दिल्ली से बल्लभगढ़ की यात्रा, मगर मैं जुनैद नहीं...

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Image caption लाल किले से जामा मस्जिद का नज़ारा

दिल्ली में लाल किले के सामने गौरी शंकर मंदिर से थोड़ा ही आगे जामा मस्जिद है. अलग-अलग धर्म के दो लोग चाहें तो अपना-अपना धार्मिक सुकून पा सकते हैं. अगर चाहें तो!

मैं जामा मस्जिद पहुँचकर सदर बाज़ार की तरफ चल पड़ा, ये वही जगह है जहाँ से ईद की ख़रीदारी करके लौट रहा जुनैद भीड़ के हाथों मारा गया था.

जिस ई-रिक्शा पर बैठकर मैं सदर बाज़ार रेलवे स्टेशन की तरफ जा रहा था, उसके शीशे पर उर्दू में कुछ लिखा हुआ था. मेरे साथ बैठा पैसेंजर शायद इसी वजह से रिक्शावाले से कह रहा था, "मुल्ला जी, धीरे चलाओ, झटके लग रहे हैं". रिक्शावाले की न दाढ़ी थी, न सिर पर टोपी.

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Image caption सदर बाज़ार

रेलवे स्टेशन के काउंटर पर तिरंगा सामने रखकर बैठे व्यक्ति ने मुझे फटाफट टिकट थमा दिया.

अगर सफेद टोपी ही मुसलमान की पहचान है, तो सदर बाज़ार रेलवे स्टेशन पर मुझे एक भी मुसलमान नहीं दिखा. कुछ देर में बल्लभगढ़ की ईएमयू आई, मैं उसमें चढ़ गया, ये वही ट्रेन है जिस पर जुनैद ईद की ख़ुशियाँ मन में लिए चढ़ा था.

ट्रेन लगभग खाली थी. मैं खिड़की किनारे की सीट पर बैठ गया. ट्रेन जैसे-जैसे आगे बढ़ी, भीड़ बढ़ती गई. नई दिल्ली स्टेशन पर मुझे लगा कि कोई बुजुर्ग अगर मुझ से आकर कहेगा कि सीट दे दो, तो क्या मैं भी जुनैद की तरह सीट दे दूँगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

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Image caption ओखला रेलवे स्टेशन

कुछ देर में ओखला स्टेशन आया. वही स्टेशन जहाँ से क़ातिलों की भीड़ चढ़ी थी. वैसे तो घबराने वाली कोई बात नहीं थी लेकिन ओखला स्टेशन के बाद उस दिन की घटना के बारे में सोचकर सिहरन हुई. इस स्टेशन से अपने कोच में चढ़े हर चेहरे को मैंने जल्दी-जल्दी स्कैन किया.

मुझ से किसी ने कुछ कहा तो नहीं, लेकिन मैं बार-बार सोचता रहा कि उसे किस तरह लोगों ने घेरा होगा, जब उसने चाकू देखा होगा तो उसका दिल कैसे धड़का होगा.

मैं ये सोचने लगा कि जब जुनैद और उसके भाइयों को मारा जा रहा था, तब क्या किसी एक को ये ख़्याल नहीं आया कि ट्रेन रोकने के लिए चेन खींच दे. तभी मेरी निगाह कोच में चिपके एक स्टिकर पर गई जिस पर 'राम....राम..... राधेश्याम' लिखा था, मुझे ख्याल आया कि क्या हत्यारों का ईश्वर में विश्वास रहा होगा?

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Image caption दिल्ली से बल्लभगढ़ की ईएमयू का कोच

डिब्बे में दाढ़ी और टोपी वाले पहले इंसान पर मेरी नज़र पड़ी, मैंने उन्हें एक औपचारिक (नकली) मुस्कान के साथ देखा, जवाब में उन्होंने खिली-खिली सी मुस्कान देकर अपने पास खड़े होने की जगह बना दी.

मैं उनसे बातचीत बढ़ाने के लिए 'ये कौन सा स्टेशन है' जैसे फालतू सवाल पूछता रहा. वो हर बात का जवाब देते रहे लेकिन इस तरह कि बात आगे न बढ़े.

जब बातचीत आगे नहीं बढ़ी तो मैं अपने फ़ोन पर लग गया, इंसान की नज़र बरबस अपने बगल वाले के फ़ोन पर चली जाती है. मैं जुनैद के भाई हाशिम का इंटरव्यू देख रहा था जिसकी हेडलाइन थी--"तुम मुल्ले हो, गाय खाते हो, पाकिस्तान चले जाओ."

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
'तुम पाकिस्तानी मुल्ले बीफ़ खाते हो'

मेरे फ़ोन पर नज़र पड़ते ही वो बिना किसी प्रतिक्रिया के डिब्बे के दूसरे हिस्से में जाकर अकेले खड़े हो गए और बाहर की तरफ़ देखते रहे, वो नहीं चाहते थे कि कोई ये देख ले कि उन्होंने जुनैद के भाई का इंटरव्यू देखा है, उन्होंने मेरी तरफ़ एक बार भी नहीं देखा.

कोच में कुछ लोग जीएसटी, नोटबंदी और ट्रंप की बात कर रहे थे. बाजू में बैठे एक सज्जन व्हाट्सऐप पर एक लंबा मैसेज सरकाते हुए उस जगह आ पहुंचे थे, जहां भगवा झंडों के साथ 'सच्चे भारतीय शेयर करें' लिखा हुआ था.

कोई जुनैद या मुसलमानों के बारे में बात नहीं कर रहा था. शायद इन लोगों को इसकी खबर नहीं थी या फिर जुनैद का मारा जाना इनके लिए कोई खबर न थी.

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Image caption बल्लभगढ़ रेलवे स्टेशन

बल्लभगढ़ स्टेशन आते ही मैं प्लेटफार्म पर उतर गया, जहां जुनैद और उसके भाइयों को उतरने नहीं दिया गया था. बल्लभगढ़ पर उतरना पता नहीं क्यों, अच्छा लगा. जहां 'टोपी वाला जुनैद' नहीं उतर पाया था, उस साधारण से स्टेशन पर उतरते हुए एक अजीब-सा एहसास हुआ.

गेट के पास खड़े एक लड़के से मैंने पूछा, 'अरे यहीं कहीं तो मारा गया था न वो लड़का?'

उसने कहा, "यहीं चाकुओं से मार दिया था. बाजी बेर गुस्सा आ जाए है, गुस्से में मार दिया होगा चाकू. गलती से पैर-वैर पड़ गया होगा. गाली तो हम भी बक दै हैं. उन लड़कों ने भी दी होगी गाली वाली. आ गया होगा लौंडन को गुस्सा. मार दिया पर इतना न मारना चाहिए था."

ट्रेन असावती पहुंची. मैं उस लड़के से उसका नाम पूछे बिना उतर गया. नाम पूछने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई. मैं असावती के प्लेटफॉर्म नंबर चार पर उतर गया, जहां जुनैद को फेंका गया था.

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Image caption असावती स्टेशन

प्लेटफॉर्म पर सन्नाटा था, पर ये सन्नाटा किसी के शोक में नहीं था. ये 'बात खत्म करो, आगे बढ़ो' वाला सन्नाटा था.

वापसी के वक्त मेरी कोच में किसी मदरसे के चार लड़के बैठे थे, मैंने उनसे जुनैद का ज़िक्र किया तो वे चौकन्ने हो गए और "हमें कुछ न पता" कहकर नज़रें खिड़की से बाहर कर लीं. बाहर बारिश हो रही थी. असावती के प्लेटफार्म नंबर चार पर पड़े खून के धब्बों के साथ जुनैद की यादें भी धुल गई लगती हैं.

पूरे सफर और मंज़िल पर कुछ लोगों से जुनैद का ज़िक्र किया, किसी को कुछ नहीं मालूम. जिनको मालूम है वो कहीं आगे बढ़ चुके हैं. मेरे मोबाइल की स्क्रीन देखकर मौलाना साहब बढ़ गए थे.

मंटो की कहानियों में दंगों के वक्त जो शोर होता है, वो मुझे इस सफर में लोगों की चुप्पी में सुनाई दिया.

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