नज़रिया: पश्चिम बंगाल में हिंदू मुस्लिम टकराव की वजहें

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पश्चिम बंगाल एक ऐसे भंवर में फंसता जा रहा है जो पहले कभी नहीं देखा गया.

एक तरफ अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर दार्जिलिंग अशांत है तो दूसरी ओर कोलकाता के नज़दीक दक्षिण बंगाल में दो समुदायों के बीच सांप्रदायिक तनाव का कहीं ज़्यादा गंभीर मामला भी सामने आ गया है.

सांप्रदायिक तनाव के मामले में दार्जिलिंग जैसे मसले की तरह कोई स्पष्ट मांग नहीं है. लेकिन पिछले कुछ महीनों में पश्चिम बंगाल में छोटे-बड़े कई दंगे देखने को मिले हैं.

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जहां से पश्चिम बंगाल में तनाव शुरू हुआ

कोलकाता से उत्तर-पूर्व में 50 किलोमीटर दूर बशीरहाट में तनाव का मामला एक किशोर के आपत्तिज़नक फ़ेसबुक पोस्ट की वजह से शुरू हुआ.

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करीब पांच साल पहले बांग्लादेश सीमा के नज़दीक देगंगा में हिंदू और मुसलमानों के बीच बड़े पैमाने पर हिंसा भड़की थी.

बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या

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मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ सीमा पार से बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ का स्थानीय लोगों ने ख़ास तौर पर बंटवारे के बाद बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों ने जमकर विरोध किया था.

तब ही से सिर्फ़ ना ही बशीरहाट में तनाव बना रहता है बल्कि राज्य के कई दक्षिणी ज़िलों में, हुगली नदी के दोनों किनारों पर तनाव बना रहता है.

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राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक बांग्लादेशी प्रवासी लेबेनसरॉम की नीति अपना रहे हैं. यह नीति 'लिविंग स्पेस' का एक विवादित आइडिया है. इस नीति को सबसे पहले जर्मनी के राष्ट्रवादियों ने यूरोप में अपनाया था.

हालांकि इस बात का कोई पुख़्ता आधार नहीं है कि बांग्लादेशी प्रवासी सोची-समझी नीति के तहत इसे अपना रहे हैं. खासकर तब, जब शेख हसीना के वक़्त में बांग्लादेश के साथ भारत का संबंध बेहतर दौर में है.

लेकिन सच यह है कि पिछले दो दशकों में हज़ारों बांग्लादेशी सीमा पार कर भारत आए हैं. ऐसा ही उन्होंने असम में भी किया. इससे वहां की आबादी में एक गंभीर असंतुलन पैदा हुआ.

आक्रामक आप्रवासी

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शुरू में तो आप्रवासी सामान्य तौर पर विनम्र हुआ करते थे इसलिए स्थानीय लोगों ने उन्हें अपना लिया था. लेकिन अब जो आप्रवासी आ रहे हैं वो सामान्य तौर पर आक्रमक है और ऐसी रिपोर्टें हैं कि वो गांव वालों को डराते-धमकाते हैं.

वे खाली पड़ी ज़मीनों और इमारतों को हड़प लेते हैं. यहां तक कि वे मंदिर की ज़मीन भी नहीं छोड़ रहे हैं.

वे वहां बड़ी-बड़ी मस्जिदें बनवाते हैं और लाउडस्पीकर लगाकर दिन में पांच बार अपने मजहब के लोगों को नमाज़ के लिए बुलाते हैं. यह स्थानीय लोगों और उनके बीच संघर्ष की एक बड़ी वजह है.

भारतीय नेताओं की लंबी फेहरिस्त है जिनमें इन घुसपैठियों को वोटर कार्ड और दूसरे क़ानूनी दस्तावेज़ मुहैया कराने की होड़ लगी रहती है.

ये दस्तावेज़ उन्हें भारत में रहने में मदद करती हैं. राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें सम्मान देकर अपना चुनावी समर्थन पुख़्ता किया है. बीजेपी को छोड़कर किसी भी पार्टी ने इन मुस्लिम आप्रवासियों के लिए 'खुले दरवाजे' की नीति का विरोध नहीं किया है.

मुसलमानों को लुभाने की राजनीति

ममता लगातार राज्य के करीब 27 फ़ीसदी मुसलमानों को भी लुभाने में लगी रहती हैं. बीजेपी का तर्क है कि राज्य सरकार की ओर से प्रोत्साहन पाकर ये आप्रवासी राज्य में लगातार अपनी स्थिति मज़बूत कर रहे हैं और ये स्थानीय लोगों को हाशिए पर ढकेल रहे हैं.

स्थानीय हिंदुओं का दावा है कि उन पर अपनी ज़मीन-जायदाद मुसलमानों को बेचने का दबाव है. ये मुसलमान वे हैं जो सीमा पार गाय का व्यापार कर अमीर बने हुए हैं. इससे बांग्लादेश का मांस उद्योग भी खूब फल-फूल रहा है.

अभी जो तनाव के हालात बने हुए हैं उसके पीछे यही उपरोक्त वजहें हैं. इसकी वजह से ही पश्चिम बंगाल में लगातार बीजेपी का समर्थन बढ़ रहा है.

साल 2011 के विधानसभा चुना में बीजेपी का वोट प्रतिशत चार फ़ीसदी था जो साल 2016 में बढ़कर 17 फ़ीसदी हो गया. केंद्र में बीजेपी की सरकार है और वह पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है इसीलिए हाल के महीनों में पार्टी ने आक्रमक रुख़ अपनाया हुआ है.

ममता के सामने चुनौती

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पिछले सात सालों में मुसलमानों के समर्थन से ममता को राज्य में हर बड़े चुनाव में जीत मिली लेकिन अब उन्हें चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

बीजेपी की मातृ संगठन आरएसएस हिंदू समर्थन जुटाने में पूरी सक्रियता से लगी हुई है. इसके लिए उसने हाल ही में राज्य में कई धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया है.

इस साल मार्च-अप्रैल में आरएसएस ने रामनवमी के मौके पर पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर जुलूस निकाला था.

इन आयोजनों में जुट रही बड़ी भीड़ ने ममता बनर्जी के आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया है. इससे ऐसा लग रहा है कि बीजेपी राज्य में तृणमूल और कम्युनिस्ट पार्टी से आगे निकल रही है.

अगर सांप्रदायिक तनाव बशीरहाट से निकलकर राज्य के दूसरे हिस्सों में भी फैलता है, जिसकी बहुत संभावना दिख भी रही है, तो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बहुत हद तक ध्रुवीकरण होगा.

चुनावों में इसके स्पष्ट परिणाम देखने को मिलेंगे.

फ़ायदा

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इस ध्रुवीकरण को इस्लामी कठमुल्लावाद के उभार से भी फ़ायदा पहुंच रहा है. इसमें से हूजी जैसे कई कठमुल्लावादी संगठन बेरोज़गार नौजवानों को अपने संगठन में भर्ती कर रहे हैं.

पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था कई दशकों से चरमराई हुई है और उद्योग-धंधों के अभाव में लोगों के पास कोई काम नहीं है.

ग़रीब और थोड़े पढ़े-लिखे मुस्लिम नौजवान इसलिए इन चरमपंथी संगठनों के आसान शिकार हैं.

ये हालात विस्फ़ोटक बने हुए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच रिश्ते बहुत ख़राब दौर से गुजर रहे हैं और इसी वक़्त पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक तनाव चरम पर है.

इसने बंटवारे जैसा परिदृश्य पैदा कर दिया है.

( ये लेखक के निजी विचार हैं. चंदन मित्रा बीजेपी के राज्यसभा सांसद रहे हैं)

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