सरकारें बदल गईं, नरेश चंद्रा का जलवा बना रहा

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भारत के वरिष्ठ राजनयिक नरेश चंद्रा का निधन हो गया. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक गोवा के एक निजी अस्पताल में नरेश चंद्रा का निधन रविवार की रात को हुआ है.

वे 82 साल के थे. नरेश चंद्रा अमरीका में भारत के पूर्व राजदूत रहे और इसके अलावा 1990 से 1992 तक वे भारत सरकार के कैबिनेट सचिव भी रहे.

राजस्थान काडर के 1956 बैच के अधिकारी नरेश चंद्रा वैसे आईएएस अधिकारी रहे, जिन्हें भारत के सर्वोच्च पदों के साथ कूटनीति में भी उच्चतम स्तर पर काम करने का मौका मिला. उनके कूटनीतिक योगदान के चलते ही 2007 में उन्हें भारत दूसरे सबसे बड़े सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गणित में एमएससी करने के बाद आईएएस में आने से पहले कुछ समय नरेश चंद्रा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाया भी.

26 साल में आईएएस

महज 26 साल की उम्र में वो ज़िले के कलक्टर बन गए थे. बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल से एक बातचीत में नरेश चंद्रा ने बताया था कि कलक्टर होना किसी आईएएस के लिए सबसे अच्छी पोस्टिंग होती है.

उनके शब्दों में, "आपके दफ़्तर का दरवाज़ा खुला होना चाहिए. ये नहीं कि फूँफा है, पर्दा लगा है, चपरासी खड़ा है. डायरी है और एक एक कर के लोग आ रहे हैं. ये बिल्कुल ग़लत है. मेरे यहाँ तो बेंच पड़ी रहती थी. जो चाहता था आकर बैठ जाता था. मैं ख़ुद देख लेता था कि कौन पहले आया."

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Image caption केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूढी के साथ वरिष्ठ राजनयिक नरेश चंद्रा

नरेश चंद्रा ने केंद्र में अलग अलग प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया था. राजीव गाँधी के ज़माने में आपको महत्वपूर्ण पद दिया गया. वीपी सिंह के ज़माने में आप गृह सचिव थे. चंद्रशेखर ने आपको कैबिनेट सचिव बनाया. नरसिम्हा राव ने भी आपको अपना सलाहकार बनाया.

रेहान फ़ज़ल ने उनसे यही पूछा कि इतने लोगों को आपने कैसे मैनेज किया. उनका जवाब था, "कुछ किस्मत की भी बात होती है. मुझसे एक भी प्रधानमंत्री ने कभी भी कुछ ग़लत काम करने के लिए नहीं कहा. सिर्फ़ एक बार एक मंत्रीजी के साथ साल-छह महीने सामंजस्य बैठाने में समय लगा. जब उनको लग गया कि ये कुछ करने वाला नहीं है तो उनको लग गया कि इसको छेड़ने से कोई फ़ायदा नहीं है."

राजीव से लेकर राव तक

नरेश चंद्रा के मुताबिक राजीव गाँधी फ़ाइलें बहुत ग़ौर से पढ़ते थे और उनकी ड्राफ़्टिंग सिविल सर्वेंट से भी बेहतर थी. उनमें बॉर्न लीडरशिप क्वालिटी थी.वीपी सिंह के समय हमेशा कुछ न कुछ मुसीबत थी. बाबरी मस्जिद का मामला चल रहा था, मंडल कमीशन का मुद्दा था और कश्मीर में दिक्कत चल रही थी.

चंद्रशेखर नेचुरल लीडर थे. गरीबों के प्रति उन्हें सहानुभूति थी. उनमें बड़ी ज़बरदस्त लीडरशिप क्वॉलिटी थी. संसद में अगर उन्हें सपोर्ट मिलता तो वो देश चला सकते थे. अटल जी भी निश्चित रूप से एक नेचुरल लीडर थे. हर चीज़ को सिनथेसाइज़ करना उनकी ख़ासियत थी.

वैसे चंद्रा को सबसे ज़्यादा समय तक नरसिम्हा राव के साथ काम करने का मौका मिला. उनके साथ अपने काम के अनुभव के बारे में नरेश चंद्रा ने बताया था, "सबसे लंबे समय तक मैंने उनके साथ काम किया. वो भी गहरी सोच के इंसान थे लेकिन कई बार वो जानबूझ कर फ़ैसले लेने में देर करते थे."

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1996 में नरेश चंद्रा को अमरीका में भारत का राजदूत बनाया गया. उनके लिए ये बिल्कुल नई दुनिया थी. उस समय उनको ख़ासी चुनौती का सामना करना पड़ा जब भारत ने अपना परमाणु परीक्षण किया और उन्हें उसे पूरी दुनिया में भारत का बचाव करना पड़ा.

नरेश चंद्रा ने बीबीसी से बताया था, "अमरीका में मीडिया से भागने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. मुझे जिसने भी बुलाया चाहे सीएनएन हो, बीबीसी हो, फ़ॉक्स न्यूज़ हो, जिम लैरर शो हो, मैं गया. मुझे सुबह छह बजे से रात बारह बजे तक बुलाया जाता था और मैं जाता था."

एक सरकार के जाने के बाद अक्सर उसके प्रमुख अधिकारियों को भी महत्वहीन महकमों में भेज दिया जाता है लेकिन नरेश चंद्रा का अनुभव इससे थोड़ा अलग रहा है. जब वो अमरीका में भारत के राजदूत थे तब कांग्रेस चुनाव हार गई.

अटल बिहारी वाजपेयी ने उनका त्यागपत्र ख़ारिज कर दिया. जब देवेगौड़ा आए तो नरेश चंद्रा ने उनसे भी पूछा कि क्या आप मेरी जगह अपना आदमी भेजना चाहेंगे तो उन्होंने भी मना कर दिया. अटल वापस आए तब भी उन्होंने नरेश से यही कहा कि आप अपना काम जारी रखिए.

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