ग्राउंड रिपोर्ट: 'हमला करने वाले कहां से आए पता नहीं'

पश्चिम बंगाल में हिंसा

पश्चिम बंगाल के 24 परगना ज़िले में पिछले एक हफ़्ते से जारी सांप्रदायिक हिंसा और तनाव के चलते मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विपक्षियों को आड़े हाथ लेने के साथ ही न्यायिक जांच के भी आदेश दिए हैं.

उधर, भाजपा समेत विपक्षी दलों का आरोप है कि राज्य सरकार सांसदों को इलाके में प्रवेश करने की अनुमति जान-बूझ कर नहीं दे रही हैं.

मामला शुरू कहाँ से हुआ और ख़ौफ़ का मंज़र क्या है, यही जानने के लिए बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव पहुंचे बदूरिया.

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तेज़ बारिश और जले हुए से एक वीरान घर के पड़ोस में एक 32 वर्षीय महिला चूल्हे पर खाना पका रही है. आँगन में उनके दो बच्चे खेल रहे हैं और महिला की देवरानी तख़्त पर बैठी सब्ज़ियां काट रही है.

प्रांगण में मेरे दाखिल होते ही महिला ने अपने पति के लिए गुहार लगाई और बांग्ला में बोली, "आप मुझसे क्या पूछने आए हो".

मागुरखली गाँव में आज ज़बरदस्त बारिश हुई है और इस मुस्लिम महिला रीना मंडल को अफ़सोस है कि ये बारिश उस दिन क्यों नहीं हुई जब 'एक अनजान भीड़ मेरे हिंदू पड़ोसी का घर जला रही थी'.

पश्चिम बंगाल में हिंसा तब शुरू शुरू हुई थी जब रीना मंडल के पड़ोसी, 11वीं कक्षा के छात्र, ने एक फ़ेसबुक पोस्ट शेयर की जिसमें मुसलमानों के पवित्र स्थान काबा की एक छेड़छाड़ की हुई तस्वीर थी.

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विवादित फेसबुक पोस्ट

इस छात्र को तो हिरासत में ले लिया गया लेकिन 24 परगना ज़िले में हिंसा की वारदातें बढ़ती गईं. छात्र की पड़ोसी रीना मंडल उस ख़ौफ़नाक रात को याद कर सिहर उठती हैं.

उन्होंने कहा, "जिन सैकड़ों लोगों ने हमारे बगल के घर में हमला किया उन्हें तो हमने कभी देखा तक नहीं था. हमारे गाँव में मुसलमान-हिंदू हमेशा साथ रहे लेकिन ये हमला करने वाले कहाँ से आए पता नहीं. बच्चों को घरों के अंदर दबाकर यही सोचते रहे कि हम कहाँ भागें. यकीन नहीं होता कि पूजा में जिसके घर जाते थे, जो हमारे यहाँ ईद पर आता था वहां ये सब हो गया."

उस विवादित फ़ेसबुक पोस्ट को एक हफ़्ते होने को आए लेकिन पूरे ज़िले में अभी भी धारा 144 लगी हुई है.

बदूरिया, बशीरहट और देगांगा में पत्रकार जाने से घबरा रहे हैं और स्थानीय लोग आपके हाथ में कैमरा तो दूर मोबाइल फ़ोन तक देखना पसंद नहीं करते.

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इंटरनेट पर पाबंदी

पिछले एक हफ़्ते से राज्य प्रशासन ने इलाके में इंटरनेट सुविधाएं बंद कर दी हैं. इसके बावजूद लगभग सभी के मोबाइल फ़ोन में उस विवादित फ़ेसबुक पोस्ट की तस्वीर भी है और हिंसा की घटनाओं की भी.

लेकिन ज़्यादातर को इस बात का अंदाजा नहीं है कि तस्वीरों का स्रोत क्या है. बहराल, मैंने हिरासत में लिए गए उस छात्र के एक मित्र के घर का दरवाज़ा खटखटाया.

जिस युवक ने डरते हुए दरवाज़ा खोला उसका पहला सवाल था, "आप मीडिया से हो तो निकल जाओ, मुझे नहीं फँसना."

काफ़ी देर बाद वो बात के लिए तैयार हुआ और वो भी ऑफ़ द रिकॉर्ड यानी बिना तस्वीर खिंचवाए नाम बताए.

सुरक्षा बलों की तैनाती

उन्होंने बताया, "हम लोगों को तो घरवालों ने कई दिनों के लिए बाहर भेज दिया था. कल शाम लौटे हैं. अंदाजा ही नहीं लगा कि सोशल मीडिया क्या से क्या करा सकता है. मुझे अपने दोस्त के परिवार के बारे में भी नहीं पता कि वो कहाँ हैं".

पश्चिम बंगाल में इस मामले की बाद हुई हिंसा की घटनाओं की जांच के लिए ममता बनर्जी सरकार ने एक न्यायिक आयोग के गठन की घोषणा की है.

इस घोषणा के पहले मुख्यमंत्री और राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी के बीच हिंसा रोकने और प्रशासन की भूमिका को लेकर हुई 'तनातनी' पर मीडिया में ख़बरें भी छपती रहीं हैं.

इलाके में स्थानीय पुलिस के अलावा केंद्रीय सुरक्षा बलों की भी तैनाती जारी है, लेकिन तनाव में कोई कमी नहीं है.

मागुरखली गाँव बदूरिया क्षेत्र में आता हैं जहाँ पिछले कई दिनों से कारोबार ठप है, स्कूल-कॉलेज बंद हैं और अस्पताल में मरीज़ों को दिक्कत हो रही है.

Image caption पुरोहित अमर बनर्जी

सांप्रदायिकता के नाम पर...

तमाम नागरिकों ने नाम न लिए जाने की शर्त पर बताया की, "यहाँ सांप्रदायिकता के नाम पर माहौल कभी ख़राब नहीं हुआ था. इस बार क्या हुआ किसी को समझ नहीं आ रहा."

पड़ोस के बशीरहट इलाके में पत्रकारों और प्रशासन की गाड़ियों के साथ तोड़-फोड़ की घटनाओं के बाद कर्फ़्यू लगा दिया गया था और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को भी इलाके में दाखिल होने से रोका जा रहा है.

ये वही इलाका है जहाँ के निवासी कार्तिक घोष इस विवाद के बाद हुई हिंसा में अपनी जान गँवा बैठे. बदूरिया और बशीरहट के बीच में है देगांगा जिसने वर्ष 2010 में सांप्रदायिक दंगों का सामना किया था.

यहाँ पर लोगों के चेहरों पर ख़ौफ़ तो है लेकिन एक भरोसे के साथ कि हालात नागरिकों के नियंत्रण में हैं.

राजनीतिक फायदे

काली देवी मंदिर के पुजारी अमर बनर्जी ने इशारे से दिखाया कि देगांगा की जामिया मस्जिद सिर्फ़ सौ मीटर दूर है.

उन्होंने कहा, "हम दोनों अपने-अपने धर्मों को निभा रहे हैं. लेकिन कुछ लोग राजनीतिक फ़ायदे के लिए इस तरह की हिंसा का हिस्सा बन जाते हैं. सभी तो बुरे नहीं."

पड़ोस की मस्जिद में नमाज़ की तैयारी के बीच इमाम मोहम्मद अस्मत अली ने हमसे बात की.

उनके मुताबिक़, "पूरे इलाके में हिंदू-मुसलमान मिल के ही रहते रहे हैं. समझ में नहीं आता इस तरह की वारदात आख़िर हो कैसे जाती है."

साल 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल राज्य की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत 27 था जो भारत में असम के बाद दूसरे स्थान पर आता है.

हिंदू-मुसलमानों की दुकानें

24 परगना ज़िले के जिन हिस्सों में हिंसा की घटनाएं हुईं है वहां पर अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी 50% से भी ज़्यादा दिखी.

हालांकि, चाहे हिंदू हों या मुसलमान, सभी को ताज्जुब इस बात पर है कि ऐसा सांप्रदायिक तनाव पहले कभी देखने को नहीं मिला लेकिन अब थोड़ा 'बढ़ता सा दिख रहा है'.

देगांगा के बाद मेरा अगला पड़ाव था तेंतुलिया जहाँ हिंसा दो दिनों तक जारी रही थी.

कस्बे की ख़ास बात ये है कि यहाँ हिंदू-मुसलमानों की दुकानें अगल-बगल हैं और कई जली हुई दुकानों को खोलने और सफ़ाई करने की मशक्कत करते दिखे.

लगभग सभी ने कैमरे पर बात करने से मना करते हुए कहा कि, "नुकसान तो सभी का हुआ न. भीड़ ने ये तो नहीं देखा कि किस दुकान का मालिक़ किस धर्म का था."

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