बिहार में शराबबंदी के बाद लागू कानून में पहली सज़ा

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बिहार में बीती 10 जुलाई को शराबबंदी के बाद लागू हुए नए उत्पाद कानून के तहत पहली सज़ा हुई है.

बिहार के जहानाबाद की ज़िला अदालत ने दो भाइयों मस्तान मांझी और पेंटर मांझी को पांच साल की कैद और एक-एक लाख रुपये के ज़ुर्माने की सज़ा सुनाई.

अप्रैल 2016 को बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुई थी, जिसके बाद से ही इससे जुड़ा कानून बहस का विषय बना हुआ था.

गौरतलब है कि कुछ माह पहले ये ख़बर आई थी कि राजधानी पटना के थानों में ज़ब्त की हुई शराब चूहों ने पी ली है.

इस ख़बर को लेकर सरकार की बहुत किरकिरी हुई थी हालांकि बाद में बिहार पुलिस मुख्यालय ने इस ख़बर को ख़ारिज कर दिया था.

लेकिन ये ख़बर आने के बाद प्रशासनिक अमले ने शराब को नष्ट करने पर जोर दिया है.

अपर पुलिस महानिदेशक (मुख्यालय) संजीव कुमार सिंघल ने बीबीसी को बताया, "हमने अपना ध्यान शराब को नष्ट करने पर तो लगाया है लेकिन साथ ही हम शराब पीने वालों के अर्थशास्त्र पर भी चोट कर रहे हैं. इसलिए इधर मई और जून में हमने भवन भूखंडों की ज़ब्ती, गाड़ियों की ज़ब्ती और बड़े पैमाने पर शराब नष्ट की है."

अप्रैल 2016 से जून 2017 तक 1931 दोपहिया वाहनों को ज़ब्त किया गया जबकि 739 अन्य वाहन ज़ब्त किए गए जिसमें ट्रक भी शामिल है. दिलचस्प है कि ऐसे ही एक ट्रक की 8.5 लाख रुपये में नालंदा में नीलामी की गई.

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284 निजी भवन या भूखंडों को सील किया गया और 59 कमर्शियल भवनों मसलन होटल आदि पर ताला लगाया गया. शराब नष्ट करने का आंकड़ा देखें तो जून 2017 तक 97,714 लीटर देशी शराब और 158829 लीटर विदेशी शराब नष्ट की गई.

हालांकि इसी माह पटना हाईकोर्ट ने मुज़फ़्फरपुर में एक होटल को शराब मिलने पर सरकारी संपत्ति घोषित करने के मामले में राज्य सरकार से ज़वाब तलब किया है.

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अपर पुलिस महानिदेशक संजीव कुमार सिंघल कहते है, "इस कानून के तहत हम अपने लोगों पर कार्रवाई करने में भी नहीं हिचके हैं. 37 पुलिस आफ़िसर पर अब तक कार्रवाई हो चुकी है जिसमें से 3 को सेवा से बर्ख़ास्त किया जा चुका है. ''

हालांकि जहां प्रशासनिक अमला शराबबंदी कानून को लेकर हुई कार्रवाई पर अपनी पीठ थपथपा रहा है वहीं समाजसेवी सुधारवर्ग नए ख़तरों के प्रति आगाह कर रहा है.

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बकौल सुधा वर्गीज, "शराबबंदी अच्छी है लेकिन उसको लेकर कोई प्लानिंग नहीं थी. आप देखें मुसहर समुदाय जिनके बीच मैं काम करती हूं उनको दो कार्यों में महारत है पहला शराब बनाना और दूसरा सुअर पालना. आपने शराब बंद कर दी, बिना किसी दूसरे रोजगार के विकल्प के. अब उस समुदाय में बाल श्रम, बाल विवाह की घटनाएं बढ़ रही हैं. यानी आप चीजों को फिर से पुरानी जगहों पर ले जा रहे हैं."

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ये भी गौरतलब है कि सरकार जहां शराबबंदी लागू करके वाहवाही बटोर रही है वहीं सूबे में शराब मिलना बंद हो गया है, ऐसा नहीं है.

अगस्त 2016 में ही गोपालगंज में ज़हरीली शराब पीने से कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई थी.

बिहटा निवासी साकेत कुमार कहते है, "जिनके पास पैसा है उनके लिए तो डोर टू डोर शराब उपलब्ध है. वो शराब पी रहे हैं और सरकार को कोई टैक्स भी नहीं दे रहे. इसलिए सरकार को कानून को थोड़ा लचीला बनाना चाहिए, तानाशाही से काम नहीं चलेगा."

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