नज़रिया: मोदी की भाजपा से दोस्ती कर पाएंगे नीतीश कुमार?

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बिहार में सियासी पारा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है. राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद के प्रमुख लालू यादव के परिवार पर सीबीआई के शिकंजे के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और लालू यादव के बीच तनातनी बढ़ती ही जा रही है.

नीतीश और लालू की ये वही जोड़ी है जिसने 2014 में भाजपा को केंद्र की सत्ता में पहुँचाने वाले नरेंद्र मोदी के विजयरथ को एक साल बाद 2015 में बिहार विधानसभा चुनावों में आगे नहीं बढ़ने दिया था.

तब 1970 के दशक के संपूर्ण क्रांति के जनक जयप्रकाश नारायण के दो सितारों नीतीश कुमार और लालू यादव ने अपनी दो दशक पुरानी छोटी-मोटी दुश्मनी को भुलाकर मोदी की भाजपा से टकराने के लिए हाथ मिलाया था.

लेकिन भाजपा के केसरिया रथ को बिहार में रोकने के दो साल के भीतर ही बिहार में सियासी हालात ऐसे हो गए हैं कि नीतीश और लालू की राहें अलग होती दिख रही हैं.

लालू परिवार पर शिकंजा

इसकी सबसे ताज़ा वजह है लालू परिवार पर बढ़ता सीबीआई का शिकंज़ा.

'बीजेपी रखेगी लालू-नीतीश को साथ-साथ'

लालू की मुश्किल से नीतीश की चांदी?

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5 जुलाई को सीबीआई ने लालू यादव, उनके बेटे और नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में उप मुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और बेटी मीसा भारती के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की. आरोप है कि इन्होंने अवैध तरीके से ज़मीनें कब्जाई और कारोबार किया.

7 जुलाई को सीबीआई ने राजधानी दिल्ली समेत कई जगहों पर लालू के परिवारवालों की कथित संपत्तियों पर छापे मारे. इस मामले पर शांत बैठे नीतीश कुमार ने आख़िरकार 9 जुलाई को अपने कार्यकर्ताओं के सामने अपनी चुप्पी तोड़ी.

उन्होंने कहा, "हमने भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त नहीं किया है. मैंने पूर्व में अपने कम से कम चार मंत्रियों को इस्तीफ़ा देने को कहा है जिनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार या अन्य आपराधिक मामले आए हैं. हमारी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव ने 1990 के दशक में हवाला में नाम आने पर संसद से इस्तीफ़ा दे दिया था. हम सिद्धांतों पर समझौता नहीं करते हैं."

नीतीश जो कुछ अपने कार्यकर्ताओं से कह रहे थे, वो एकदम सही था. उन्होंने 2005 में जीतनराम मांझी को उनके मंत्री के रूप में शपथ लेने के कुछ ही घंटों के बाद इस्तीफ़ा देने को मजबूर कर दिया था, जब मांझी का नाम शिक्षा घोटाले में सामने आया था.

उन्होंने अपनी ही पार्टी के रामानंद सिंह और अवधेश कुशवाहा को उस वक़्त इस्तीफ़ा देने को कहा था, जब वो बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार चला रहे थे. नीतीश की पार्टी तब गठबंधन में बड़ी पार्टनर थी और बीजेपी तब जदयू के कोटे के मंत्रियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग करने की स्थिति में नहीं थी.

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नीतीश की मुश्किल

1996 से बीजेपी के साथ चल रहे नीतीश ने लालू के भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और निरंकुशता को ही अपना सियासी हथियार बनाया था. भाजपा के साथ मिलकर 2005 में लालू-राबड़ी को सत्ता से बेदख़ल करने में कामयाबी हासिल करने के बाद भी नीतीश ने अपनी बेदाग़ छवि को बनाए रखा. उन्होंने अपनी सरकार को आमतौर पर भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त रखा और सुशासन, सड़कें, स्कूल और अन्य बुनियादी ढांचा बनाने पर ज़ोर रखा.

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9 जुलाई को नीतीश के कार्यकर्ताओं को संबोधित करने के बाद जद यू के प्रवक्ताओं ने तेजस्वी यादव के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया और सलाह दी कि लालू को बेटे से इस्तीफ़ा करा देना चाहिए. केसी त्यागी, नीरज कुमार और संजय समेत कई जद यू प्रवक्ताओं ने तेजस्वी का नाम लिए बिना कहा कि उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. प्रवक्ताओं ने लालू यादव पर भी दबाव बनाया कि वे तेजस्वी से इस्तीफ़ा देने को कहें ताकि जदयू, राजद और कांग्रेस का महागठबंधन अटूट रहे.

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लेकिन लालू इस दलील के साथ विरोध जता रहे हैं कि महागठबंधन में उनकी पार्टी राजद के 80 विधायक हैं, जबकि जदयू के 71. लालू और उनके साथियों की दलील है कि बीजेपी अपने राजनीतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ सीबीआई का इस्तेमाल कर रही है, ख़ासकर लालू के ख़िलाफ़ जो कि नरेंद्र मोदी और संघ परिवार के बड़े आलोचक हैं. लालू और उनकी पार्टी ने तेजस्वी के इस्तीफ़े की मांग ठुकरा दी है.

जेडीयू का लालू पर दबाव

हालाँकि जेडीयू नेता कह रहे हैं कि नीतीश भ्रष्टाचार के मुद्दे पर समझौता नहीं करेंगे, वहीं राजद नेता कह रहे हैं कि बीजेपी लालू के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले बनाकर महागठबंधन तोड़ना चाहती है. राजद और जदयू के नेताओं के बीच पिछले 10 दिनों से शब्दबाण चल रहे हैं.

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राजद और जदयू की इस तनातनी के बीच कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दख़ल दिया और नीतीश कुमार से बात की. इसके बाद उनके दूत और बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक चौधरी ने भी करीब एक घंटे तक नीतीश के साथ चर्चा की. इसके बाद चौधरी ने लालू से भी मुलाक़ात की.

सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस राजद और जेडीयू के बीच सुलह का फार्मूला तलाश करने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस महागठबंधन को बनाए रखने के लिए तेजस्वी की सम्मानजनक विदाई का प्रस्ताव रख सकती है.

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अब सवाल उठता है कि नीतीश जो कि भ्रष्टाचार के मामलों में अपने मंत्रियों के नाम आने पर तुरत-फुरत कार्रवाई किया करते थे, तेजस्वी के मामले में क्यों सुस्त दिख रहे हैं? कहा जा रहा है कि नीतीश इस मामले को 19 जुलाई को राष्ट्रपति पद के चुनाव तक लटकाए रख सकते हैं.

राष्ट्रपति चुनाव में जेडीयू एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का समर्थन कर रही है और कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी उम्मीदवार मीरा कुमार का विरोध.

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लालू की इफ़्तार पार्टी और नीतीश का 'राजभोग'

नीतीश के लिए धर्मसंकट ये है कि अगर वे लालू के साथ खड़े रहते हैं तो उनकी 'मिस्टर क्लीन' की छवि ख़राब होती है. लालू अगर चारा घोटाले में दोषी क़रार दिए जाते हैं तो उन्हें महागठबंधन से अलग होने के लिए किसी तरह की सफ़ाई देने की भी ज़रूरत नहीं होगी.

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लालू की छवि बेशक दाग़ी नेता की हो, लेकिन कथित सांप्रदायिक ताक़तों से लड़ने के मामले में वे नीतीश के मुक़ाबले भारी बैठते हैं. 2014 के विधानसभा चुनाव में राजद और जेडीयू ने 100-100 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें लालू की राजद ने 80 सीटें जीती थी, जबकि नीतीश की पार्टी को 71 सीटें मिली थी.

मुस्लिम और यादव का चुनावी समीकरण आज भी लालू के पक्ष में दिखता है. मुस्लिम-यादव मतदाताओं का कुल मतदाताओं में हिस्सा लगभग 30 फ़ीसदी है और माना जाता है कि हर हाल में ये लोग लालू के साथ खड़े होंगे.

नीतीश के लिए चुनौती

नीतीश अगर महागठबंधन से अलग होते हैं तो बीजेपी के समर्थन के बिना सरकार नहीं चला सकते. उस परिस्थिति में, नीतीश को ज़्यादा मुश्किल सवालों का जवाब देना होगा, जिनके जवाब देना उनके लिए नामुमकिन हो सकता है. बीजेपी में नरेंद्र मोदी के उत्थान के बाद उन्होंने विद्रोह किया था.

वो बीजेपी से गठबंधन इसीलिए तोड़ा क्योंकि बीजेपी ने मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश कर दिया था. नीतीश महागठबंधन को अखिल भारतीय रूप देने की बात भी करते रहे हैं. उन्होंने 'संघ मुक्त भारत' की बात भी कही और कहा "मिट्टी में मिल जाएंगे लेकिन बीजेपी के पास नहीं जाएंगे."

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अगर नीतीश फिर बीजेपी से हाथ मिलाते हैं तो उन्हें इन सब सवालों का जवाब देना होगा. इसके अलावा, नीतीश को ये भी डर सता रहा होगा कि नरेंद्र मोदी की छवि अपने विरोधियों को माफ़ न करने वाली रही है, ऐसे में वो सम्मान और कद वो शायद ही हासिल कर पाएं जो उन्हें बीजेपी में मोदी युग से पहले मिला करता था.

मोदी अपना वो 'अपमान' शायद ही भूले होंगे जब नीतीश ने मुख्यमंत्री रहते हुए उन्हें (मोदी को) बिहार में कभी चुनावी सभा नहीं करने दी और एकबार मोदी का डिनर भी रद्द कर दिया.

नीतीश ने भले ही राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए उम्मीदवार कोविंद को समर्थन दिया है, नोटबंदी और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन कर विपक्ष को नीचा दिखाया हो, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश ने ऐसा सहयोगियों के बीच अपनी छवि चमकाने के लिए किया, न कि उनका इरादा गठबंधन से बाहर जाने का है.

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