मुख्य चुनाव आयुक्त क्या सरकार का आदमी होता है?

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Image caption अचल कुमार जोती

देश के नए मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार जोती ने पदभार संभालने के बाद कहा कि चुनाव आयोग उचित, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव के लिए प्रतिबद्ध रहेगा.

जोती ने बीते गुरुवार को कार्यभार संभाला.

इसके पहले, बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि केंद्रीय चुनाव आयोग में चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोई क़ानून क्यों नहीं बनाया गया है?

कोर्ट ने केंद्र से यह भी पूछा कि इसे लेकर अब तक कोई कानून क्यों नहीं बनाया गया जबकि संविधान में इसका प्रावधान है कि चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति क़ानून के तहत होगी.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने उठाई थी मांग

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सुप्रीम कोर्ट के सवाल को ठीक बताते हुए फ़रवरी 2004 से मई 2005 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएस कृष्णमूर्ति का कहना है कि जब वह मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तब उन्होंने आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक पारदर्शी प्रक्रिया की सिफ़ारिश की थी ताकि लोगों का विश्वास बरक़रार रहे.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की तरह कृष्णमूर्ति का भी कहना है कि सरकार ने अभी तक ठीक लोगों को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया है.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त और यूपीए सरकार में खेल मंत्री रहे डॉ एमएस गिल नियुक्ति प्रक्रिया पर कहते हैं, "मैं 1996 से 2001 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहा. मैंने 17 साल पहले इस मुद्दे को उठाया था. उस वक्त मैंने कहा था कि आयुक्तों की नियुक्ति सरकार पर न छोड़ी जाए और यह नई बात नहीं है."

गिल कहते हैं कि अब तक जितने चुनाव आयुक्त आए वह 'खुशकिस्मती' से अच्छे आए लेकिन यह गारंटी नहीं है कि आगे भी अच्छे आएंगे.

उनका कहना है कि चुनाव का काम बहुत बड़ा और ज़िम्मेदारी का होता है और जनता का भरोसा इस पर तभी रह सकता है, जब चुनाव करवाने वाले निष्पक्ष तरीके से नियुक्त हों.

कैसे होती है नियुक्ति

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वर्तमान में चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति करते हैं.

कृष्णमूर्ति का कहना है, "कई देशों में नियुक्ति में विपक्ष के नेता या सीधे संसद भी शामिल होती है. इसी तरह भारत में भी नियुक्ति के लिए क़ानून का होना ज़रूरी है या फिर विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है."

गिल कहते हैं कि सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति में विपक्ष के नेता की भूमिका होती है तो मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पद पर बैठने वाले व्यक्ति की नियुक्ति के लिए कोई क़ानून क्यों नहीं हो सकता है और इसकी ज़रूरत अब अधिक है क्योंकि पिछले 18 सालों में राजनीतिक तनाव बढ़ा है.

सरकार का मुख्य चुनाव आयुक्तों पर होता है दबाव?

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केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाने पर क्या मुख्य चुनाव आयुक्तों पर केंद्र का दबाव होता है.

इस सवाल पर कृष्णमूर्ति कहते हैं, "एक या दो छोटी घटनाओं को छोड़कर कभी भी चुनाव आयुक्तों पर दबाव नहीं देखा गया है. ऐसा हो सकता है कि भविष्य में कुछ ग़लत लोग आएं जिससे वो सरकार से प्रभावित हों."

इस मामले की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण कहते हैं कि सरकार एक राजनीतिक दल द्वारा चलाई जाती है फिर चुनाव कराने वाली संस्था का प्रमुख वह कैसे नियुक्त कर सकती है.

वो कहते हैं कि लोकतंत्र के लिए चुनाव आयोग बेहद अहम संस्था है और इसी के लिए कोई क़ानून नहीं है.

क़ानून बनने में देरी और केंद्र सरकार में रहते हुए ऐसे किसी क़ानून की पहल करने के सवाल पर गिल कहते हैं, "मैं बाद में राज्यसभा में आ गया और राष्ट्रमंडल खेलों के लिए केंद्रीय मंत्री रहा जिसका इससे कोई संबंध नहीं है. पर मैं अभी भी इसको लेकर लिख रहा हूं."

दो महीने बाद होगी इस पर सुनवाई

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प्रशांत कहते हैं कि 'संविधान में प्रावधान है कि जब तक कोई क़ानून नहीं बनता है तब तक राष्ट्रपति चुनाव आयोग के सदस्य नियुक्त करेंगे और कानून में देरी की वजह अलग-अलग सरकार की अपनी वजहें रही हैं.'

वो कहते हैं कि एक बार आयुक्त नियुक्त होने के बाद सरकार केवल महाभियोग के ज़रिए ही उन्हें हटा सकती है.

करीब दो महीने के बाद सुप्रीम कोर्ट फिर इस मामले की सुनवाई करेगा और उस समय देश के नए मुख्य न्यायाधीश की पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी.

इस पर प्रशांत भूषण कहते हैं कि उन्हें उम्मीद है कि सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति के लिए जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने क़ानून बनाने के लिए कहा था, उसी प्रकार से इसे लेकर भी सुप्रीम कोर्ट आदेश दे सकता है.

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