कर्नाटक में अलग झंडे की मांग क्यों?

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कर्नाटक के अपने अलग क्षेत्रीय झंडे के प्रस्ताव को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की ज़मीन तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

यह प्रस्ताव फ़िलहाल शुरुआती स्तर पर ही है. याचिकाकर्ताओं के एक समूह के सवालों के जवाब में राज्य सरकार ने राज्य के लिए "क़ानूनी तौर पर मान्य झंडे का डिज़ाइन तैयार" करने के लिए अधिकारियों की एक समिति तैयार की थी.

भारत में जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय किसी अन्य राज्य के पास अपना झंडा नहीं है. जम्मू-कश्मीर के पास धारा 370 के तहत अपना अलग झंडा है.

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दिलचस्प बात यह है कि याचिका 2008-09 के बीच उस वक्त दायर की गई थी जब कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी. उस वक्त भाजपा सरकार ने कर्नाटक हाई कोर्ट को बताया था कि राज्य का अलग झंडा होना देश की एकता और अखंडता के ख़िलाफ़ है.

अपनी उसी दलील पर कायम रहते हुए भाजपा ने इसे राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाया है. पहले ऐसा लगा कि केंद्र में मौजूद कांग्रेस नेतृत्व इस पर असमंजस की स्थिति में रही.

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कांग्रेस के कर्नाटक राज्य प्रभारी केसी वेनुगोपाल ने कहा, "इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए कन्नड़ और सांस्कृतिक विभाग ने एक समिति का गठन किया है. इस पर कांग्रेस सरकार ने कोई फ़ैसला नहीं लिया है. भाजपा बेमतलब ही इस मुद्दे का विवाद बना रही है."

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वेणुगोपाल का बयान प्रदेश के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के उस बयान के बाद आया जिसमें कर्नाटक के लिए झंडे का विरोध करने के लिए भाजपा की आलोचना की.

पत्रकारों के सवाल के जवाब में सिद्धारमैया ने कहा, "क्या संविधान में कोई ऐसा प्रावधान है जो राज्य को अलग झंडे को अपनाने से रोकता है? क्या भाजपा के लोगों को संविधान में इस तरह के किसी प्रावधान की जानकारी है कि राज्य का अपना झंडा नहीं हो सकता है?

अगर वो कहना चाहते हैं कि उन्हें कर्नाटक के लिए अलग झंडा नहीं चाहिए तो वो ऐसा कहें."

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मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने स्पष्ट तौर पर इससे इनकार किया कि आगामी चुनावों से इसका कोई संबंध है. उन्होंने कहा, "चुनाव तो अगले साल मई में हैं."

उनका कहना है कि इसका सियासत से कोई लेना देना नहीं है. लेकिन, कांग्रेस और भाजपा के राजनीतिक कार्यकर्ता एक मुस्कान के साथ इस दलील को ख़ारिज करते दिखते हैं.

नाम ज़ाहिर ना करने की शर्त पर कांग्रेस के एक नेता ने बताया, "क्षेत्रीय झंडा होने का मतलब ये नहीं कि राष्ट्रीय झंडे का अपमान होगा. कर्नाटक का झंडा तिरंगे के नीचे ही उड़ेगा. हां, ये बात सच है कि अगले साल चुनाव हैं तो ऐसे में इस फ़ैसले के कारण क्षेत्रीय संवेदनाओं के भी राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. हमारा समाज टुकड़ों में बंटा नहीं है."

इस मुद्दे पर जैन विश्वविद्यालय प्रो-वाइस चांसलर और राजनीतिक विश्लेषक डॉ संदीप शास्त्री, दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी भाषा को लागू करने की कोशिशों के विरोध और केंद्र सरकार की "एक राष्ट्र- एक भाषा" की अवधारणा को याद करते हैं.

वो कहते हैं, "यह भाषा के ख़िलाफ़ चर्चा नहीं है लेकिन लोगों के प्रभुत्व के ख़िलाफ़ है, जो उस भाषा का प्रतिनिधित्व करते हैं. झंडे का मुद्दा भी कुछ ऐसा ही है. ये क्षेत्रीय पहचान का एक मुद्दा है."

वो कहते हैं, "ये दुर्भाग्य की बात है कि इस चर्चा में देश की विविधता पर बात नहीं हो रही है बल्कि एकता पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है"

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डॉ संदीप का कहना है "भारत जैसे देश में विविधता एकता है. विविधता के बिना एकता का आधार मजबूत नहीं हो सकता. यही कारण है कि जर्मनी, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश जहां संघीय प्रणाली है, वहां राज्यों की अलग क्षेत्रीय पहचान है. क्षेत्रीय झंडे को महत्व देना मतलब राष्ट्रीय झंडे को अस्वीकृति करना नहीं होता."

डॉ शास्त्री म्यांमार का उदाहरण देते हैं जहां हर क्षेत्रों के अपने अलग-अलग क्षेत्रीय झंडे हैं.

वो कहते हैं, "जब आप एक देश-एक भाषा प्रणाली लागू करते हैं, तो आपको ऐसी की प्रतिक्रिया मिलती है."

यह स्पष्ट है कि चुनाव के ठीक पहले मुख्यमंत्री सिद्धारमैया क्षेत्रीय संवेदनाओं को मुद्दा बना रहे हैं.

बीते सप्ताह एक कन्नड़ संगठन ने एक सम्मेलन आयोजित किया गया था जिसमें देश के दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों से हिंदी-विरोधी संगठनों ने हिस्सा लिया था.

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