जोखिम मोल लेकर कामयाबी हासिल करने वाली ये औरतें

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
ऐसी कई लड़कियां हैं जिन्होंने अच्छी पढ़ाई की और अब दूसरों के लिए उदाहरण बन रही हैं.

ये चाहतीं तो लाखों रुपये के वेतन की नौकरी कर ज़िंदगी आराम से गुज़ार सकती थीं. इन्होंने देश और विदेश के बेहतरीन कॉलेजों से डिग्रियां भी हासिल कीं.

चाहतीं तो ये विदेश में भी बस सकती थीं. मगर इन्होंने ऐसा नहीं किया और पढ़ाई के बाद घर लौट आईं. फिर कुछ अपना करने की ठान ली.

हम बात कर रहे हैं ऐसी महिलाओं की जिनकी उम्र तो कम है मगर उनके सपने बड़े हैं और लक्ष्य भी. ये वो महिलाएं हैं जिन्होंने अपना कुछ करने की ठानी और उसे पूरा भी किया.

ऐसे दौर में जब सरकारी और निजी क्षेत्रों में नौकरियों की संभावनाएं सिकुड़ती चली जा रहीं हैं, ये युवतियां न सिर्फ़ अपने पैरों पर ख़ुद खड़ी हैं बल्कि अपने साथ इन्होंने और भी कई लोगों के रोज़गार का इंतज़ाम किया है.

इन सभी महिलाओं का कहना है कि आज के दौर में महिलाओं के लिए ज़रूरी हो गया है कि वो किसी पर निर्भर ना रहें.

उन्हें कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे वो अपने पैरों पर कभी भी खड़ी हो सकें. जिस सामाजिक असुरक्षा के दौर से दुनिया गुज़र रही है उसमें महिलाओं का आत्मनिर्भर होना और भी ज़रूरी हो गया है.

विधिशा पसारी और स्तुति बघेरिया

दोनों की उम्र 28 साल. दोनों ने ही दिल्ली के वसंत विहार के मॉडर्न स्कूल से हाई स्कूल की शिक्षा हासिल की. इसके बाद इनके रास्ते अलग तब हो गए जब उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए इन्होंने अलग-अलग कॉलेजों में दाख़िला लिया.

विधिशा ने ब्रिटेन में पढ़ाई की, जबकि स्तुति अमरीका चली गईं.

Image caption विधिशा पसारी

विदेश से डिग्री लेने के बाद साल 2006 में विधिशा और स्तुति वापस देश आईं.

विधिशा ने स्टॉक एक्सचेंज में नौकरी की, वहीं स्तुति भारत सरकार के 'स्टार्टअप इंडिया' से जुड़ीं. दो साल पहले उनके दिमाग में अपना कुछ करने का विचार आया.

बीबीसी से बात करते हुए विधिशा कहती हैं, "बड़े घरों में पैदा होने वाली महिलाएं अमूमन बड़े ब्रांड के कपड़े पहनना पसंद करती हैं."

मगर वो एक कपड़े को सिर्फ़ एक ही बार पहनती हैं. फिर वो कपड़े उनकी अलमारियों में रखे रहते हैं.

स्तुति का कहना था कि मध्य वर्ग की महिलाएं ब्रांडेड कपड़े पहनना तो चाहती हैं मगर मंहगे होने की वजह से वो उनकी जेब से बाहर का सौदा होता है.

Image caption स्तुति बघेरिया

दोनों सहेलियों ने अपनी एक और सहेली निराली के साथ मिलकर 'रेकिंज़ा' नाम की एक वेबसाइट शुरू की जिसके तहत वो बड़े ब्रांड के कपड़े अमीर महिलाओं से ख़रीदकर उन्हें मध्यवर्ग की महिलाओं को कम क़ीमत पर बेचती थीं.

देखते-देखते उनका यह प्रयास लोकप्रिय होने लगा. हालांकि उन्होंने 'रेकिंज़ा' को फिलहाल बंद कर दिया है. मगर वो किसी दूसरे नाम से अपने इस काम का दायरा और बढ़ाने की योजना बना रही हैं.

मिली अग्रवाल और अमांडा भंडारी

ये दोनों सहेलियां हैं और साकेत के 'एमिटी स्कूल' में एकसाथ पढ़ा करती थीं. हालांकि दोनों नौकरी भी करती हैं मगर उन्होंने अपना एक वेब पोर्टल भी शुरू किया है जो फ़ैशन के बारे में है. ख़ास तौर पर महिलाओं के लिए.

'स्टाइल कॉकेट्स' के नाम से शुरू किए गए पोर्टल के ज़रिये ये दोनों उन लड़कियों और महिलाओं की मदद करती हैं जो अच्छा दिखना चाहती हैं.

इसमें वो सिर्फ़ सलाह देने का काम करती हैं. शुरुआत के दिनों से ही उन्हें महिलाओं से अच्छी प्रतिक्रिया मिली.

मिली का कहना है कि ये उनका एक तरह का ब्लॉग है जिसमे वो लड़कियों और महिलाओं को सलाह देतीं हैं कि 'अपने पहनावे में वो किस तरह के बदलाव कर सकती हैं जिससे आकर्षक दिखा जा सके.'

अमांडा कहती हैं, "हमारे ब्लॉग पर महिलाएं सवाल पूछती हैं और हम बताते हैं कि वो किस तरह के बदलाव कर पहले से ज़्यादा बेहतर दिख सकती हैं. मिसाल के तौर पर हम इस तरह की सलाह देते हैं कि अगर किसी महिला के पास कोई पुरानी कान की बाली है तो वो उसे अपने कपड़े पर इस तरह भी टांग सकती हैं जिससे वो और भी ज़्यादा सुंदर हो सकता है."

मिली और अमांडा कहती हैं कि नौकरी करते हुए भी वो अपने पोर्टल को मैनेज कर रही हैं.

मगर लोकप्रियता इतनी बढ़ रही है कि अब वो नौकरी छोड़कर पूरी तरह से 'स्टाइल कॉकेट्स' पर ध्यान लगाना चाहती हैं.

इसमें उन्हें अच्छी आमदनी भी हो रही है जिसकी वजह से वो अलग-अलग शहरों का दौरा भी कर रही हैं और अपने पाठकों को वहाँ के फ़ैशन के बारे में बताने का काम भी कर रही हैं.

अंजलि बत्रा

27 साल की अंजलि पढ़ाई पूरी करने के बाद 'पीआर' कंपनी में काम करने लगीं. चूँकि खाने की शौक़ीन रहीं हैं, इसलिए उन्होंने 'फ़ेसबुक' पर खाने से संबंधित एक अपना पेज शुरू किया.

Image caption अंजली बत्रा

इस पेज के 50 फॉलोअर थे. इस पेज पर वो अपनी ही तरह के खाने के शौक़ीन लोगों को उन जगहों की जानकारी देने का काम करती थीं जहाँ मन पसंद व्यंजन मिल सके.

धीरे-धीरे फ़ेसबुक पर उनके पेज के 65 हज़ार फॉलोअर हो गए. फिर बड़े-बड़े खाने के ब्रैंड्स ने उनसे संपर्क करना शुरू किया और अपने प्रचार के लिए उन्हें अच्छी रक़म का प्रस्ताव देना शुरू किया.

उनका ये प्रयास अब व्यावसायिक मॉडल बन गया और उन्होंने अपनी नौकरी छोड़कर एक 'वेबसाइट' लॉन्च कर दी.

'फ़ूड टॉक इंडिया' नाम से शुरू की गई वेबसाइट के ज़रिये अंजलि ने अपने काम को और आगे बढ़ाया.

बीबीसी के स्टूडियो आईं अंजली ने बातचीत के दौरान कहा कि पढ़ाई पूरी करने के बाद से ही उनपर भी शादी करने के लिए सामाजिक दबाव बढ़ना शुरू हो गया था.

मगर इसके बावजूद वो अपने सपने को लेकर अड़ी रहीं. आज उनकी कामयाबी की वजह से परिवार के लोग भी उनपर शादी के लिए दबाव नहीं डालते.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे