छत्तीसगढ़: किसानों की आत्महत्या दर बढ़ी या घटी?

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Image caption चंद्रहास साहू (फ़ाइल फोटो)

सोमवार को छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले में 40 साल के किसान चंद्रहास साहू ने अपने खेत में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली.

बगदेही गांव के रहने वाले चंद्रहास के पास ढाई एकड़ ज़मीन थी, जिससे उनके परिवार का गुज़ारा होता था. परिवार वालों का कहना है कि तीन साल पहले छह बेटियों में से सबसे बड़ी हिना की शादी के लिये कर्जा लिया था.

उसके बाद कर्ज लेकर उन्होंने बोरवेल के लिए दो बार खेत में खुदवाई करवाई ताकि बेहतर खेती की जा सके लेकिन पानी नहीं निकला.

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चंद्रहास की आर्थिक स्थिति और ख़राब हुई, जब पिछले साल सूखा पड़ा. रबी की फसल भी अच्छी नहीं हुई. खेती से काम नहीं बना तो उन्होंने हम्माली शुरु कर दी. लेकिन आर्थिक तंगी से छुटकारा नहीं मिल पा रहा था.

चंद्रहास के चाचा रवि साहू कहते हैं, "सप्ताह भर पहले ही उसने मुझसे 25-30 हज़ार रुपये मांगे थे. उस पर किसान क्रेडिट कार्ड का एक लाख से अधिक का बकाया था और उसे भी उसने गिरवी रख दिया था. इस साल उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि वह खेती के लिये बीज भी खरीद पाता."

कर्ज़ बन रहा है फांसी का फंदा

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Image caption चंद्रहास का परिवार

सरकारी अधिकारियों ने सोमवार को ही अलग-अलग मद से चंद्रहास के परिवार को 22 हज़ार रुपये की आर्थिक सहायता दी है और फिलहाल चंद्रहास का नाम भी उन किसानों में शुमार हो गया है, जिनकी आत्महत्या पर बहस जारी है.

असल में पिछले पखवाड़े भर में मुख्यमंत्री के गृह ज़िले कबीरधाम समेत राज्य के अलग-अलग हिस्सों में 11 किसानों की आत्महत्याएँ चर्चा में है.

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कृषि वैज्ञानिक और छत्तीसगढ़ किसान मजदूर महासंघ के संयोजक डॉक्टर संकेत ठाकुर का कहना है कि सरकार किसानों को खेती के लिए तो बिना ब्याज के ऋण देती है लेकिन किसान को दूसरे कृषि उपकरण व्यावसायिक दर पर लेनी पड़ती है. देश के दूसरे राज्य किसानों की कर्ज माफी कर रहे हैं लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार किसानों की चिंता नहीं कर रही.

डॉक्टर संकेत कहते हैं, "राज्य के 37.47 लाख किसानों में से केवल साढ़े दस लाख किसान ही नाबार्ड में पंजीकृत हैं और इन्हें ही सरकार से ऋण मिलता है. बाकि दूसरे सभी किसानों को सेठ-साहूकारों या बैंकों से भारी ब्याज पर कर्ज़ लेना पड़ता है. फसल खराब हुई तो यही कर्ज़ गले का फंदा बन रहा है."

किसानों की लगातार ख़राब होती हालत

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लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि किसानों की आत्महत्या को लेकर जिस तरह की रिपोर्ट आ रही है, उसमें अलग-अलग तथ्य सामने आए हैं. मुख्यमंत्री का कहना है कि अगर कोई किसान पारिवारिक विवादों के कारण भी आत्महत्या कर रहा है तो भी यह गलत है.

रमन सिंह कहते हैं, "कोई लाखों-करोड़ों रुपये का कर्ज़ हो, ऐसा कुछ नहीं होता. पांच हज़ार-दस हज़ार रुपया बचा रहता है. अभी फिर से नए कर्ज़ का समय आ गया है तो उनको फिर लोन मिल जाएगा."

रमन सिंह का दावा है कि इस बार उत्पादन भी अतिरिक्त हुआ है और किसानों को लाभ भी हो रहा है. ऐसे में आत्महत्या को कर्ज़ या खेती की असफलता से जोड़ना सही नहीं है.

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लेकिन किसान नेता आनंद मिश्रा का दावा है कि छत्तीसगढ़ में किसानों की हालत लगातार ख़राब होती जा रही है.

आनंद मिश्रा कहते हैं, "छत्तीसगढ़ जब बना तब यहां किसानों की संख्या 44.54 और मज़दूरों की संख्या 31.94 थी, 2011 में यह आंकड़ा उलटा हो गया. किसान 32.88 प्रतिशत रह गये और मज़दूरों की संख्या बढ़ कर 41.80 प्रतिशत हो गई. राज्य में खेती की खराब हालत के कारण लाखों किसान मज़दूर में तब्दील हो गए."

आनंद मिश्रा का कहना है कि किसानी के कारण आत्महत्या हो या किसान की आत्महत्या, छत्तीसगढ़ सरकार इन दोनों ही आंकड़ों को छिपाने की कोशिश में लगी रहती है.

सरकारी दस्तावेज़ भी इस मामले में उनके दावे की पुष्टि करते हैं.

छिपाए जा रहे हैं आंकड़े

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Image caption सरकारी अधिकारियों ने अलग-अलग मद से चंद्रहास के परिवार को 22 हज़ार रुपये की आर्थिक सहायता दी है.

नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो के आंकड़ों को देखें तो छत्तीसगढ़ में 2006 से 2010 तक हर साल किसानों की आत्महत्या के औसतन 1555 मामले दर्ज किये गये. हर दिन राज्य में औसतन 4 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है. 2009 में तो यह आंकड़ा लगभग 5 पर जा पहुंचा. इसके बाद इन आंकड़ों को छुपाने की कोशिश शुरू की गई.

नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो के आंकड़ों में 2011 में किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा शून्य पर जा पहुंचा. 2012 में छत्तीसगढ़ में सरकार ने केवल 4 किसानों की आत्महत्या को स्वीकार किया. नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो के आंकड़े में 2013 में फिर से किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा शून्य ही दर्शाया गया.

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अभिषेक सिंह कहते हैं, "जब सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए देश भर में किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को लेकर सरकार से जवाब मांगा, तब कहीं जा कर सरकार ने माना कि छत्तीसगढ़ में पिछले साल भर में 954 किसानों ने आत्महत्या की है."

आंकड़ों की बाज़ीगरी

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आंकड़ों की इस बाज़ीगरी को देखें तो 2014 में जहां देश में किसानों की आत्महत्या के 5650 मामले सामने आए, वहीं 2015 में इसमें 29 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई और यह आंकड़ा 8007 पर जा पहुंचा.

इन आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में अभी भी किसान आत्महत्या की दर तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से अधिक है.

विपक्षी दल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल का कहना है, "सरकार ने सत्ता में आने पर धान का समर्थन मूल्य प्रति क्विंटल 2500 रुपये करने का वादा किया था. लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार का हवाला दे कर छत्तीसगढ़ सरकार मुकर गई थी. अब जबकि दोनों जगहों पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, तब भी किसानों को पुराना समर्थन मूल्य ही मिल रहा है."

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