फर्ज़ी मुठभेड़ मामलों में पहला ऐतिहासिक कदम

इमेज कॉपीरइट Getty Images

'एक्स्ट्रा ज्यूडीशियल एक्जीक्यूशन विक्टिम फ़ैमिलीज़ एसोसिएशन और अन्य बनाम केंद्र' के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में सशस्त्र सेनाओं और जांच एजेंसियों की खुशी पर ब्रेक लगा दिया है.

बीते शुक्रवार को अपने एक ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च अदालत ने फर्जी एनकाउंटर में 98 नागरिकों की मौत के मामले में जांच के आदेश दिए हैं.

जस्टिस मदन बी लोकुर और यूयू ललित ने एक समय सीमा के तहत केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने को कहा है.

'फर्जी मुठभेड़ों' से कब तक लड़ता रहेगा मणिपुर

मणिपुर में है दुनिया का 'इकलौता' औरतों का बाज़ार

भारत में ये आम बात है कि आधिकारिक जांच और अदालती मामले अनंत काल तक खिंच सकते हैं. इस पर तो एक कहावत है कि 'इस जन्म में क़ानून और अगली ज़िंदगी में न्याय.'

हमेशा की तरह केंद्र सरकार का रवैया हीला-हवाली वाला है. अदालत, केंद्र की किसी दलील से प्रभावित नहीं हुई. अदालत ने अपने आदेश में वर्दीधारी जवानों के हाथों ज़रूरत से ज़्यादा ताक़त के इस्तेमाल के मामले की पूरी जांच कराए जाने की बात कही.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
क्या रूकेंगी मणिपुर में होने वाली अवैध हत्याएं?

मुआवज़े से न्याय नहीं मिल जाता

कोर्ट ने केंद्र के इस बहाने को ठीक ही ख़ारिज किया कि ये मामले बहुत पुराने हैं.

ऐसा लगा कि सरकारी वकील ये भूल गए कि हत्या के मामलों में समय सीमा नहीं होती या मामला पुराना नहीं पड़ता.

इसके बाद सरकारी वकील ने इसकी पूरी ज़िम्मेदारी कथित रूप से मणिपुर में क़ानून व्यवस्था के ध्वस्त होने पर डालनी चाही. इस दलील ने भी कोर्ट का कोई खास ध्यान नहीं खींचा.

वीडियो मणिपुर: 'अलगाववादी की विधवा'!

मणिपुर: आँसुओं को पोंछने वाले का इंतज़ार

इसके बाद सरकार की ओर से दलील दी गई कि पीड़ितों के परिजनों को मुआवज़ा दिया जा चुका है और ये मामला हल हो चुका है.

जस्टिर लोकुर ने इस पर कहा, "मुआवज़ा इस देश के क़ानून से ऊपर नहीं है. वरना सारे बर्बर अपराध पैसे के रूप में मुआवज़ा देकर निपट जाते."

कोर्ट के सामने ये बात साफ थी कि इतने सालों में मणिपुर में किसी भी जवान के ख़िलाफ़ एक भी एफ़आईआर नहीं दर्ज की गई.

इमेज कॉपीरइट VARUN NAYAR
Image caption कमलिनी नांगबन के बेटे नांगबन नोउबा सिंह को साल 2009 में उनके घर के बाहर मार दिया गया था

'31 दिसम्बर तक जांच पूरी करें'

कोर्ट ने पुलिस पर भरोसा न करते हुए सीबीआई को निर्देश दिया कि वो एक टीम गठित कर सारे मामलों की जांच करे, एफ़आईआर दर्ज कराए और चार्जशीट दाखिल करे और सबसे अहम बात कि 31 दिसम्बर 2017 तक जांच पूरी करे.

गौरतलब है कि याचिकाकर्ताओं ने मणिपुर में पिछले 20 सालों में जवानों के हाथों ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से की गई हत्याओं के 1528 मामलों को कोर्ट के सामने पेश किया था. इनमें से ज़्यादातर मामलों में ऐसा कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, जिससे ये पता नहीं चलता है कि मारा गया व्यक्ति उग्रवादी था.

फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्या का मामला

क़तार के आख़िरी: फ़ौज के ख़िलाफ़ खड़ी मणिपुर की विधवाएं

कोर्ट के सामने सवाल था- क्या मणिपुर की पुलिस और सेना ने ज़रूरत से ज़्यादा ताक़त का इस्तेमाल किया और क्या क़ानून के तहत उस व्यक्ति पर ज़रूरत से अधिक ताक़त का इस्तेमाल करना जायज़ है जिसे आर्मी एक्ट की धारा 3 (x) के तहत 'दुश्मन' माना जाता है?

कोर्ट ने सशस्त्र सुरक्षाबल (विशेष अधिकार) एक्ट, 1958 की धारा 4(a) पर विचार किया, जिसके तहत सुरक्षाबलों को ये अधिकार है कि 'अशांत क्षेत्र में पांच या अधिक लोगों के इकट्ठा होने या हथियार ले जाने या हथियार के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले सामान ले जाने, गोला बारूद या विस्फोटक ले जाने की स्थिति' में वे ताक़त का इस्तेमाल कर सकते हैं.

अदालत ने पाया कि केवल इन्हीं हालातों में मौत हो सकती है और क़ानून की ये धारा अतिरिक्त बल इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं देती.

इमेज कॉपीरइट VARUN NAYAR
Image caption एक्स्ट्रा जुडिशियल विक्टिम फैमिलीज़ एसोसिएशन का कामकाज इंफाल में एक कमरे के ऑफिस से चलता है

'मानवाधिकार आयोग को सौंपी बाकी मामलों की जांच'

कोर्ट ने पीयूसीएल बनाम केंद्र सरकार के एक मुकदमे का ज़िक्र किया और कहा कि 'इस मामले में कोई शक नहीं है कि कार्रवाई के नाम पर ज़रूरत से ज़्यादा ताक़त के इस्तेमाल का समर्थन नहीं किया जा सकता. लोगों को भरोसा देने के लिए, इस तरह के आरोपों की पूरी जांच होनी ज़रूरी है.'

'फ़र्जी मुठभेड़' के विरोध में हड़ताल

मोदी के बाद लपेटे में आई केन्द्र सरकार तो चुप्पी क्यों?

इसके बाद कोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) को सभी 1528 मामलों की जांच पड़ताल करने के आदेश दिए.

आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि मानवाधिकार सुरक्षा एक्ट, 1993 में संशोधन ज़रूरी है ताकि एनआचआरसी को दोषी अधिकारियों पर मुकदमा चलाने का अधिकार मिल सके.

उनका कहना था कि आयोग के सुझाव मानने को भी बाध्यकारी किया जाए. उन्होंने आयोग में कर्मचारियों की कमी की भी शिकायत की.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

पहला ऐतिहासिक कदम

लेकिन किसी मुठभेड़ में हुई मौत के मामले में राज्य सरकार को जो प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिए, उसके बारे में एनएचआरसी के दिशा निर्देशों का शायद ही कभी पालन होता है.

यहां तक कि सशस्त्र सेनाओं के मामले में आयोग को जांच करने का भी अधिकार नहीं है.

केवल केंद्र सरकार ही जांच के आदेश दे सकती है. आयोग केवल सिफ़ारिशें कर सकता है और वो भी बाध्यकारी नहीं होती.

ताज़ा फैसला ऐतिहासिक रूप से पहला कदम है. अगर पारदर्शिता को भारत में अपवाद नहीं बने रहने देना है तो इस तरफ़ अभी बहुत कुछ करना बाकी है.

(लेखक साउएशिया ह्यूमन राइट्स डॉक्युमेंटेशन सेंटर से जुड़े हुए हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे