नज़रिया: 'बंगाल में बीजेपी और ममता का अपना-अपना खेल'

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पश्चिम बंगाल के 24 परगना ज़िले में एक विवादित फ़ेसबुक पोस्ट के बाद हिंसा हुई है.

ये हिंसा पश्चिमी बंगाल की मनोवैज्ञानिक भावना के ख़िलाफ़ है.

ये हिंसा दो धारी तलवार है और पश्चिम बंगाल के समाज को बांट रही है लेकिन इससे कुछ दलों को राजनीतिक फ़ायदा भी पहुंच रहा है.

भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में हिंदू पहचान और हिंदू अस्मिता का कार्ड खेला है.

भले ही ये ठीक न हो लेकिन इससे भाजपा को राजनीतिक फ़ायदा मिलना तय है.

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इसकी एक वजह ये भी है कि राज्य में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस मुसलमानों में अति सुरक्षा की भावना भरने की कोशिश कर रही है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक ख़ास समुदाय का पक्ष लेती दिखती हैं. ये लोगों को भावनात्मक रूप से ब्लेकमेल करने जैसा है.

ठीक उसी तरह बीजेपी भी हिंदू पहचान और हिंदुत्व को मिलाकर लोगों की भावनाओं को ब्लेकमेल कर रही है.

अमित शाह ने कुछ महीने पहले कहा था कि अब तक पूरे देश में 240 सीटे ऐसी हैं जहां बीजेपी नहीं पहुंच पाई है.

'...तो फिर ख़ुदा ही मुसलमानों की ख़ैर करे!'

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ये सीटें पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में हैं और इनमें पश्चिम बंगाल भी है.

बीजेपी इन सीटों को जीतना चाहती है और इसी उद्देश्य से ये कार्ड खेला जा रहा है.

राज्य में 28 फ़ीसदी मुस्लिम वोटर हैं. लेकिन ये पक्का नहीं है कि ये सब ममता बनर्जी को ही मिलेंगे.

राज्य में ये संदेश गया है कि ममता बनर्जी ने इस वोटर वर्ग को रिझाने की कोशिशें की हैं.

अब इसी तरह की कोशिशें बीजेपी हिंदू वोटरों को रिझाने के लिए कर रही हैं.

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ये सब जो राज्य में हो रहा है ये संविधान की धर्म निरपेक्ष की भावना के ख़िलाफ़ भले हो लेकिन ऐसा लगता नहीं कि राजनीतिक दलों की इसकी परवाह है.

वहीं ताज़ा हिंसा के बाद राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच भी तनाव बढ़ गया है.

हालांकि ये पश्चिम बंगाल के लिए कोई नई बात नहीं है. इससे पहले धरमवीर और गोपाल गांधी के समय में भी ये टकराव रहा है.

लेकिन राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच हुए तनाव का फ़ायदा असामाजिक तत्व उठा रहे हैं जो बंगाल के लिए ठीक नहीं है.

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