरकार ने कहा है कि ये एक आपराधिक घटना है, इसे सांप्रदायिक नज़रिए से नहीं देखना चाहिए. और भी कई घटनाओं पर सरकार का ये तर्क रहता है. आप क्या कहेंगी?

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अगर एक घटना होती और उसे रंग दिया जा रहा होता, तो शायद इस पर सोच लेते. लेकिन जब से ये सरकार आई है, तब से लगातार जिस तरह से मॉब लिंचिंग हो रही है, उसमें ज़्यादातर एक ही समुदाय है. सब नहीं है. एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना श्रीनगर में भी हुई. दलितों के साथ घटनाएँ हो रही हैं, मुसलमानों के साथ हो रही हैं. पहले तो ये नहीं होती थी. जब कुछ दशक पहले अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सड़कों पर लोगों को मारते थे, तो हम लोग उस पर बहुत रोष प्रकट करते थे. आज वो हमारे देश में होने लगा है. इस तरह का तालिबानाइजेशन, जैसे हमारे देश में कोई लॉ एंड ऑर्डर नहीं है. जब चाहें, जहाँ चाहें. जब अख़लाक़ की मंदिर से कॉल देकर उनकी मॉब लिंचिंग होती है, उसके बाद हम क़ातिलों को नहीं पकड़ते. हम मीट किसका था, उसका टेस्ट करते हैं.

लेकिन शबनम जी, वहाँ तो समाजवादी पार्टी की सरकार थी उस समय.

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देखिए किसी की भी सरकार थी. सवाल सरकार का नहीं है. उस समय वहाँ समाजवादी पार्टी की सरकार थी. अभी झारखंड में किसकी सरकार है, जहाँ दो लोगों को लटका कर मार दिया गया. श्रीनगर में भी दुर्भाग्यपूर्ण हादसा हुआ. सवाल ये है कि ऐसा माहौल बनता जा रहा है, जहाँ मॉब लिंचिंग एक आम बात होती जा रही है. उस पर कोई अंकुश नहीं. गृह मंत्रालय से कोई गाइड लाइन तक नहीं. सरकार के नेताओं ने क्या क्या नहीं कहा अल्पसंख्यों के ख़िलाफ़.

शबनम जी, क्या आपने ये कोशिश नहीं की कि राजनाथ सिंह या नरेंद्र मोदी से बात की जाए? या आपने कोशिश की और आपको आश्वासन कुछ नहीं मिला?

2002 ने मुझे एक नए तरीक़े का एक्टिविस्ट बनाया था. मैं तो कभी भी नरेंद्र मोदी से बात नहीं करूँगी. वो प्रधानमंत्री ज़रूर बन गए हों, लेकिन मैंने उनका रूप गुजरात में देखा है. मैं एक नागरिक हूँ. ये मेरा काम नहीं है कि मैं प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से जाकर मिलूँ. मुझे जो रोष प्रकट करने का अपना तरीका आता है, उससे मैं रोष प्रकट करती हूँ.

आपने नरेंद्र मोदी की बात की. लेकिन देश की क़ानून व्यवस्था ने और सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में उन्हें बरी किया है. देश की जनता ने उन्हें चुना है, तो आपको उनसे बात करने में हर्ज क्या है?

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सुप्रीम कोर्ट ने कितना बरी किया है, नहीं किया है- ये बिल्कुल अलग डिबेट है. अभी भी उनके ख़िलाफ़ मामले चल रहे हैं. उस डिबेट में मैं नहीं जाना चाहती और मैं कोई लीगल एक्सपर्ट भी नहीं हूँ. उनको देश की जनता ने ज़रूर चुना होगा, लेकिन मैंने उनको नहीं चुना है. वे मेरे प्रतिनिधि नहीं हैं. मैं ऐसे व्यक्ति से क्यों मिलूँ, जिसके शासन के अंतर्गत पूरा नरसंहार हुआ?

शबनम जी, आप पर आरोप है कि आपके एनजीओ के फॉरेन फंडिंग का लाइसेंस केंद्र सरकार ने रद्द किया है, इसके बाद आपने ये क़दम उठाया है.

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वो तो उन्होंने दिसंबर में किया था. मुझे करना होता, तो तब कर देती. उसके बाद बहुत कुछ हो चुका. ये सरकार जब 2014 में आई थी, उसी समय होम मिनिस्ट्री ने जाँच कर ली थी. आयकर विभाग ने भी जाँच की थी. मेरा विरोध नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे लोगों और उनकी सांप्रदायिक सोच से आज से नहीं है. जिन लोगों को आरोप लगाना है, वे लगा सकते हैं. ये उनका हक़ है कि वे आरोप लगाएँ. मैं जो सही समझ रही हूँ, वो कर रही हूँ.

शबनम जी, आप पर एक आरोप ये भी लगता है कि आपकी नरेंद्र मोदी से कुछ व्यक्तिगत लड़ाई है. ये भी तर्क दिया जा रहा है कि कांग्रेस के समय में आपके भाई सफ़दर हाशमी की हत्या हुई थी. उसी कांग्रेस सरकार के समय आपने अवार्ड लिया था. आप कांग्रेस के बारे में कभी कुछ नहीं बोलतीं.

कांग्रेस से जो मेरे मतभेद हैं, वो मैंने हमेशा खुलकर बोले हैं. मेरे भाई की मृत्यु हुई कांग्रेस शासन में, उसमें कांग्रेस के गुंडे शामिल थे. ये कोई ऐसी बात नहीं है, जो दुनिया को नहीं पता या जिसके बारे में नहीं बोला गया है. मुझे कांग्रेस की आर्थिक नीतियों से बहुत समस्या है. मैं ये मानती हूँ कि कांग्रेस ने सांप्रदायिक कार्ड बहुत इस्तेमाल किया है. लेकिन मैं कांग्रेस और बीजेपी में एक अंतर मानती हूँ. मैं कांग्रेस को एक सेक्युलर पार्टी मानती हूँ. जिसके शासन के अंदर कम से कम हम अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई लड़ सकते हैं. वहाँ कम से कम एक स्पेस है, जहाँ एक आम नागरिक अपनी असहमति रजिस्टर कर सके. जो इस सरकार में नहीं है. अगर इस देश की जनता को ये समझ में नहीं आ रहा है कि आख़िरकार ये सिर्फ़ अल्पसंख्यकों पर हमला नहीं है, एक दिन इसमें पूरी जनता पिसेगी, उसका मैं कुछ नहीं कर सकती. न मैं कांग्रेस को परफेक्ट मानती हूँ और न ही बीजेपी को. न ही मैं और सेक्युलर पार्टियों को परफ़ेक्ट मानती हूँ. लेकिन कोई आदर्श समाज नहीं होता, कोई परफ़ेक्ट नहीं होता. वो कहते हैं कि आपको अगर दो ख़राब में से किसी को चुनना हो तो आप कम ख़राब चुनते हैं.

लेकिन अगर आप अपने भाई की हत्या के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार मानती हैं, तो उससे अवार्ड क्यों लिया?

अगर मेरा भाई अपने मरने के बाद ज़िंदा होता, तो आज वो मेरी ही तरह इन शक्तियों का विरोध कर रहा होता और जो उनसे एक दर्जे कम हैं, उनके साथ खड़ा होता.

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