जीएसटी लागू, अब सरकार के सामने हैं ये 3 बड़ी चुनौतियां

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Image caption बहुत से व्यापारी जीएसटी के विरोध में हैं.

देश में आज से एक जैसा टैक्स सिस्टम यानी जीसटी लागू हो गया है. लेकिन जानकार मानते हैं कि सरकार के लिए आगे की राह ख़ासी मेहनत वाली है.

आर्थिक मामलों के जानकार आलोक पुराणिक का कहना है कि जीएसटी को लेकर पसरे अज्ञान और कंफ़्यूजन के बीच सरकार के सामने अब तीन प्रमुख चुनौतियां हैं.

पहली चुनौती बताते हुए वो कहते हैं, 'जीएसटी अब ट्रायल मोड से ज़मीन पर उतर रहा है और अब देखना होगा कि तकनीकी समस्याएं आएंगी या नहीं और तीन-चार महीने काम करने के बाद ही हम देख पाएंगे कि चीज़ें किस तरह से चल रही हैं.'

'विज्ञापन नाकाफ़ी हैं'

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Image caption आलोक पुराणिक

आलोक मानते हैं कि जीएसटी को लेकर जानकारी का प्रसार सरकार के सामने दूसरी बड़ी चुनौती है और भारत जैसे देश में वो चुनौती बड़ी सघन हो जाती है.

उनके मुताबिक, 'मंत्रियों, चार्टर्ड अकाउंटेंट, पत्रकारों, टिप्पणीकारों को यह समझ आ गया है और वे समझा भी रहे हैं. लेकिन इसमें काफी हद तक काग़ज़ी काम शामिल है, कंप्यूटर और तकनीक का इस्तेमाल शामिल है. तो सरकार को काफ़ी हद तक लोगों तक जानकारी पहुंचाने का काम करना होगा, जो सिर्फ विज्ञापनों से नहीं होगा.'

आलोक मानते हैं कि जीएसटी का लागू होना आज़ाद भारत के उन चुनिंदा फ़ैसलों में से है जो भविष्य में ऐतिहासिक फ़ैसले के तौर पर चिह्नित किए जाएंगे. इसलिए अगर कोई समस्या आती है तो उस पर जवाब देने के लिए सरकार को बहुत जवाबदेह होना पड़ेगा.

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इसके जटिल पहलुओं का उदाहरण देते हुए वह एक उदाहरण देते हैं. 'काजल पर 28 परसेंट टैक्स लगाया गया था. तब पता चला कि काजल भी दो तरह के होते हैं. एक डिब्बी वाला, एक पेंसिल वाला. दोनों को इस्तेमाल करने वाला तबका अलग है. बाद में इसमें संशोधन किया गया और दोनों तरह के काजलों पर अलग-अलग टैक्स लगाए गए.'

आलोक बताते हैं कि राज्यों और केंद्र सरकार के प्रतिनिधित्व वाली जीएसटी काउंसिल को हर तीन महीने में इस पर बैठक करनी है, लेकिन उन्हें तय समय से पहले भी समय-समय पर इस पर विचार करना पड़ सकता है. वह कहते हैं, 'ये कर राजस्व के मसले हैं. इसमें आप कई बार तीन महीने का इंतज़ार भी नहीं कर सकते.'

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'अज्ञात का भय'

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आलोक पुराणिक तीसरी चुनौती के बारे में ज़िक्र करते हुए जीएसटी को लेकर कुछ व्यापारियों में नाराज़गी भी सामने आई है. आलोक इसकी दो वजहें मानते हैं. उनके मुताबिक, 'एक तो अज्ञात का भय होता है. 1984 में जब राजीव गांधी कंप्यूटर ला रहे थे तो लगभग हर विपक्षी पार्टी और ट्रेड यूनियन इसके विरोध में थी. आरोप था कि ये देश में नौकरियों को तबाह कर देगा. लेकिन अगले दस वर्षों में हमने देखा कि कंप्यूटर से कितनी नौकरियां पैदा हुईं.'

उनके मुताबिक, 'दूसरा भय इस बात से आ रहा है कि कुछ व्यापारी उस इलेक्ट्रॉनिक ट्रेल में, उस रिकॉर्ड में, उन कागज़ों पर नहीं आना चाहते. वे चाहते हैं कि कुछ ऐसी चीज़ें चलती रहें तो रिकॉर्ड में न आएं.'

हालांकि आलोक कहते हैं कि जीएसटी इस तरह ही डिज़ाइन किया गया है कि रिकॉर्ड में आए बिना इसका फ़ायदा नहीं लिया जा सकता. वह कहते हैं कि ये तबका इस आधार पर विरोध नहीं कर रहा कि किसी सामान पर जीएसटी की एक ख़ास दर है. उनका कहना है कि हम छोटे कारोबारी हैं, हमें इससे अलग रखा जाए.

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