'मैं जेल में ही अच्छा था, अब क़ैद में ज़िंदगी'

कश्मीर

मिर्ज़ा इफ़्तिख़ार हुसैन घर के अंदर अपने परिवार के साथ एक सामान्य इंसान नज़र आते हैं. आराम से, सोच समझ कर बातें करते हैं.

लेकिन घर के बाहर क़दम रखते ही उनकी शख्सियत बदल जाती है. उनके आव-भाव में आक्रमण नज़र आता है.

आवाज़ तेज़ हो जाती है और अंदाज़ लड़ने-भिड़ने वाले शख्स का हो जाता है. इफ़्तिख़ार 43 साल के हैं, लेकिन अब तक बेरोज़गार हैं.

अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने तिहाड़ जेल में गुज़ारा है.

वो 1996 में दिल्ली के लाजपत नगर इलाक़े में हुए एक बम धमाके के इलज़ाम में 14 साल जेल में क़ैद रहे थे.

कश्मीर में फिर पैर जमाने की कोशिश में जैश

आत्मरक्षा के लिए तैयार होतीं कश्मीरी लड़कियाँ

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
14 साल जेल में गुजारकर अदालत से बरी हुआ एक कश्मीरी ऐसा क्यों कह रहा है...

रिहाई के सात साल...

2010 में दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने उन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था.

उनकी रिहाई को सात साल हो चुके हैं लेकिन उनके शब्दों में आज भी कड़वाहट है, "जेल की ज़िंदगी तो सबसे बुरी होती है लेकिन मैं कहता हूँ कि जेल से निकलने के बाद मेरी ज़िंदगी और भी बुरी गुज़री है."

जेल की लंबी ज़िंदगी के कारण उनका जीवन हमेशा के लिए बदल गया है.

वो कहते हैं, "जब मैं जेल गया था तो एक सीधा-साधा नौजवान था. जेल में मेरी शख्सियत बदल गई. मैं अब कठोर सा इंसान बन गया हूँ."

झगड़े के बाद फ़ौजी ने चलाई गोली, अधिकारी की मौत

कश्मीर में लश्कर के तीन 'चरमपंथी' मारे गए

Image caption इफ़्तिख़ार की बहन (दाएं) अपने भाई के लिए परेशान

क़ैद में ज़िंदगी...

इफ़्तिख़ार के अनुसार जेल के अंदर अक्सर झगड़े होते थे. वहां अपनी जान बचाने के लिए अपनी हिफाज़त खुद करनी पड़ती थी.

वो कहते हैं कि वो अब तक समाज से दोबारा जुड़ नहीं सके हैं. बरी होने के बाद होने वाली परेशानियों से ऊबकर वो कहते हैं कि उनके लिए जेल की ज़िंदगी ज़्यादा बेहतर थी.

उनका कहना है, "हमारी ज़िंदगी बाहर निकलकर ज़्यादा ख़राब है. वहां (जेल में) तो पता था कि हम बंद हैं, कुछ कर नहीं सकते. बाहर हमें पता है, हम सब कुछ कर सकते हैं. अदालत कैसे काम करती है, वकील से क्या कहना है. लेकिन हमें ये लगता है कि बरी होने के बाद भी हम क़ैद हैं."

अमरनाथ यात्रियों से भरी बस खाई में गिरी

तीर्थयात्रियों पर हमले के बाद कश्मीर घाटी में क्या बदला?

चरमपंथ को बढ़ावा

कश्मीर घाटी में दर्जनों ऐसे लोग हैं जो कम उम्र में चरमपंथी हमलों के इलज़ाम में गिरफ्तार हुए, लेकिन सबूतों के अभाव में सालों तक जेल में क़ैद रहने के बाद रिहा कर दिए गए.

दिल्ली में उनकी वकील कामिनी जायसवाल कहती हैं, "सालों तक जेल में रहने के बाद इन युवाओं में नाराज़गी बढ़ती है और सम्भवतः वो चरमपंथी भी बन सकते हैं. इससे चरमपंथियों को ग़लत संदेश मिलता है."

दिल्ली में इफ़्तिख़ार की वकील कामिनी जायसवाल कहती हैं, "इससे चरमपंथ को बढ़ावा मिलता है. मुझे लगता है चरमपंथियों को ग़लत पैग़ाम जाता है. मासूम आदमी को अगर आप अंदर डालेंगे तो सोचता है कि मैं बेक़सूर था और 16 साल अंदर रह गया तो मैं अपनी क़ौम के लिए कुछ करूंगा."

500 साल पहले मुसलमान ने खोजी थी अमरनाथ गुफा!

जब तक बंदूक चलेगी, बात नहीं होगी: निर्मल सिंह

Image caption इफ़्तिख़ार के परिवार के लोग और पड़ोसी

निचली अदालत से क़ैद की सजा

इफ़्तिख़ार कहते हैं कि वो अब तक समाज से दुबारा जुड़ नहीं सके हैं. बरी होने के बाद होने वाली परेशानियों से ऊब कर वो कहते हैं कि उनके लिए जेल की ज़िंदगी ज़्यादा बेहतर थी.

इफ़्तिख़ार एक तरह से भाग्यशाली हैं कि उनका नाम केस से ख़ारिज हो गया और अब वो एक आज़ाद शहरी की तरह ज़िंदगी बसर कर रहे हैं.

उनके भाई मिर्ज़ा निसार हुसैन और उनके दो पड़ोसी 21 साल बाद अब भी जेल में हैं. इन दोनों को लाजपत नगर बम धमाके वाले मुक़दमे में दिल्ली हाई कोर्ट ने बरी कर दिया था.

लेकिन उसी साल दौसा, राजस्थान में हुए बम धमाके में उन्हें राजस्थान की एक निचली अदालत ने उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई है जिसे इन दोनों ने राजस्थान हाई कोर्ट में चुनौती दी है.

अनंतनाग हमला केंद्र की नाकामी: संघ

क्या कश्मीर का मुद्दा अब फीका पड़ गया है ?

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
भारत प्रशासित कश्मीर के उपमुख्यमंत्री के मुताबिक सही माहौल में ही हो सकती है पाक से बातचीत

सरकार का पक्ष

इफ्तिखार कहते हैं जब से वो रिहा हुए हैं वो अपने भाई के मुक़दमे की पैरवी में लगे हैं, "जेल से बाहर निकलने के बाद तो हमें भाई के लिए अदालत का सामना करना पड़ा. उसके लिए कभी दिल्ली जाना पड़ता है, कभी राजस्थान जाना पड़ता है. उसके लिए पैसा जुटाना पड़ता है. सारे भाई बहन मिल कर पैसे इकट्ठा करते हैं. इसमें हम पर आर्थिक दबाव पड़ता है. हमारे पास पैसे नहीं हैं. क़र्ज़ लेना पड़ता है."

क्या राज्य सरकार के पास इफ्तिखार जैसे व्यक्तियों को मुख्यधारा में वापस जोड़ने के लिए कोई योजना है?

जम्मू और कश्मीर के उप मुख्यमंत्री निर्मल सिंह कहते हैं, "सरकार सभी के लिए है. जम्मू और कश्मीर के लोगों की सरकार की ज़िम्मेदारी है. ऐसी बात नहीं है कि जिनका जो हक़ है उन्हें उनका हक़ हम नहीं दे रहे हैं. और हम ने दिया भी है."

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इफ़्तिख़ार जैसे लोगों को सरकार उनकी जवानी वापस नहीं कर सकती लेकिन आर्थिक और मनोवैज्ञानिक मदद दे सकती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे