राष्ट्रपति चुनाव में रामनाथ कोविंद की जीत से क्या पीएम मोदी के हाथ मज़बूत होंगे?

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देश की राजनीति के लिहाज़ से सोमवार को दो बड़ी घटनाएं होंगी. पहला दिल्ली में सोलहवीं संसद का चौथा मॉनसून सत्र शुरू होगा, और दूसरा दिल्ली और देश के सभी राज्यों की राजधानियों में देश के चौदहवें राष्ट्रपति के चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे.

ऐसे में सहज जिज्ञासा होती है कि इस चुनाव का औपचारिकता से ज़्यादा कोई मतलब भी है या नहीं? लगता है कि बीजेपी गठबंधन के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद यह चुनाव जीत जाएंगे.

ऐसे में सवाल बनता है कि नए राष्ट्रपति के आगमन से बीजेपी गठबंधन सरकार की स्थिति में क्या बदलाव आएगा? क्या मोदी सरकार की स्थिति बेहतर हो जाएगी?

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राष्ट्रपति केवल 'रबर स्टांप' है

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प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में से एक थे. उनके कार्यकाल में भी मोदी सरकार को कभी परेशानी नहीं हुई.

हाल में नरेंद्र मोदी ने उन्हें कृतज्ञता में पिता-तुल्य माना और कहा, 'मेरे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि मुझे प्रणब दा की उँगली पकड़ कर दिल्ली की ज़िंदगी में ख़ुद को स्थापित करने का मौका मिला.'

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राष्ट्रपति का चुनाव हालांकि राजनीतिक गतिविधि है, पर उसके नाटकीय निहितार्थ नहीं होते. ज़्यादा से ज़्यादा सत्तारूढ़ दल के रसूख का पता लगता है. आमतौर पर उसके नतीजों का पहले से अनुमान होता है.

इस पद की संवैधानिक भूमिका भी काफी हद तक औपचारिक है. कहते हैं कि वह केवल 'रबर स्टांप' है. पर बदलते राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह भूमिका कुछ ख़ास मौकों पर महत्वपूर्ण भी हो सकती है.

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राष्ट्रपति की भूमिका टकराव की नहीं है. सन 1951 में हिन्दू कोड बिल को लेकर डॉ राजेन्द्र प्रसाद और जवाहर लाल नेहरू के बीच पत्राचार हुआ था. वह पहला मौका था, जब राष्ट्रपति के अधिकारों को लेकर सवाल उठाया गया था.

अंततः सहमति इस बात पर हुई कि राष्ट्रपति और सरकार के बीच अंतर दिखाई नहीं पड़ना चाहिए.

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राष्ट्रपति के अधिकार

अप्रैल 1977 में जब केंद्रीय गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह ने नौ राज्यों की विधानसभाओं को भंग करने का फ़ैसला किया तो एकबारगी तत्कालीन कार्यवाहक राष्ट्रपति बसपा दनप्पा जत्ती ने उस आदेश पर दस्तख़त करने से हाथ खींच लिए थे. बाद में उन्होंने सरकार की राय मान ली.

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प्रधानमंत्री राजीव गांधी और तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के बीच सन 1985 में इतनी कटुता पैदा हो गई थी कि ज्ञानी जी सरकार को बर्ख़ास्त करने पर विचार करने लगे थे. पर यह बात कयास ही रही.

मई 2014 में लोकसभा चुनाव में एक अंदेशा था कि किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो क्या होगा? सन 1996 में किसी भी गठबंधन को बहुमत नहीं मिला.

उस समय वरिष्ठ कांग्रेसी नेता शंकर दयाल शर्मा राष्ट्रपति पद पर थे. उन्होंने सबसे बड़े गठबंधन के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया.

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कहते हैं कि कांग्रेस ने गैर-भाजपा दलों को समर्थन का पत्र जल्दी दे दिया होता तो वह 13 दिन की सरकार नहीं बनती. अटलजी को पहले सरकार बनाने का मौका शंकर दयाल शर्मा के विवेक के आधार पर ही मिला.

शांत ही रहे मौजूदा राष्ट्रपति

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Image caption सत्तारूढ़ दल एनडीए ने दलित नेता रामनाथ कविंद को अपना उम्मीदवार घोषित किया है.

सन 2014 में त्रिशंकु संसद होती तब शायद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के विवेक की परीक्षा होती. ऐसा नहीं हुआ, पर 2019 के चुनाव परिणामों के बारे में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता.

यदि 2019 में त्रिशंकु संसद बनी तो राष्ट्रपति को अपने विवेक के इस्तेमाल का मौका मिलेगा. बीजेपी के प्रत्याशी की जीत से उसकी स्थिति कुछ बेहतर हो जाएगी.

रोजमर्रा के कामकाज में भी राष्ट्रपति की भूमिका होती है. कुछ विश्लेषकों का कहना है कि प्रणब मुखर्जी चाहते तो पिछले तीन साल में मोदी सरकार को कई बार असमंजस में डाल सकते थे.

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Image caption रामनाथ कोविंद के सामने विपक्षी पार्टियों के गठबंधन ने दलित नेता मीरा कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया है.

मसलन भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को बार-बार जारी करने पर वे कुछ देर के लिए ही सही हाथ खींच सकते थे. उत्तराखंड और अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन लागू करने के मौकों पर वे कई तरह की आपत्तियाँ दर्ज करा सकते थे.

राष्ट्रपति सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी अपनी निजी राय व्यक्त करते हैं. बहरहाल यह मान लेने में हर्ज नहीं है कि अब मोदी सरकार के लिए हालात आरामदेह हो जाएंगे.

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