मुसीबतों के बवंडर से निकल पाएँगे लालू प्रसाद यादव?

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2015 में भारतीय जनता पार्टी को बिहार चुनाव में महागठबंधन की रणनीति अपनाकर हराने वाले लालू प्रसाद यादव अपने राजनीतिक जीवन में दूसरी बार मुसीबतों के बवंडर में फंसे नज़र आ रहे हैं.

चारा घोटाले का मामला शुरू होने के बाद 1997 में बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के बाद लालू प्रसाद का सीबीआई और कोर्ट कचहरी का सिलसिला जो शुरू हुआ वो बीते 20 साल से लगातार बना हुआ है.

चारा घोटाला मामले ने लालू प्रसाद की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर ना केवल अंकुश लगाया, बल्कि इसके एक मामले में दोषी क़रार दिए जाने के चलते वे फिलहाल चुनाव लड़ने के योग्य भी नहीं हैं.

बावजूद इसके लालू प्रसाद यादव एक राजनीतिक ताक़त बने रहे. जब मीडिया में हर ओर लालू का राजनीतिक करियर ख़त्म बताने की होड़ मची हुई थी, उस वक्त 2015 में उनकी पार्टी जोरदार प्रदर्शन के साथ जद (यू) और कांग्रेस के साथ बिहार में सरकार बनाने में कामयाब रही.

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लालू पिछले कुछ समय से विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं. इस सिलसिले में उनका आगामी 27 अगस्त को पटना में एक बड़ी रैली करने की योजना है. लेकिन उनकी इन कोशिशों को बड़ा झटका लग सकता है क्योंकि सीबीआई ने उन पर संगीन आरोप लगाए हैं.

सीबीआई ने लालू प्रसाद, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और बेटे तेजस्वी यादव के ख़िलाफ़ 420 और 120-बी के तहत धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश का मुकदमा दर्ज कराया है.

लालू प्रसाद यादव ने रांची में चारा घोटाले में सीबीआई कोर्ट की पेशी के बाद कहा है कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनके ख़िलाफ़ साजिश कर रही हैं और इस मामले में उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है.

राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता प्रगति मेहता बताते हैं, "लालू जी पर ये कार्रवाई नरेंद्र मोदी की सरकार के इशारे पर हुई है. वे उनकी आवाज़ को बंद कराना चाहते हैं, उन्हें झुकाना चाहते हैं लेकिन हमारी रैली होगी और अब दोगुनी ताक़त से होगी."

क़ानून कर रहा है अपना काम

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हालांकि केंद्र सरकार के मंत्री वेंकैया नायडू ने इन आरोपों पर कहा है कि क़ानून अपना काम कर रहा है, सीबीआई अपना काम कर रही है और इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है.

तीसरे मोर्चे के नेताओं की राजनीति पर क़रीबी से नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, "लालू प्रसाद पर संगीन आरोप लगाए गए हैं, उसमें क्या सच है और क्या झूठ इसका पता तो जांच पूरी होने के बाद चलेगा, लेकिन पहली नज़र में ऐसा लग रहा है कि ये सब विपक्ष को एकजुट करने में लगे हुए लालू प्रसाद को परेशान करने के उद्देश्य से किया जा रहा है."

सीबीआई के अतिरिक्त निदेशक राकेश अस्थाना ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जानकारी दी, "रेलमंत्री रहते हुए उन्होंने एक निजी होटल कंपनी सुजाता होटल्स को फ़ायदा पहुंचाया. इस कंपनी को रेलवे के पुरी और रांची स्थित होटलों को लीज़ पर दिया गया और इसमें नियमों का ध्यान नहीं रखा गया. इस कंपनी ने दो एकड़ ज़मीन प्रेमचंद गुप्ता की कंपनी डिलाइट मार्केटिंग को दी, जिसका स्वामित्व बाद में हस्तांतरित होकर लारा (लालू-राबड़ी) प्रोजेक्ट्स के पास आ गया."

लेकिन शायद लालू को ऐसी कार्रवाई की आशंका पहले से ही थी, लिहाजा बीती चार जुलाई को उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के स्थापना दिवस पर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से कहा था, "भारतीय जनता पार्टी की कोशिश तो हमें जेल भेजने की है."

वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार जयशंकर गुप्त के मुताबिक इस कार्रवाई के दो उद्देश्य हैं, "एक तो लालू प्रसाद यादव की ताक़त को कमज़ोर करना ताकि वे विपक्ष को एकजुट नहीं कर पाएं और दूसरी ओर बिहार की महागठबंधन सरकार का अस्तित्व भी ख़तरे में आ जाए."

लालू पर संगीन हैं आरोप

प्रगति मेहता कहते हैं, "जो आदमी सामाजिक न्याय की बात करेगा, ग़रीब गुरबों को हक़ देने की बात करेगा, ऊंच-नीच को एकसमान करने की बात करेगा, मौजूदा सिस्टम उसी पर शिकंजा कसेगा और ये तो लालू जी के राजनीतिक करियर में शुरू से हो रहा है."

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लेकिन, अहम सवाल यह है कि सामाजिक न्याय और विपक्ष की राजनीति के नाम पर लालू क्या करप्शन में शामिल होने की छूट लेना चाहते हैं, जयशंकर गुप्त कहते हैं कि ये छूट तो किसी को नहीं मिल सकती है, लालू को भी नहीं मिलनी चाहिए.

वहीं नीरजा चौधरी कहती हैं, "लालू विपक्ष की लड़ाई का सबसे मज़बूत चेहरा ज़रूर हैं, लेकिन उनकी एक ख़ामी उनकी राजनीति पर भारी पड़ रही है, उन पर जिस तरह के आरोप लग रहे हैं, वो परिवार के नाम पर संपत्ति जमा करने के आरोप हैं. क्षेत्रीय नेताओं पर ऐसे आरोप पहले भी रहे हैं और लालू भी उनमें शामिल हो गए हैं. चारा घोटाले का दाग़ भी उनपर लगा हुआ है."

ऐसे में एक सवाल ये भी उठता है कि लालू की राजनीति का क्या होगा, क्या वे बिहार में एक राजनीतिक ताक़त बने रहेंगे. इस बारे में जयशंकर गुप्त कहते हैं, "देश की जनता सबकुछ समझ रही है. एक ओर व्यापामं जैसा महाघोटाला है जिस पर सीबीआई कुछ नहीं करती है और दूसरी तरफ़ लालू के ख़िलाफ़ मामला. सीबीआई जिस तरह से काम कर रही है, उससे वही धारणा सच साबित हो रही है कि ये एजेंसियां सरकार की पिट्ठू होती हैं."

लालू ताक़त बने रहेंगे?

नीरजा चौधरी कहती हैं, "लालू प्रसाद का अभी भी बड़ा जनाधार है, वे लोगों को उनके अंदाज़ में कनेक्ट करना बख़ूबी जानते हैं. ये दूसरी बात है कि वे सामाजिक न्याय की लड़ाई से आगे नहीं बढ़ पाए लेकिन अभी वे ताक़त बने रहेंगे."

लालू राजनीतिक ताक़त बने रहेंगे, उनकी विरासत को संभालने के लिए बेटे और बेटी भी धीरे-धीरे राजनीति में अपने पांव जमाते दिख रहे हैं.

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उनके बेटे तेजस्वी यादव ने सीबीआई की कार्रवाई से पहले अपनी पार्टी के नेताओं से कहा, "हम तो बचपन से सीबीआई की जांच का सामना कर रहे हैं. इससे हम लोगों को घबराना नहीं है और ना ही झुकना है."

लालू प्रसाद यादव के क़रीबियों की मानें तो राज्य के ग़रीब गुरबों में अभी भी लालू की छवि किसी मसीहा से कम नहीं है, हालांकि भ्रष्टाचार के मामलों ने लालू प्रसाद को सत्ता की राजनीति से किनारे कर दिया है.

जहां तक उन पर चलने वाले मामलों की बात है कि 950 करोड़ रुपये के चारा घोटाले में कुल 64 मामले दर्ज हुए थे और इनमें छह में लालू प्रसाद भी अभियुक्त बनाए गए.

इसके एक मामले, चाईबासा में 37.7 करोड़ रुपये की निकासी और उसमें धांधली के आऱोप में लालू दोषी क़रार दिए गए हैं, उनहें पांच साल की सजा मिली थी और अभी वे ज़मानत पर बाहर हैं.

ख़ुद से ज़्यादा बेटे की चिंता

बाक़ी बचे पांच मामले में एक की सुनवाई सीबीआई की विशेष अदालत में फिर से शुरू हुई है और इसके चलते ही लालू प्रसाद को हर सप्ताह रांची जाना पड़ रहा है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक सीबीआई कोर्ट को नौ महीने में इस मामले में फ़ैसला लेना है.

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लेकिन इस मुश्किल दौर में लालू प्रसाद यादव को अपने भविष्य की चिंता कम होगी, अपने बेटे-बेटियों के भविष्य की चिंता ज़्यादा. जिस तरह से भ्रष्टाचार के आरोपों में तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव और मीसा भारती का नाम आ रहा है, वह उनको ज़्यादा परेशान कर रहा होगा.

यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव अपने राजनीतिक करियर के सबसे मुश्किल दौर में दिखाई दे रहे हैं. नीरजा चौधरी कहती हैं, "1997 में तो उन्होंने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर सबको हैरान कर दिया था. अब वे क्या करते हैं ये देखने वाली बात होगी?"

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