वो 5 वजहें जो नीतीश कुमार को महागठबंधन छोड़ने नहीं देंगी

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार क्या महागठबंधन का दामन छोड़कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का दामन थाम लेंगे और ऐसा करेंगे तो कब करेंगे.

इसे लेकर अटकलों का दौर लगातार गरम है.

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ख़ास बात ये है कि नीतीश कुमार के कुछ क़दमों से इन अटकलों को हवा मिल रही है. पहले उन्होंने महागठबंधन के सहयोगी दल लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस पार्टी से इतर जाकर नोटबंदी का समर्थन किया.

उसके बाद राष्ट्रपति चुनाव के मसले पर भारतीय जनता पार्टी के रामनाथ कोविंद के नाम का समर्थन करने की घोषणा कर दी.

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जीएसटी के मसले पर जहां कांग्रेस और राजद ने विशेष सत्र का बहिष्कार करने की बात कही, वहीं नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी की ओर से इस बैठक में भाग लेने के लिए राज्य के वाणिज्य मंत्री को भेजा और पार्टी सांसदों की मौजूदगी की घोषणा भी हुई.

इतना ही नहीं, रविवार को जनता दल यूनाइटेड की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में नीतीश कुमार ने महागठबंधन के सहयोगी दल कांग्रेस पर निशाना साधते हुए साफ़ शब्दों में कहा कि वे ना तो कांग्रेस पार्टी की तरह अपने सिद्धांतों को तिलाजंलि देते रहे हैं और ना ही वे किसी के पिछलग्गू हैं.

यानी नीतीश कुमार वो सब कर रहे हैं जिससे महागठबंधन के अस्तित्व पर सवाल उठ रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी से करीब 17 साल तक साथ रहने का उनका इतिहास भी है.

नीतीश बिहार के मुख्यमंत्री बनने से पहले अटल बिहारी वाजपेयी की केंद्र सरकार में रेल जैसे अहम विभाग के मंत्री रह चुके हैं.

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नीतीश भाजपा के साथ मिलकर 10 साल की अवधि में 'सुशासन कुमार' वाला सम्मान हासिल कर चुके हैं. ऐसे में सवाल तो उठेंगे ही.

उधर, भारतीय जनता पार्टी की बिहार इकाई ने भी नीतीश कुमार से साहस दिखाने की अपील करते हुए कहा कि वे राज्य में राजनीतिक अस्थिरता पैदा नहीं होने देंगे.

जहां तक गणित की बात है, नीतीश अगर पाला बदलकर भी बहुमत जुटा लेंगे, उनके अपने 71 विधायक हैं और राज्य में भारतीय जनता पार्टी के 53 विधायक.

लेकिन राजनीति केवल गणित से नहीं चलती, यही वजह है कि नीतीश कुमार गठबंधन से अलग नहीं हो सकते, किसी जल्दबाजी में तो बिलकुल नहीं. इसकी झलक पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी की उस बात से मिलती है, जिसमें उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा है कि गठबंधन तो साल 2025 तक भी चल सकता है.

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वो 5 वजहें जो नीतीशको महागठबंधन छोड़ने नहीं देंगी

1. मोदी सबसे अहम वजह

नीतीश कुमार मौजूदा समय में महागठबंधन से अलग नहीं हो सकते, इसकी बुनियादी वजह तो वही है जिसके चलते उन्होंने एनडीए का दामन छोड़ा था. साल 2014 के आम चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाए जाने के विरोध में नीतीश कुमार ने अलग राह पकड़ी थी.

मौजूदा समय में नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के ना केवल सर्वमान्य नेता हैं बल्कि उन्होंने दूसरे नेताओं के लिए बहुत जगह भी नहीं छोड़ी है. ऐसे में महज तीन साल के अंदर नीतीश किस तरह से मोदी का दामन थामेंगे?

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2. सहयोगी की नाममात्र भूमिका

अगर नरेंद्र मोदी के होते हुए नीतीश कुमार बीजेपी से हाथ मिलाते हैं तो उन्हें कितनी अहमियत मिलेगी, इस पर संदेह बना रहेगा.

क्योंकि मौजूदा समय में भारतीय जनता पार्टी इतनी मज़बूत स्थिति में है कि उसे किसी सहयोगी की जरूरत ही नहीं है.

केंद्र सरकार के अंदर भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टी के नेताओं की स्थिति से साफ़ है कि लोगों की सीमित भूमिकाएं हैं.

ऐसे में नीतीश कुमार जैसे कद का नेता नगण्य सहयोगी की भूमिका में आ जाए, ये फ़िलहाल संभव नहीं दिखता.

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3. महागठबंधन में रुतबा बरकरार

तमाम विरोधाभासों के बावजूद महागठबंधन में नीतीश कुमार बॉस की स्थिति में हैं.

आलोचक ये आरोप भले लगाते रहे हैं कि लालू प्रसाद अपनी चलाने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के तौर पर सरकार के मुखिया हैं.

लालू प्रसाद यादव को भी मालूम है कि मौजूदा परिस्थितियों में जब उनके बेटे और बेटियों पर अलग अलग तरह के आरोप सामने आ रहे हैं, ऐसे में वो नीतीश कुमार पर बहुत ज़्यादा दबाव नहीं बना पाएंगे.

लिहाजा जब जब नीतीश कुमार महागठबंधन की राय से अलग कोई फ़ैसला लेते हैं तो लालू को ना केवल मन मसोस कर रह जाना होता है, बल्कि ये भी कहना होता है कि सरकार पर कोई ख़तरा नहीं है.

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4. राजनीतिक अस्तित्व की चुनौती

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार भले ही कई बार मुख्यमंत्री बने हैं, लेकिन राजनीतिक ताक़त के मामले में वो तीसरे नंबर पर हैं. राज्य में संघ परिवार-बीजेपी और लालू प्रसाद यादव का राजद के बीच मुख्य मुक़ाबला है.

अगर 2015 के विधानसभा चुनाव के नतीजे को भी देखें तो भारतीय जनता पार्टी को 24.4 फ़ीसदी वोट मिले थे, जबकि राजद को 18.4 फ़ीसदी और जनता दल यूनाइटेड को 16.8 फ़ीसदी वोट मिले थे.

मौजूदा समय में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी और लालू प्रसाद यादव के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, उससे दोनों के कोर वोट बैंक के और संगठित होने की उम्मीद जताई जा रही है और इस लड़ाई में नीतीश कुमार का वोट बैंक भी बंट सकता है.

ऐसे में उन्हें हर वो रणनीति अपनानी होगी, जिससे उनकी राजनीतिक ताक़त जितनी है, उतनी से कम नहीं हो.

अगर वो एनडीए के कैंप में वापस जाते हैं तो वे मुख्यमंत्री तो बने रह सकते हैं लेकिन राज्य में उनकी अपनी राजनीतिक जमीन सिकुड़ेगी.

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5. छवि का सवाल

राजनीति काफी कुछ परसेप्शन से चलती है. अगर 17 साल पुराने एनडीए गठबंधन से नीतीश अलग हुए थे तो ये बात उभरी थी कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनाए जाने की वजह से नीतीश अलग हुए थे.

अब अगर वे महज तीन साल के अंदर फिर से पाला बदलेंगे तो उनकी राजनीतिक छवि को नुकसान ज़्यादा होगा. उनकी विश्वसनीयता कम होगी, नीतीश जैसा मंझा हुआ नेता कभी ये नहीं चाहेगा कि छवि को नुकसान हो.

ऐसे में सवाल ये है कि नीतीश कुमार बार-बार महागठबंधन के अस्तित्व को चुनौती क्यों देते रहते हैं. इसकी वजह तो यही है कि वे संदेश देना चाहते हैं कि बिहार में सरकार के मुखिया वही हैं.

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नीतीश अपने लोगों के साथ-साथ विपक्ष के लोगों को भी बताना चाहते हैं कि सरकार वही चला रहे हैं.

इसके अलावा लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के सदस्यों पर बेनामी संपत्ति जमा करने के आरोप सामने आए हैं, जांच एजेंसियां इन मामलों की जांच भी कर रही है.

ऐसे में नीतीश कुमार के लिए अपनी सुशासन कुमार वाली छवि को बनाए रखना भी ज़रूरी है और वे लालू प्रसाद ब्रिगेड को बेलगाम होने भी नहीं देते.

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