मॉब लिंचिंग पर रोक कैसे लगेगी?

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पिछले हफ़्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि गाय के नाम पर हत्या "स्वीकार्य नहीं" है.

उनकी इस टिप्पणी के कुछ ही घंटे बाद कथित तौर पर भीड़ ने एक मुस्लिम व्यक्ति को मार डाला. भीड़ में शामिल लोगों का इल्जाम था कि वो व्यक्ति अपनी कार में बीफ़ ले जा रहा था.

प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में गाय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करने वाला जानवर बन चुका है और धर्मों के बीच खाई गहरी होती जा रही है.

गाय की बिक्री और बूचड़खानों पर लगी पाबंदियों ने इसे और हवा दी है.

भारत में भीड़ के हाथों हत्या यानी मॉब लिंचिंग के मामलों में हुए इजाफे ने बहुतों को परेशान कर रखा है.

ज्यादातर बीजेपी शासित प्रदेशों में मुसलमान हिंदू भीड़ के हाथों मारे जा रहे हैं. उनके ऊपर बीफ़ रखने का इल्ज़ाम लगाकर इसे अंज़ाम दिया जा रहा है.

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मीडिया रिपोर्टों से इकट्ठा किए गए आकड़ों के आधार पर यह बहस तेज़ हो गई है कि मोदी सरकार में नफ़रत के नाम पर किए जाने वाले अपराध बढ़े हैं. लेकिन बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह इससे इंकार करते हैं.

उनका कहना है कि पिछली कांग्रेस सरकार में ज्यादा मॉब लिंचिंग हुई है.

जब एक जाने माने पत्रकार ने यह कहा कि भारत 'लिंचोक्रेसी' बन चुका है, तब सोशल मीडिया पर उनकी इस टिप्पणी की यह कहते हुए आलोचना की गई कि भारत में भीड़ के हाथों हिंसा और धार्मिक हिंसा का लंबा इतिहास रहा है. उदारवादी हाल की घटनाओं को ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे हैं.

बीजेपी के एक सांसद और स्तंभकार ने लिखा है, "भारत की सार्वजनिक संस्कृति में हिंसा की प्रवृति हमेशा से रही है और आज़ादी के समय से ही भीड़ के हाथों होने वाली हिंसा की आड़ में राजनीतिक हिंसा होती रही है जो राजनीतिक फायदे और न्याय के लिए होती है."

हिंसा की संस्कृति

मैंने देश के एक जाने-माने इतिहासकार संजय सुब्रह्मणयम से जब भारत में हिंसा के सांस्कृतिक इतिहास के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि हिंसा को तीन प्रकारों में बांटकर देखना इस मामले में सही होगा.

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ये इस तरह से होती हैं- सामूहिक हत्याएं (किसी जातीय समूह का नरंसहार), भीड़ की हिंसा और सामाजिक मान्यताओं को बचाने लिए होने वाली हत्याएं.

संजय बताते हैं कि सामूहिक हत्याओं के दौरान, "एक बहुसंख्यक समाज अल्पसंख्यक समाज को निशाना बनाता है और इस मामले में बड़े स्तर पर हिंसा होती है. ये आम तौर पर बार-बार होती हैं. इसे व्यवस्थित तरीके से अंजाम दिया जाता है और इसमें खास तबके को निशाना बनाया जाता है."

वो बताते हैं कि भीड़ जिस हिंसा को अंजाम देती है, वो आमतौर पर छोटे स्तर पर किया जाता है.

इसमें इंसाफ करने का दावा किया जाता है, क्योंकि कानून को कमजोर बताया जाता है.

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वो कहते हैं, "चोरी-डकैती या कभी-कभी किसी कार दुर्घटना में भी भीड़ इकट्ठा हो जाती है और ड्राइवरों को पीट-पीट कर मार डालती है. ऐसा इस मान्यता के कारण होता है कि कानून जो कहता है वो करता नहीं है."

मानसिक रूप से बीमार

इतिहासकार संजय सुब्रह्मणयम आगे कहते हैं, "मुझे इस बात का शक है लेकिन मैं इसे साबित नहीं कर सकता कि जो लोग इस तरह की वारदातों को अंज़ाम देते हैं, वो मनोरोगी होते हैं और इससे उन्हें ताकतवर होने का बोध होता है. मैं यकीन नहीं कर सकता कि मानसिक रूप से सामान्य इंसान इस तरह की भीड़ का हिस्सा हो सकता है."

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तीसरी तरह की जो हिंसा है, वो आज देश में चिंता की विषय बनी हुई है.

संजय सुब्रह्मणयम कहते हैं, "तीसरी तरह की हिंसा वो है जिसमें एक समूह यह मानता है कि कुछ रूढ़िवादी सामाजिक मान्यताओं की किसी भी हालत में सुरक्षा होनी चाहिए. चाहे वो कानून के ख़िलाफ़ ही क्यों ना हो. इस तरह की हिंसा में लोगों को पता होता है कि वो जो कर रहे हैं, वो ग़ैर-क़ानूनी है. लेकिन फिर भी यह महसूस करते हैं कि वो सही है."

वो बताते हैं, "इस तरह की हिंसा में अमरीका में काले लोगों की लिंचिंग, भारत में जाति से बाहर शादी करने वालों की हत्या, 'डायन' के नाम पर हत्या और अब बीफ़ को लेकर हत्याएं शामिल हैं. ये जरूर है कि इसमें सामूहिक हिंसा वाली श्रेणी से कम हत्याएं होती हैं, लेकिन इसके अंदर एक डर पैदा करने का संदेश छुपा होता है ताकि रूढ़िवादी चीजों को बचाया जा सकें."

वे कहते हैं, "भारत में जो कुछ हो रहा है उसे लेकर केंद्र सरकार और राज्य सरकारें आंखें बंद करके बैठी हुई है. स्पष्ट है कि क़ानून के राज को खोखला किया जा रहा है."

कैसे लगेगी लगाम

संजय सुब्रह्मणयम मानते हैं, "इस तरह की हिंसा देश के कई हिस्सों में हो रही है क्योंकि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदू कट्टरवादी संगठन समाज में इस तरह की रूढ़िवादी धारणाओं को बचाने में सक्रिय तौर पर लगे हुए हैं. इसी तरह के कई संगठन मुस्लिम समाज में भी है और इसी तरह से काम करते हैं."

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उनका मानना है कि हिंसा ख़त्म करना बहुत मुश्किल है क्योंकि, "यह छिटपुट और अव्यवस्थित तरीके से होती है. यह सिर्फ कानून और उसकी प्रक्रिया में समाज का विश्वास कायम करके ही किया जा सकता है."

वो आगे कहते हैं, "सख्ती से कानून लागू करके और गुनाहगारों को सज़ा देकर इस पर लगाम कसी जा सकती है. इसे अंजाम देने वालों और ऐसे तत्वों को पैदा करने वाले संगठनों पर नज़र रखी जा सकती है. लेकिन सवाल उठता है कि जिनके ऊपर यह जिम्मेवारी है, उन पर कौन नज़र रखेगा?"

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