भीड़ की सियासत की शिकार होतीं ममता बनर्जी?

2016 के पश्चिम बंगाल चुनाव क़रीब थे और शारदा स्कैम के बाद तृणमूल सरकार पर नारदा स्टिंग ऑपरेशन ने 'डंक मार दिया था'.

ममता बनर्जी की पार्टी के कई नेताओं को कथित तौर पर रिश्वत देने वाले वीडियोज़ ने सनसनी मचा दी थी.

इसी बीच एक दिन विधानसभा में लंच ब्रेक के दौरान ममता बनर्जी कुछ लोगों के साथ बैठ कर हंसी-मज़ाक कर रहीं थी.

एकाएक उन्होंने अपने एक कैबिनेट मंत्री से गाना गाने की फ़रमाइश कर दी. गाना सुनते समय कुछ 'भालो मिष्ठी' लाने का फ़रमान भी दिया.

यही है शख्सियत ममता बनर्जी की जो उन्हें दूसरों से थोड़ा अलग करती है. कब क्या कर बैठेंगी, क्या कह डालेंगी और क्या फ़ैसला ले लेंगी, पहले से इस बात का पता खुद ममता को भी नहीं रहता.

पश्चिम बंगाल: दंगों पर 'ख़ामोश' मीडिया ने अब क्यों खोली ज़ुबान

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राजनीतिक परीक्षा

बहरहाल शारदा और नारद घोटालों जैसे आरोपों के बाद ममता इन दिनों अपना सबसे बड़ा इम्तेहान देने की तैयारी में हैं.

साल 2016 के बाद से उनके राज्य में सांप्रदायिक हिंसा के कम से कम सात मामले हो चुके हैं. बदनामी के साथ-साथ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने सवाल भी उठाए हैं.

ममता बनर्जी ने अपने बचाव में सिर्फ़ एक ही बात दोहराई है, "मेरे राजनीतिक दुश्मन मेरी सफलता से दुखी हैं."

अक्सर, काम-काज के बीच वे अपने क़रीबी लोगों से कहती सुनी गईं हैं, "बंगाल एक दिन भारत का नंबर एक राज्य होगा."

लेकिन जो हालात हैं वे शायद ममता को भी ये सोचने पर मजबूर कर सकते हैं कि हिंसा और तनाव के बीच किसी राज्य को नंबर एक बनाना कितना मुश्किल है.

ममता बनर्जी को गुस्सा क्यों आता है ?

क्यों अलग हैं ममता बनर्जी

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करियर

राजनीती शास्त्र के प्रोफ़ेसर बिमल नंदा के मुताबिक़, "ममता बनर्जी का करियर बेहद जुझारू रहा है और सत्ता में आने पर भी सिलसिला जारी है. शायद ममता को यही पसंद भी है."

हक़ीक़त ये भी है कि केंद्र में आसीन भाजपा ने भी जिन राज्यों में अपनी पकड़ मज़बूत करने का 'प्रण' लिया है उनमें पश्चिम बंगाल शीर्ष पर आता है.

असम जीत चुके अमित शाह की भाजपा के निशाने पर ओड़िशा, मेघालय, त्रिपुरा जैसे राज्य भी हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में उनकी दिलचस्पी कुछ ख़ास है.

ममता बनर्जी ने पिछले चुनावी दंगल में पश्चिम बंगाल में भाजपा को पटखनी भी दी और दोबारा पूर्ण बहुमत से सरकार बना ले गईं.

वजह भी है. दशकों तक राज्य में सत्ताधारी वाम दलों से लोहा लेती रही ममता बनर्जी ने राज्य में वाम दलों और कांग्रेस के पुराने वोट बैंक पर अपनी छाप छोड़ रखी है.

राज्य में मुस्लिम, अनुसूचित जाति और जनजाति मिलाकर कुल 53% वोट हैं और ममता पर इनको लेकर 'थोड़ा नरम रहने' के आरोप भी लगते रहे हैं.

'...तो फिर ख़ुदा ही मुसलमानों की ख़ैर करे!'

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बदल रही हैं ममता?

ममता इन आरोपों पर भी कम ही ध्यान देती रहीं थी अब तक. लेकिन अब उनमें बदलाव दिखने लगे हैं.

बदूरिया और बशीरहट में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के बाद वे थोड़े तनाव में दिखीं और इस बीच राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी(जो भाजपा के पूर्व नेता भी हैं) से उनकी तनातनी भी हुई.

मीडिया और राजनीतिक दबाव में ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों, खासतौर से भाजपा पर' चिनगारी को आग देने' जैसे आरोप लगाने के साथ हिंसा की न्यायिक जांच के आदेश भी दिए.

सीपीएम नेता और पूर्व मंत्री अब्दुल सत्तार को लगता है कि मुख्यमंत्री ने कभी इस तरह के मामले को गंभीरता से नहीं लिया.

उन्होंने कहा, "1969 की राज्य सरकार में ज्योति बसु गृह मंत्री थे. तेलनीपाड़ा में दंगे हुए और ज्योति बाबू रात को ही वहां लोगों से मिलने पहुंचे. चलते वक़्त उन्होंने कहा सब मांगे ठीक हैं बस दंगे और नहीं भड़कने चाहिए क्योंकि पुलिस वालों को गोली चलाने के निर्देश दे दिए हैं. ममता या उनके मंत्री आज तक नहीं गए इस तरह से प्रभवोत क्षेत्रों में कड़े संदेश के साथ. क्यों?."

हालांकि पश्चिम बंगाल पुलिस में कुछ वरिष्ठ अफ़सरों ने कहा कि, "हाल के दंगों के तुरंत बाद हमें कोलकता से रातोंरात रवाना कर दिया गया इस आदेश के साथ कि स्थिति नियंत्रण में आ जानी चाहिए".

'तीन जहाज़ हवा में, तीनों के तेल ख़त्म'

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इसी साल जून महीने में जहाँ दार्जिलिंग में ममता सरकार के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन जारी थे वहीं ममता ने ये कह कर कि "हिंसक विरोध बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे और मेरे मंत्री माहौल पर नज़र बनाए हुए हैं", नीदरलैंड्स के संयुक्त राष्ट्र आयोजन में भाग लेने हवाई जहाज़ पर बैठ चुकीं थी.

सम्मेलन के दौरान एक बड़े व्यवसायी ने पहले से तय अपनी मीटिंग का ज़िक्र किया तो ममता का जवाब था, "आइए थोड़ा टहलते हैं. बात भी हो जाएगी".

इस व्यवसायी को उस शाम नीदरलैंड्स के हेग शहर में करीब साढ़े पांच किलोमीटर पैदल चलना पड़ा.

ममता बनर्जी के काम करने का तरीका ही यही है. वे रोज़ कम से कम 8-10 किलोमीटर टहलने की कोशिश करतीं है जिस दौरान मीटिंग भी करतीं हैं और तबादले भी.

राजनीति में भी वे ऐसे ही मुहावरों को नया रूप देती हैं.

पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं से बात करने के दौरान मज़ाक करते बोल बैठी, "अभी भी हम गाड़ी में बैठ कर सोते नहीं. हो सकता है भविष्य में सोना पड़े."

चुनौतियां भी कम नहीं हैं. पश्चिम बंगाल में ही सांप्रदायिक हिंसा के मामले अनेक बार हो चुके है.

उनकी पार्टी के एक नेता ने कहा, "ममता दी जो भी करती हैं वो आम पब्लिक के हित में ही होता है".

क्या है कि नारद स्टिंग मसला जिससे बढ़ेंगी ममता की मुश्किलें?

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सामने हैं मुश्किल सवाल

लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं कि पिछले छह वर्षों में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के प्रशासन पर अपनी कड़ी पकड़ बनाए रखी है.

किसी भी विवादित मुद्दे, घटना या दुर्घटना पर टिपण्णी देने के लिए राज्य के आला अफ़सर, तृणमूल नेता या मंत्री पहले उन्ही की तरफ़ देखते हैं.

जानकार कहते हैं कि मौजूदा हालात में तो ममता को इसका फ़ायदा ही मिलता है लेकिन ये दूरगामी नहीं होता

कोलकता में वरिष्ठ पत्रकार सुवोजीत बागची ने कहा, "ममता बनर्जी पर दबाव पहले भी था और अभी भी है. एकदम से नहीं बढ़ा है लेकिन हाँ, आगे चल के बड़ा भी हो सकता है."

हालांकि अपनी सरकार के दूसरे कार्यकाल में ममता बनर्जी को कुछ कड़े सवालों का सामना करना पड़ रहा है.

पहला, क्या दूसरी पार्टियों की तरह तृणमूल कांग्रेस में भी वंशवाद चलेगा? ( ममता के भतीजे अभिषेक की तस्वीर राज्य के कई कोनों में ममता के साथ ही दिखाई पड़ती है)

दूसरा, कुछ जानकारों का सवाल है कि ममता बेहतरीन प्रशासक तो हैं लेकिन फिर भी सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं बढ़ क्यों रहीं हैं?

तीसरा, मुख्यमंत्री के ओहदे से ज़्यादा पश्चिम बंगाल में लोग ममता बनर्जी नाम से डरते हैं, चाहे वो नौकरशाह और नेता ही क्यों न हों. क्या ये रणनीति आगे भी कारगर होगी?

चौथा, ममता बनर्जी पर आरोप लगते हैं कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय को ज़्यादा पूछा है. ये ग़लत या सही आरोप हैं?

पांचवा, दशकों तक भीड़ की सियासत की बेताज बादशाह रहीं ममता क्या अब उसी सियासत का शिकार होती दिख रहीं है क्योंकि विपक्ष में विभाजन है?

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