डॉक्टर बनने की राह पर खेतिहर 'बालिका वधू'

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रूपा यादव जब आठ साल की थीं तभी उनकी शादी हो गई थी.

पर अपने ससुराल वालों और पति की मदद से उन्होंने नेशनल एलिजबिल्टी कम एंट्रेंस टेस्ट में 720 में से 603 अंक पाए और पूरे भारत में उनका 2283 नंबर है.

राजस्थान की तहसील चोंमु के निवाणा गांव की रूपा यादव की शादी आठ साल की उम्र में कर दी गई थी. इसी परिवार में उनकी बड़ी बहन की शादी भी हुई थी.

ससुराल में रूपा का पूरा परिवार खेती कर अपना गुज़र बसर करते हैं और रूपा के सपने को पूरा करने के लिए उनके पति शंकर यादव का बहुत बड़ा योगदान रहा है.

बचपन से ही पढ़ने का शौक

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तीन बहनों में सबसे छोटी रूपा बचपन से ही पढने में रूचि रखती थीं. दसवीं कक्षा तक जिसमें वो 84% अंक लाई, वो अपने मां-बाप के साथ ही रहीं पर उसके बाद छुट्टियों में उन्हें अपने ससुराल जाना पड़ा.

रूपा कहती हैं, "मैं छुट्टियों में अपने ससुराल में खेतों में काम करती थी और काम करके बहुत थक जाती थी. जब छुट्टियां ख़त्म हुई और मैंने बच्चों को स्कूल जाते हुए देखा तो मैंने अपनी सास से कहा कि मुझे भी पढ़ना है तो मेरी सास ने मुझे मना नहीं किया और स्कूल में दाखिला दिला दिया."

रूपा को उनके पति शंकर के स्कूल में ही दाखिला मिला जहां उन्होंने 12वीं कक्षा में 84% अंक हासिल किए.

अंकल की मौत

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एक दिन रूपा ने बस यूं ही चश्मा पहन लिया तो घर के लोग उन्हें डॉक्टर कहकर पुकारने लगे. रूपा ने अपनी सास से इसका मतलब पूछा और उनकी सास ने डॉक्टर का मतलब समझाया.

पर आखिर डॉक्टर बनने के बारे में ही क्यों सोचा रूपा ने?

रूपा ने कहा, "मेरे अंकल की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी और तभी से मैंने सोच लिया था कि मैं डॉक्टर ही बनूंगी."

बारहवीं कक्षा में पैसों की तंगी के कारण और रूपा की प्रतिभा को पहचानते हुए स्कूल वालों ने उनसे फ़ीस नहीं ली.

स्कूल के बाद उन्होंने बीएससी में दाखिला लिया और साथ ही मेडिकल एंट्रेंस के लिए फ़ॉर्म भी भरा जिसमें उनके बिना कोचिंग लिए 423 अंक आए.

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रूपा ने कहा, "सब बहुत ख़ुश थे कि बिना कोचिंग के मेरे इतने अच्छे नंबर आए. फिर हमारे पड़ोसी ने कहा कि मुझे मेडिकल के लिए कोचिंग करनी चाहिए जिस पर घर के लोग राज़ी हो गए और फिर मैं कोटा जाकर रहने लगी."

वे कहती हैं, "अगले साल 2016 में मेरे 506 नंबर आए और मुझे महाराष्ट्र का कॉलेज मिल रहा था तो मैं वहां नहीं जा पाई. घरवालों को भी मेरे नंबर देखकर खुशी हुई और उन्होंने फिर ठान ली कि अब तो मुझे डॉक्टर बनाकर ही दम लेंगे."

एक साल और पढाने के लिए रूपा के पति और जीजाजी ने काफ़ी काम किया. खेती के अलावा वो बाज़ार से सामान लाने ले जाने का काम भी करते रहे.

कई ख़बरों में बताया गया कि रूपा के पति और जीजाजी ऑटो चलाते थे पर ऐसा नहीं है. वो सब्ज़ियों को मार्केट पहुंचाने के लिए पिकअप गाड़ी चलाते थे.

बाल विवाह की प्रथा पर रूपा ने कहा कि अब ऐसा नहीं होना चाहिए और मां बाप को बच्चों को पढाना चाहिए.

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2017 में आ गया नंबर

इस साल रूपा के एनईईटी (नेशनल एलिजबिल्टी कम एंट्रेंस टेस्ट) में 720 में से 603 अंक आए और पूरे इंडिया में उनका 2283 नंबर है. उनका पूरा परिवार इससे बहुत ख़ुश हैं.

रूपा के पति शंकर कहते हैं, "मैंने जो सपना देखा था वो सच हो गया. हमने रूपा के लिए काफ़ी मेहनत की थी और इसने हमारा नाम रोशन कर दिया. रैंक अच्छी आने की वजह से हमें उम्मीद है कि रूपा को जयपुर में ही किसी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल जाएगा."

पर मेडिकल कॉलेज की फ़ीस?

शंकर इस पर बताते हैं कि इसके लिए वो और मेहनत करेंगे और पैसे जुटाएंगे, लोगों से उधार भी ले लेंगे पर रूपा को डॉक्टर बना कर रहेंगे.

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