'सोचा नहीं था भारत-इसराइल इतने क़रीब होंगे'

मैं 1970 के दशक में सपने में भी सोच नहीं सकता था कि भारत और इसराइल इतने क़रीब होंगे.

उस दौर में दोनों देशों के रिश्तों को लेकर बहुत विरोध था. मुझे सबसे ज्यादा आश्चर्य उस समय ये हुआ कि हमारे हिंदू भाई भी कह रहे थे कि इससे अस्थिरता हो जाएगी. इसराइल पिट्ठू है अमरीका का. उसके साथ क्या रिश्ता रखना?

उस वक़्त ऐसी हवा थी कि सब लोग हमारी इस बात पर निंदा करते थे कि हम इसराइल के प्रेमी हैं.

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साल 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तब हमारी पार्टी के जो जनसंघ घटक थे उनमें भी ये था कि नहीं अभी इतनी जल्दी नहीं करनी चाहिए.

उस समय मैंने इसराइल के फ़िलहार्मोनिक ऑर्केस्ट्रा के कंडक्टर ज़ुबिन मेहता को आमंत्रित किया और वो तैयार भी हो गए, लेकिन तब विदेश मंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि इससे 25 अरब देश नाराज़ हो जाएंगे.

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तब के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और चंद्रशेखर तैयार थे, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की बहुत चलती थी. वो सबसे बड़े घटक के नेता थे. उन्होंने वो कार्यक्रम होने नहीं दिया.

मोरारजी देसाई ने मोशे डेयान (इसराइल के पूर्व रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री) को भी गुप्त रूप से आने के लिए कहा. वो भी एक संकेत है कि वो उनको खुलेआम बुलाने के लिए तैयार नहीं थे.

मोशे डेयान छ्द्म नाम पर आए थे. उनसे बातचीत हुई थी. जब वे बाहर निकले तो वाजपेयी ने कहा, 'नहीं-नहीं कभी ऐसी मीटिंग नहीं हुई' जबकि वो मीटिंग में उपस्थित थे.

साल 1981 में मैं संसद में जनता पार्टी का उपनेता था तब इसराइल के प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन ने मुझे आमंत्रण भेजा. उस वक्त संसद में बहुत हंगामा हुआ.

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भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं. उन्होंने मुझे कहा कि आप मत जाएं. इससे बड़ी ग़लतफ़हमी होगी. लेकिन मैं गया. उसके बाद से देश में मत बदलने लगा.

साल 1990 में चंद्रशेखर सरकार में मैं वरिष्ठ मंत्री था. हमने इसराइल से संबंध बनाने की प्रक्रिया शुरू की और नरसिंह राव ने इसे पूरा किया.

इसराइल के साथ बेहतर रिश्ते करने में मेरी भावना की अहम भूमिका थी. हार्वर्ड में मेरे सारे शिक्षक यहूदी थे. उन्होंने मेरा करियर उसी तरह संवारा जैसे कि एक पिता करते हैं. फिर मैंने देखा कि यहूदियों के साथ बड़ा भेदभाव हो रहा है. हिंदुस्तान एकमात्र देश था जहां यहूदियों का नरसंहार नहीं हुआ.

इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक्स में उनके काम से भी मैं प्रभावित हुआ.

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इसराइल के लिए पहला वीज़ा भी मेरे घर से ही साल 1989 में जारी हुआ था. वीपी सिंह की सरकार में इंद्र कुमार गुजराल विदेश मंत्री थे. वो इसराइल के ख़िलाफ़ थे.

इसराइल का छोटा-सा कॉन्सुलेट था. वो पत्रकारों को ले जाना चाहते थे. पत्रकार वीज़ा के लिए मुंबई जाने को तैयार नहीं थे. अधिकारियों ने ये तय किया कि वो दिल्ली आएंगे.

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विदेश मंत्रालय को सूचना दी गई तो उन्होंने कहा कि वो नहीं आ सकते हैं. इसके बाद मैंने गुजराल से बात की. इसके बाद मैंने कॉन्सुलेट अधिकारियों से कहा कि वो मेरे घर आकर वीज़ा दे सकते हैं. उन्होंने कहा कि हमें इसराइल का झंडा छत पर लगाना होगा. इसके बाद एक तरफ़ भारत और दूसरी तरफ़ इसराइल का झंडा लगाकर वीज़ा जारी हुआ.

इसराइल दौरे के ज़रिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक संकेत दे रहे हैं कि हम राष्ट्र हित में एक रिश्ता बनाएंगे.

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देश की सुरक्षा के दृष्टि से जो ठीक समझेंगे वो करेंगे. जो हमारे साथ हैं हम उनके साथ हैं. प्रधानमंत्री ये संकेत दे रहे हैं.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ़लस्तीनी क्षेत्र नहीं जा रहे हैं और वहां जाने की ज़रूरत भी क्या है?

फ़लस्तीनी क्षेत्र हमास की पकड़ में है जो कहते हैं कि हम इसराइल को ध्वस्त करेंगे.

इसराइल हमारी बहुत मदद करता है. हम दोनों को बराबर तो मान नहीं सकते हैं. फ़लस्तीनी क्षेत्र कश्मीर के मुद्दे पर लीपापोती करता है.

(बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय से बातचीत के आधार पर)

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