मदर टेरेसा की साड़ी पर कॉपीराइट आख़िर क्यों?

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तकरीबन आधी सदी तक मदर टेरेसा एक सिंपल सी सफेद साड़ी पहनती रहीं. साड़ी के बॉर्डर पर नीले रंग की तीन धारियां, बाक़ी दो से एक थोड़ी मोटी.

ईसाई धर्म का प्रचार करने वाले संगठन मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी की नन्स यही पहनती हैं. उनके लिए अब ये एक धार्मिक परिधान की तरह हो गया है.

गुज़रे सोमवार को ये ख़बरें आई कि नोबेल शांति सम्मान पाने वालीं मदर टेरेसा की इस 'मशहूर साड़ी' का ट्रेड मार्क सुरक्षित कर दिया गया है.

मकसद ये बताया गया है कि लोग इसका कारोबारी इस्तेमाल न कर सके.

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ट्रेडमार्क का मकसद

भारत सरकार ने भी पिछले साल सितंबर में ही खामोशी से स्वीकार कर लिया कि मदर टेरेसा की साड़ी पर मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी का ट्रेड मार्क है.

ये वही वक्त था जब मदर टेरेसा को वैटिकन से संत घोषित किया गया था. लेकिन ये फैसला लिया गया कि ट्रेड मार्क वाली बात सार्वजनिक नहीं की जाएगी.

कोलकाता के वकील बिस्वजीत सरकार का कहना है कि उन्होंने साल 2013 में ही इसके लिए आवेदन दिया था.

उनका कहना है, "मेरे दिमाग में आया कि मदर टेरेसा की साड़ी का कोई कारोबारी इरादे से भविष्य में बेजा इस्तेमाल नहीं कर सके, इसे रोकने के लिए कुछ किया जाना चाहिए."

वे कहते हैं, "अगर आप मदर टेरेसा की साड़ी के कलर पैटर्न का इस्तेमाल करना चाहते हैं या पहनना चाहते हैं तो हमें लिखें. अगर हमें भरोसा होगा कि इसका कारोबारी इस्तेमाल नहीं किया जाएगा तो हम इसकी इजाज़त देंगे."

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लंबी कहानी है इस साड़ी की

नीली धारी वाली ये सिंपल सी सफेद साड़ी लंबे समय से मदर टेरेसा की पहचान से जुड़ी हुई है.

इसकी कहानी साल 1948 से शुरू होती है जब वैटिकन की इजाज़त से मदर ने क्रॉस के साथ इसे पहनना शुरू किया था.

कुछ लोग ये कहते हैं कि मदर टेरेसा नीले रंग को शुद्धता का प्रतीक मानती थी.

तीन दशकों से भी ज्यादा समय गुजर गया है जब कोलकाता के बाहरी इलाके में मौजूद मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी के कुष्ठ रोग आश्रम के मरीज ये साड़ी बुनते रहे हैं.

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मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी

संगठन से जुड़ी नन्स बताती हैं कि मदर टेरेसा ने मरने से पहले कहा कि उनके नाम का इस्तेमाल कारोबारी उद्देश्यों से न किया जाए.

सरकार के मुताबिक, "लेकिन इसके बावजूद मदर टेरेसा के नाम के कमर्शियल इस्तेमाल की शिकायत होती रहती है. नेपाल में उनके नाम से एक स्कूल चलाया जाता है और उसके टीचर्स सैलरी नहीं मिलने की शिकायत करते हैं. रोमानिया में एक पादरी उनके नाम पर चंदा जुटाते पाया गया. कोलकाता में मिशनरीज ऑफ चैरिटी के हेडक्वॉर्टर के बाहर ऐसी दुकानें हैं जहां मदर टेरेसा के स्मृति चिह्नों को ये कहकर बेचा जाता है कि ये पैसा दान में दिया जाएगा. यहां तक कि भारत में एक कॉपरेटिव बैंक ने अपना नाम ही उनके नाम पर रख लिया है."

बिस्वजीत सरकार कहते हैं, "इसलिए हमने कुछ करने का फैसला किया. इसके जरिए हम दुनिया को ये बताना चाहते हैं कि मदर टेरेसा का नाम और उनकी प्रतिष्ठा का गलत इस्तेमाल न किया जाए."

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कॉपीराइट कैसे?

किसी रंग पर ट्रेड मार्क हासिल करना एक जटिल मामला होता है. साल 2013 में ही नेस्ले ने कैडबरी के खिलाफ पर्पल कलर को लेकर अदालती लड़ाई जीती थी.

अभी तो ये भी साफ नहीं है कि मदर टेरेसा की नीली धारी वाली साड़ी पर कॉपीराइट को किस तरह से प्रोटेक्ट किया जाएगा.

कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर मदर टेरेसा मार्का साड़ी लंबी बांह वाले ब्लाउज़ के साथ उपलब्ध है.

हालांकि इस फैसले के आलोचक भी हैं. एक आलोचक ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा कि साड़ी एक पारंपरिक लिबास है और कोई इस पर कैसे कॉपीराइट ले सकता है.

लेकिन आनंद भूषण जैसे फ़ैशन डिजाइनर इससे इत्तेफाक नहीं रखते हैं. वे कहते हैं, "पारंपरिक भारतीय गमछे की डिजाइन का ट्रेड मार्क कराया गया है. मदर टेरेसा की साड़ी की आइकॉनिक डिजाइन का ट्रेड मार्क देने में कोई बुराई नहीं है."

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