नज़रियाः मोदी के ख़िलाफ़ नाकाम होता राजनीतिक जिहाद

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हरियाणा के बल्लभगढ़ में चलती ट्रेन में एक युवक जुनैद की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. यह एक ऐसा अपराध है जो किसी भी सभ्य समाज को शर्मिंदा और कलंकित दोनों करता है. लेकिन इस हत्या को सांप्रदायिकता का जामा पहनाना उससे कम बड़ा अपराध नहीं है क्योंकि इस प्रकार की बातों से समाज में परस्पर अविश्वास और बदले की भावना का निर्माण होता है.

जुनैद के हत्यारे आपराधिक मनोवृत्ति वाले लोग थे, परन्तु जब इस प्रकार की घटनाओं को कानून और व्यवस्था के बजाय राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगता है तो वास्तव में इन अपराधियों को एक प्रकार से वैधानिकता दे दी जाती है.

इन अपराधियों ने बीफ की आड़ में जो हिंसात्मक कार्य किया है उसके पीछे न तो कोई विचार है और न ही संगठन. भारत की खूबसूरती इसी बात में है कि इस प्रकार की घटनाएं सभी प्रकार की उत्तेजनाओं के बावजूद स्थानीय बनकर रह जाती हैं.

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यद्यपि भारत में बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग है जो घटनाओं की स्थानीयता को अखिल भारतीय रूप दे देना चाहता है. वह शोर-शराबा करने में कोई कसर छोड़ना नहीं चाहता है. इसके पीछे एक कारण है. सन् 2014 में केन्द्र में मोदी सरकार का जो गठन हुआ वह इसे हजम नहीं हो पा रहा है. यह वर्ग पहले से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाने पर रखता आया है.

जो लोग पिछले कुछ दशकों का इतिहास जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि किसी भी सांप्रदायिक दंगे का समाचार आने से पहले वे इसमें संघ का हाथ होने का निष्कर्ष निकाल लेते थे. वास्तव में यह वर्ग मोदी और संघ के खिलाफ राजनीतिक जिहाद चला रहा है और ऐसा करने में वह हिन्दू-मुस्लिम विवाद को तूल देता रहता है.

सरकार बनने के तुरंत बाद अवार्ड वापसी का आडम्बर रचा गया मगर जनसमर्थन नहीं मिलने के कारण यह टांय-टांय फिस हो गया. जब ऐसी कोई बड़ी घटना नहीं हो रही है जिससे सरकार और हिन्दुत्व को बहुमतवादी और फासीवादी कहा जाए तब ये लोग सूक्ष्म घटनाओं का सहारा लेकर सरकार और विचारधारा की नीयत पर सवाल खड़ा कर रहे हैं.

इन सबके बावजूद यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जुनैद की हत्या यह संकेत करती है कि भारतीय समाज को अनेक प्रकार के सुधार से गुज़रने की आवश्यकता है.

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चूंकि जुनैद मुसलमान था और अपराधी हिन्दू था, यह कतई हिन्दू-मुस्लिम विषय नहीं हो सकता है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारे समाज में ऐसी विकृत मानसिकता वाले लोग हैं और उनसे लड़ने के लिए हमें पहले अपने राजनीतिक स्वार्थ और विकृतियों से मुक्त होना पड़ेगा.

इस संदर्भ में कोई अरूणिमा सिन्हा की घटना को कैसे भूल सकता है. 24 वर्षीय अरूणिमा के गले से सोने की चेन छिनते हुए अपराधियों ने उन्हें ट्रेन से बाहर फेंक दिया था. तब यह सिर्फ अपराध की घटना मानी गई. अगर संयोग से पीड़िता और अपराधी में से किसी एक का धर्म अलग होता तो भारत के बुद्धिजीवियों के लिए विमर्श का खुराक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण होता.

29 जनवरी, 2014 को देष की राजधानी दिल्ली में अरूणाचल प्रदेश के नीडो तानियाम को पहले नस्लवादी गाली दी गई फिर उसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. तब इन बुद्धिजीवियों के लिए यह सिर्फ असहिष्णुता की घटना थी. 2016 में बंगलौर में प्रशांत पुजारी और आगरा में अरूण माहौर की हत्या कर दी गई. दोनों ही अहिंसक प्रवृत्ति के गोभक्त थे. तब तो इन बुद्धिजीवियों के लिए वह असहिष्णुता कहलाने लायक घटना भी नहीं थी.

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केरल में आए दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं की हत्या की घटनाएं इनके मन को थोड़ा भी विचलित नहीं करता है. जब 26 वर्षीय सुजीत की हत्या दिन दहाड़े उसके बूढ़े माता-पिता के आंखों के सामने कर दी गई तब उसके प्रति किसी की तरफ से औपचारिक स्वर भी नहीं निकला. जुनैद से लेकर सुजीत तक की घटनाएं या फिर झारखंड और उड़ीसा में 'डायन' का आरोप लगाकर दर्जनों महिलाओं की हत्या भारतीय समाज के लिए एक बड़ी चुनौती के समान है.

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Image caption सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने जुनैद की हत्या के बाद राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की ओर से मिला अवॉर्ड वापस कर दिया है.

इस चुनौती को बुद्धिजीवियों की वर्तमान पीढ़ी अपने जीवन काल में नहीं समझ सकती है. कारण यह है कि वे अपने मन से, विचार से स्वार्थ से और प्रशिक्षण से खेमों में बंटी हुई है तथा उसी के अनुसार वह पूरे समाज को देखती-परखती है. उसके लिए अपने जीवन काल में उस स्वार्थ से बाहर निकलकर समाज को देखने का समग्र नजरिया नहीं है. वह जयप्रकाश नारायण और विनोबा भावे की भूमिका में आने की क्षमता और भाव दोनों की कमी से गुजर रहा है इसीलिए ऐसे बुद्धिजीवी जब कभी सच बात भी बोलते हैं तब भी जनता उनके पीछे खड़ी नहीं रहती है. वे विश्वसनीयता के घोर संकट से गुजर रहे हैं.

राजनीतिक शोरगुल इन समस्याओं का समाधान नहीं है. बुनियादी प्रश्नों पर समाज में सहमति पैदा करना ही इसका दीर्घकालिक समाधान है. भारत में मुगल और अंग्रेजों के शासनकाल में बहुसंख्यक हिन्दुओं को अल्पसंख्यकवादी मानसिकता में जीना पड़ा.

दुर्भाग्य से इसी को धर्मनिरपेक्षता मान लिया गया. हिन्दुओं की भावनाओं और उनकी संस्कृति का उपहास और उपेक्षा करना प्रगतिशीलता कहा जाने लगा.

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स्वर्गीय एम.एफ. हुसैन ने हिन्दू देवी-देवताओं का नग्न चित्र बनाया तो उसे प्रगतिशील कला और उसके विरोध को फासीवाद मान लिया गया. ठीक उसी तरह जाकिर नाइक हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कर और उनकी देवी देवताओं का सार्वजनिक मंच से अपमान करते रहे तो उन्हें शांति का दूत मान लिया गया.

इस प्रकार की विकृत मानसिकता कभी भी समाज को स्थाई संतुलन नहीं देता है. यह दूर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ घटनाएं लगातार बीफ और गोसंरक्षण के नाम पर घटी हैं लेकिन इन अपराधियों को किसी भी प्रकार का संरक्षण या समर्थन तो दूर की बात रही उनमें से कोई भी कानून के शिकंजे से बच नहीं पाया है तथा हर तरफ से निंदा भी हुई है.

समय-समय पर संघ को निशाना बनाने के लिए ऐसी ताकतें अलग-अलग प्रकार की रणनीति को अंजाम देते हैं जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता है. संघ एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है. हजारों लोग पीढ़ियों से घर-द्वार और सुख-सुविधाओं को छोड़कर किसी अखलाक और जुनैद की हत्या करने के लिए काम नहीं कर रहे हैं.

साम्प्रदायिक दंगा, धार्मिक स्थलों को तोड़ना तथा बदसलूकी करने के लिए त्याग और तपस्या की जरूरत नहीं होती है. संघ के एक लाख 57 हजार सेवा के उपक्रमों में एक भी घटना सामने नहीं आई है जिसमें पूजा-पद्धति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव तक हुआ हो.

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संघ के विद्या भारती के स्कूलों में 500 के करीब मुस्लिम शिक्षक है जिनमें से 230 के करीब मुस्लिम महिला शिक्षिका हैं. संघ के ही स्कूल में पढ़ा हुआ असम के सरफराज़ ने दसवीं कक्षा में पूरे असम प्रांत में प्रथम स्थान हासिल किया.

संघ अपने सकारात्मक कामों से आगे बढ़ता जा रहा है और इसका दुष्प्रचार करने वाले दिनोंदिन सिमटते जा रहे हैं. वे न तो इसके बढ़ने का कारण समझ पा रहे हैं और न ही अपने सिमटने का कारण ढ़ूंढ पा रहे हैं.

कभी वे सावरकर के हिन्दुओं के सैन्यकरण और राजनीतिकरण के सिद्धांत के जंगल में खो जाते हैं तो कभी गोलवलकर के 'बंच ऑफ थॉट' को पथरीला समझकर अपने आप को लहूलुहान करते रहते हैं.

संघ के विरोध के अनेक अच्छे कारण हो सकते हैं परंतु जिनकी मानसिकता में सच की जगह न हो उन्हें राजनीतिक गाली-गलौज में ही नैसर्गिक सुख मिलता है. ऐसे लोग समस्या के समाधान नहीं बल्कि कारण बन जाते हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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