गाय, गुजरात और हिंदुत्व का नाम लेना गुनाह है?

गाय इमेज कॉपीरइट Getty Images

बीजेपी और इसके सहयोगी संगठनों के लिए गाय और हिंदुत्व लगातार इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द हैं, लेकिन केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड इन शब्दों से ख़ुश नहीं दिखता.

बोर्ड ने एक फ़िल्म निर्माता से 'गाय', 'गुजरात', 'हिंदू' और 'हिंदुत्व' शब्द को म्यूट करने के लिए कहा है, जिसे किसी और ने नहीं बल्कि भारत के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने बोला है.

प्रेस रिव्यू- अमर्त्य सेन की डॉक्यूमेंट्री पर सेंसर बोर्ड फ़ा

फ़िल्म 'इंदु सरकार' पर सेंसर की कैंची

सेन की मशहूर किताब 'द आर्गुमेंटेटिव इंडियन' से प्रेरित इस डॉक्यूमेंट्री को फ़िल्म निर्माता सुमन घोष ने निर्देशित किया है.

सुमन ने बीबीसी को बताया, "जब फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड ने मुझसे गुजरात और ऐसे ही चार शब्दों को म्यूट करने के लिए कहा तो मुझे झटका लगा. ये सारे शब्द प्रोफ़ेसर सेन ने मेरी फ़िल्म के लिए दिए गए एक साक्षात्कार के दौरान कहे थे. मैंने बोर्ड के निर्देश को मानने से इनकार कर दिया."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

रिलीज़ अधर में

फ़िल्म में गुजरात का ज़िक्र वहां आया है जब अमर्त्य सेन ने गुजरात दंगों का उल्लेख किया. इसी तरह गाय शब्द वहां आता है, जहां वो बीफ़ को लेकर हालिया घटनाओं का ज़िक्र करते हैं.

यह फ़िल्म इसी शुक्रवार को कोलकाता के दो सिनेमाघरों में रिलीज़ होने वाली थी. लेकिन बिना बोर्ड के सर्टिफ़िकेट के अब इसकी रिलीज़ अधर में लटक गई है.

'मेरी फ़िल्म सेंसर बोर्ड में गई तो हंगामा पक्का'

'लिपस्टिक अंडर माई बुर्का' से क्या मुश्किल?

फ़िल्म निर्माता सुमन घोष सुमन ने इन चार शब्दों को म्यूट करने के पीछे बोर्ड के तर्कों के बारे में बताया, "एक गाइडलाइन है, जिसके अनुसार राज्य और धर्म आदि के ख़िलाफ़ किसी चीज़ को नहीं दिखाया जा सकता. बोर्ड का मानना है कि सेन ने दंगों के लिए गुजरात सरकार को दोषी ठहराया है. ये हास्यास्पद है."

जब गुरुवार को अमर्त्य सेन पर बनी फ़िल्म पर सेंसरशिप की ख़बर आई तो फ़िल्म जगत और पश्चिम बंगाल के बुद्धिजीवियों में आक्रोश पैदा हुआ.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

लोगों में आक्रोश

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत कई लोगों ने इस पर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर किया है. ममता ने इसे बोलने की आज़ादी पर नियंत्रण कहा है.

जाधवपुर विश्वविद्यालय में फ़िल्म स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर संजय मुखोपाध्याय कहते हैं, "क्या यह फासीवादी राज्य है. बोर्ड को कोई अधिकार नहीं है कि वो संविधान में दी गई बोलने की आज़ादी को नियंत्रित करे. चाहे ये अमर्त्य सेन से जुड़ा मामला हो या कोई आम नगारिक हो. कोई भी ये दबाव नहीं डाल सकता कि क्या बोलना है और क्या नहीं."

बड़ी लंबी है फिल्म सेंसर कराने की प्रक्रिया

'दर्शकों पर छोड़ दीजिए कि उन्हें क्या देखना है'

सुमन घोष का कहना है, ''ये एक डॉक्यूमेंट्री है, कोई फ़ीचर फ़िल्म नहीं है. अगर ये शब्द म्यूट कर दिए जाते हैं तो इस डॉक्युमेट्री फ़िल्म का सारा मक़सद ही विफल हो जाएगा. मैं अब इसके ख़िलाफ़ अपील करने जा रहा हूं.''

अमर्त्य सेन अभी बंगाल में हैं. जब उनसे प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की गई तो उन्होंने कहा, "मैं ख़ुद उस फ़िल्म का एक क़िरदार हूं. मेरे लिए ये निष्पक्ष नहीं होगा कि इस पर कोई टिप्पणी करूं. अगर सरकार को इसमें कोई दिक़्क़त है, तो लोग इस बारे में बातचीत कर सकते हैं, पर मैं नहीं."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे