बीएचयू में किसी मुस्लिम का पढ़ना कितना मुश्किल?

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बहुसंख्यकों के बीच अल्पसंख्यकों का होना मुश्किल है या आसान?

कोई व्यक्ति अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक धर्म, भाषा, इलाक़े या नस्ल के आधार पर हो सकता है.

क्या बहुसंख्यकों के बीच अल्पसंख्यकों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है? बीबीसी हिंदी ने अपनी स्पेशल सिरीज़ में इसी चीज़ को समझने की कोशिश की है.

पहली कड़ीः अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में हिन्दू का पढ़ना कितना मुश्किल?

दूसरी कड़ीः 'इन्हें लगता है उत्तर भारत की लड़कियों के कई बॉयफ्रेंड होते हैं'

तीसरी कड़ी: 'सतही हो चुकी है जेएनयू की भीतरी विचारधारा'

Image caption सना सबा

चौथी कड़ी: काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एक मुसलमान छात्र क्या महसूस करता है?

जब बीएचयू में मैंने दाखिला लिया तो बड़े भाई से कई कहानियां सुनने को मिलती थीं. वो कहते थे कि मज़हब के नाम पर वहां के स्टूडेंट ही नहीं प्रोफ़ेसर भी भेदभाव करते हैं. मुझे भाई की आपबीती पर अफ़सोस होता था कि उन्हें इन सारी चीज़ों को झेलना पड़ा.

ग्रैजुएशन के दिनों में मेरा अनुभव भाई के अनुभव से बिल्कुल अलहदा रहा है. मुझे ग्रैजुएशन में ऐसे किसी भी तरह के भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा. मैंने ग्रैजुएशन के बाद मास्टर भी बीएचयू से ही किया. मास्टर में मैंने मास कम्युनिकेशन में एडमिशन लिया था.

बीएचयू के मास कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट को सबसे रंगीन डिपार्टमेंट कहा जाता है. इसकी एक वजह तो वहां की एक प्रोफ़ेसर थीं. उनके कारण मास कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट अख़बारों की सुर्खियां बना करता था. हालांकि इन सुर्खियों से मेरा कोई लेना-देना नहीं था. सिर झुकाकर क्लास जाती थी और फिर उसी तरह वापस लौट जाती थी.

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मुसलमानों से नफ़रत?

एक दिन मेरा भरोसा बुरी तरह से हिल गया. किसी ने प्रोफ़ेसर का नाम ग़लती से शबाना लिख दिया. अपना नाम शबाना देखते ही मोहतरमा बुरी तरह से भड़क गईं. उन्होंने ग़ुस्से में कांपते हुए पूछा, "किसने मेरा नाम ख़राब किया?"

स्टूडेंट की तक़दीर अच्छी थी कि वो अपना ही नाम असाइनमेंट पर लिखना भूल गया. क्लास में सन्नाटा पसरा था. प्रोफ़ेसर ने क्लास में कहा, "कान खोलकर सुन लीजिए, मुझे मुसलमानों से नफ़रत है. उनसे किसी भी तरह का संबंध मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है. यह हरकत दोबारा नहीं होनी चाहिए."

मुझे तो एकदम से सांप सूंघ गया. मैं सोच रही थी कि क्या कोई प्रोफ़ेसर क्लास में इस तरह से बात कर सकती है? बीएचयू के लिए वह पहला वाकया था जब मैंने मुसलमानों को लेकर इतनी नफ़रत महसूस की. सवाल उठाना बेवकूफी थी. मैं बुरी तरह से डर गई थी.

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बनारस की हालत पिपली लाइव की तरह

मुझे लोग निडर लड़की समझते हैं फिर भी मैं डरी हुई थी. आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनकी क्लास में मुझे कितनी घुटन होती होगी. अगर पढ़ाई अच्छी होती तो उनके सात ख़ून माफ़ थे. क्लास में पढ़ाई को छोड़कर जाति और धर्म की बातें ख़ूब होती थीं.

ऐसे में कौन क्लास बर्दाश्त करेगा? यूं कहिए कि मेरी तक़दीर अच्छी थी. मोहतरमा दो साल की मैटरनिटी लीव पर चली गईं. बाक़ी के मेरे दिन सुकून से बीते. मेरे दिमाग़ में एक बात साफ़ थी कि ऐसी चीज़ें मानसिकता पर निर्भर करती हैं. मेरे दूसरे किसी भी प्रोफ़ेसर के साथ ऐसा अनुभव कभी नहीं रहा.

मेरे जितने दोस्त थे सब काफ़ी सहिष्णु थे. उन सबके साथ रहते हुए कभी हिंदू-मुस्लिम की दीवार खड़ी नहीं हुई. 2014 के आम चुनाव तक कभी एहसास नहीं हुआ कि मैं मुसलमान हूं इसलिए किसी नफ़रत को झेलना होगा.

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बनारसी संस्कृति

साल 2014 के आम चुनाव की तैयारी कैंपस के भीतर व्यापक रूप से चल रही थी. देश भर के पत्रकार हमारे डिपार्टमेंट आते थे. तब बहुत मज़ा आता था. बनारस की हालत पिपली लाइव की तरह थी. चुनाव में बनारस केंद्र में था इसलिए हर कोई इसका आनंद ले रहा था.

उस दौरान लोगों के कंधे पर रहने वाले गमछे का रंग भगवा तेजी से हो रहा था. उन गमछों से किसी को डर लगता था तो कोई आह्लादित होता था. कोई इसे बनारसी संस्कृति का हिस्सा मानता था. एक दिन डिपार्टमेंट की पार्किंग में किसी अजनबी ने आकर गाड़ी खड़ी कर दी. उसकी गर्दन में भगवा गमछा था.

मैंने अपनी दोस्त से इशारा करते हुए पूछा कि ये भगवा गमछा वाला कौन है. मेरे बैचमेट पास में ही खड़े थे. वो सज्जन बीजेपी के कम्युनिकेशन सेल के सक्रिय सदस्य थे. पता नहीं उन्हें क्या लगा और मुझे देखते हुए बोला कि भगवा रंग से इस देश को रंगना है.

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भगवा रंग

उन्होंने कहा कि जिस दिन राम मंदिर पर भगवा रंग फहराएगा उस दिन विद्रोहियों (असल शब्द बहुत ही अपमानजनक थी जिसें मैं यहां नहीं लिख सकती) का मुंह देखने लायक होगा. मैं समझ गई कि उसे बुरा लगा है.

मैं कुछ बोल ही रही थी कि मेरी बात को उसने बीच में काटते हुए कहा, "हम आईएसआईएस वालों को सुनते ही नहीं हैं. अपने देश में जाकर सुनाना." आवाजें ऊंची हुईं. कुछ उसने कहा, कुछ मैंने. मैं सोचती रही कि इतनी नफ़रत पैदा कहां से हो रही है.

किसी ने कहा कि इग्नोर कर तो किसी ने कहा कि प्रॉक्टर के पास शिकायत करो. पर मुद्दा सज़ा दिलाने या नज़अंदाज़ करने का नहीं था. मुद्दा इससे बड़ा था. मेरे लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था. मन बहुत खीझा हुआ था. मुझे लगा कि इसे भूला देना ही ठीक है.

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बीजेपी की सरकार

इसमें कोई शक नहीं है कि मेरा अच्छा अनुभव बुरे अनुभवों से ज़्यादा था. हिंदू दोस्तों के घर पूजा होती है तो आज भी वो बुलाते हैं. विश्वनाथ मंदिर पर भीम भैया पूजा करके आते थे तो मेरे लिए प्रसाद बचाकर रखते थे. मेरे हिंदू दोस्त ही मज़ाक उड़ाते थे कि देखना इसमें गोमूत्र ना हो. विश्वनाथ मंदिर भी जाती थी.

बाबा विश्वनाथ को कभी नमन किया तो कभी नहीं किया, लेकिन किसी ने कभी टोका नहीं. कोई बुरा नहीं मानता था. मैं हलाल गोश्त खाती हूं और इस बात का सभी ख़्याल रखते थे. इसीलिए वैसी ही दुकान पर जाते थे. मैं बीफ़ खाती हूं और पसंद करती हूं इसे भी मेरे दोस्त जानते थे. मुझे इन चीज़ों को कभी छुपाने की ज़रूरत नहीं पड़ी.

मेर घर की बिरयानी को मेरे दोस्त बड़े शौक से खाते हैं. बेशक जब से बीजेपी की सरकार आई है आबोहवा बदली है. बीएचयू के 100 साल पूरे होने पर जो रैली निकली थी उसमें राम मंदिर के नारे लग रहे थे. मंदिर बने या मस्जिद उसे लेकर कैंपस में क्यों रैली निकलनी चाहिए? अजीब लगने से ज़्यादा डर लगता था.

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बीजेपी और आरएसएस

ऐसा लगता था कि ये नारे लगाते हुए कहीं हिंसक ना हो जाएं. कोई उन्हें कुछ कह न दे जिससे वो भड़क जाएं. मेरा ऑफि़स भी बीएचयू में ही है इसलिए पास होने के बाद भी इससे अलग नहीं हूं. बीजेपी और आरएसएस के समर्थकों से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर जब नारे लगते हैं तो डर लगता है.

जो यहां पढ़ने आते हैं उन पर इस माहौल का क्या असर पड़ता होगा? बीएचयू में लड़कियों को तो हक़ ही नहीं है आवाज़ उठाने का. लोग भद्दी टिप्पणियों से आवाज़ दबा देते हैं. यहां प्रोफ़ेसर भी चुप रहने की सलाह देते हैं. मेरा बीएचयू से बहुत लगाव है लेकिन 2014 के बाद से कैंपस का माहौल बदला है.

मुझे इस माहौल से डर लगता है. कैंपस में अब गुंडई बढ़ गई है. सार्वजनिक स्थानों पर राजनीतिक बहस से लोग अब बचने लगे हैं. ऐसा पहले नहीं था. कैंपस 18-19 साल के लड़के कहते हैं कि मंदिर वहीं बनाएंगे तो मैं सोचती हूं कि जिसने अपना असाइनमेंट अभी तक नहीं बनाया वह मंदिर बनाने की कसम खा रहा है.

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