इंदिरा गांधी की 'निजी ज़िंदगी' वाले चैप्टर का सच

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भारत की 'आयरन लेडी' कही जाने वाली इंदिरा गांधी अपने कठोर फ़ैसलों के लिए दुनिया में मशहूर थी.

जन्म के 100वें साल में इंदिरा गांधी पर लोग फिर बात कर रहे हैं लेकिन ये बातें बेहद निजी और आपत्तिजनक वजहों से हो रही हैं.

सोशल मीडिया पर इन दिनों इंदिरा गांधी से जुड़ी एक स्टोरी की चर्चा है. वजह है जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव एमओ मथाई की 1978 में छपी किताब 'रेमिनिसन्स ऑफ नेहरू एज' का चैप्टर 'शी'.

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अब क्यों चर्चा में आईं इंदिरा?

सोशल मीडिया पर चैप्टर 'शी' को लेकर चर्चाएँ चल रही हैं. दावा किया जा रहा है कि ये वही चैप्टर है, जिसे एमओ मथाई की किताब से हटा दिया गया था.

इस चैप्टर के अंश काफी निजी हैं, जिसमें कई आपत्तिजनक बातों का ज़िक्र है.

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क्या है मथाई की किताब के चैप्टर शी का सच?

इस चैप्टर को लेकर दो तरह के दावे हैं. एक दावा ये है कि किताब में ऐसा कोई चैप्टर ही नहीं था, इसे बस किताब के प्रमोशन के लिए प्रचारित किया गया था.

दूसरा दावा ये है कि किताब में इंदिरा गांधी पर शी चैप्टर था, जिसमें इंदिरा गांधी और एम ओ मथाई के कथित संबंधों के बारे में जानकारी थी लेकिन इसे छापा नहीं गया था.

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मथाई के कथित चैप्टर शी पर जानकारों ने क्या कहा?

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर बताते हैं, ''1977 में इमरजेंसी पर जब मेरी किताब 'द जजमेंट' छपी और बिकी थी. तब मथाई की 'रेमिनिसन्स ऑफ नेहरू एज' को छापने वाले विकास पब्लिकेशन ने मुझे किताब की हस्तलिपि भेजकर पूछा था कि ये छापें या नहीं. मैंने सलाह दी कि शी चैप्टर के बगैर सब छाप दो. लेकिन बाद में ये चैप्टर सर्कुलेट होता गया.''

शी चैप्टर के वर्णन के बारे में कुलदीप नैयर बताते हैं कि उन्होंने पूरा चैप्टर या किताब नहीं पढ़ी थी. वो कहते हैं, ''मेरी दिलचस्पी ही नहीं थी. इसलिए मैंने पूरा चैप्टर नहीं पढ़ा था.''

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मथाई की किताब के प्रकाश क्या बोले?

कुलदीप नैयर के दावों से उलट किताब को छापने वाले विकास पब्लिशिंग हाउस के मैनेजिंग डायरेक्टर रहे नरेंद्र कुमार ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा, ''मथाई की तरफ से ऐसा कोई भी चैप्टर किताब में कभी छपने के लिए नहीं आया था. न ही हमने ऐसा कोई चैप्टर छापा. शी नाम का कोई भी चैप्टर कभी अस्तित्व में ही नहीं था तो चैप्टर हटाने का सवाल ही नहीं होता.''

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नैयर के दावों को खारिज करते हुए नरेंद्र कुमार कहते हैं, "कुलदीप नैयर जी ऐसा क्यों बोल रहे हैं. मुझे इस बारे में कुछ नहीं कहना. ये इतनी पुरानी बात है. रोज़ सैकड़ों किताबें छपती हैं. कितना याद रखें. "

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