ब्लॉगः पीरियड मिस हुआ तो मैरिटल स्टेटस पर सवाल क्यों?

महिलाएं

13-14 साल की एक लड़की डॉक्टर के सामने बैठी है. डॉक्टर पूछती है, 'तुम शादीशुदा हो?'

लड़की सवालिया नज़रों से अपनी मां की तरफ़ देखती है. तबीयत ख़राब होने से भला शादी का क्या कनेक्शन? वह 'नहीं' में सिर हिलाती है.

डॉक्टर लड़की को बाहर भेजकर उसकी मां से धीमी आवाज़ में कुछ पूछती है. आस-पास बैठे दूसरे मरीजों में खुसर-फुसर होने लगती है.

दरअसल, पिछले दो महीने से लड़की के पीरियड्स मिस हो रहे हैं. उसने यह बात अपनी मां को बताई और घबराई मां उसे लेकर डॉक्टर के पास आ पहुंची.

छोटे से कस्बे की वो लड़की इस बात से बिल्कुल बेख़बर है कि वहां मौजूद बाकी लोग उसे कैसी नजरों से देख रहे हैं.

वह बार-बार पूछती है, "डॉक्टर ने ऐसा क्यों पूछा कि मेरी शादी हुई है या नहीं?"

लड़कियों से ऐसे सवाल सिर्फ गांवों या छोटे शहरों में ही नहीं पूछे जाते हैं. दिल्ली जैसे बड़े शहरों का भी यही हाल है.

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डॉक्टर ने पढ़ाया नैतिकता का पाठ

हाल ही में मैंने अलग-अलग मुद्दों पर जागरूकता फैलाने और बदलाव की मांग करने वाली वेबसाइट Change.org पर कुछ ऐसा पढ़ा:

"मैं एक सिंगल लड़की हूं. पिछले दिनों मेरे पीरियड्स मिस हो गए और मैं डॉक्टर के पास गई. मैं यह उम्मीद लेकर गई थी कि डॉक्टर मेरी परेशानी का हल बताएंगी, मुझे दवाइयां देंगी, मेरी मदद करेंगी लेकिन हुआ उल्टा."

"उन्होंने मुझसे अजीब से सवाल किए. जैसे, क्या मेरी शादी हो गई है? मेरा बॉयफ्रेंड है? मैं सेक्स करती हूं? मेरे माता-पिता को इस बारे में मालूम है? मैं डॉक्टर के इस रवैये से मैं हैरान थी."

यह पूजा (बदला हुआ नाम) के साथ हुआ. पूजा इससे बेहद खफ़ा हैं और वह चाहती हैं कि डॉक्टर अविवाहित/सिंगल महिलाओं से ऐसे सवाल न पूछें और न ही उन्हें 'नैतिकता' के पाठ पढ़ाएं.

उन्होंने वेबसाइट पर एक याचिका भी डाली है जिसमें कहा गया है कि ऐसे मामलों में डॉक्टरों को कुछ तय गाइडलाइन्स का पालन करना चाहिए.

सेक्सुअल हेल्थ से जुड़ी परेशानी पर डॉक्टर अक्सर मैरिटल स्टेटस से जुड़े सवाल करती हैं. कायदे से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या आप सेक्शुअली एक्टिव है.

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Image caption डॉक्टर तृप्ति का मानना है कि डॉक्टरों के लिए मरीज की सेक्स लाइफ़ और सेक्सुअल एक्टिविटी के बारे में जानना जरूरी होता है

मर्ज का मैरिटल स्टेटस से क्या लेना-देना?

डॉक्टर तृप्ति पेशे से गाइनोकॉलजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) हैं. वह दिल्ली के विद्यासागर हेल्थ सेंटर में मरीजों को देखती हैं. उनके यहां शहरी के साथ-साथ दिल्ली के ग्रामीण इलाकों से भी मरीज आते हैं.

डॉक्टर तृप्ति का मानना है कि डॉक्टरों के लिए मरीज की सेक्स लाइफ़ और सेक्सुअल एक्टिविटी के बारे में जानना जरूरी होता है.

वह यह भी मानती हैं कि मरीज शादीशुदा हैं या नहीं, वह सेक्सुअली कितनी एक्टिव है, ऐसी बातों से डॉक्टर का बहुत ज्यादा मतलब नहीं होना चाहिए.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "मैं अपने यहां आने वाली लड़कियों को सेफ सेक्स की सलाह देती हूं. एक वयस्क लड़की 'सही' और 'ग़लत' का फैसला ख़ुद ले सकती है."

वह आगे कहती हैं, "लड़कियों के पीरियड्स मिस हो जाना ही सेक्सुअल हेल्थ से जुड़ा मसला नहीं है. इसके अलावा भी कई दिक्कतें हो सकती हैं जैसे संक्रमण या यौन संक्रमण से फैलने वाली बीमारियां."

डॉक्टरों का ऐसा व्यवहार निजी क्लिनिकों और छोटे अस्पतालों तक सिमटा हुआ नहीं है. बड़े और कॉर्पोरेट अस्पतालों में भी लड़कियों को इस तरह के सवालों का सामना करना पड़ता है.

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Image caption अर्शिया कहती हैं कि डॉक्टर ये मानकर चलते हैं कोई सेक्स तभी करता है जब उसकी शादी हो जाती है

रूढ़िवादी सोच से हो रहा इलाज?

दिल्ली में रहने वाली 25 वर्षीय अर्शिया धर अपने अनुभव साझा करते हुए कहती हैं, "वजाइनल इन्फ़ेक्शन होने पर मैं एक गाइनोकॉलजिस्ट के पास गई. मैंने उनसे पूछा- कहीं ये एसटीडी तो नहीं?"

डॉक्टर ने कहा, "अगर तुम शादीशुदा नहीं हो तो एसटीडी का सवाल ही नहीं उठता."

अर्शिया कहती हैं कि डॉक्टर ये मानकर चलते हैं कोई सेक्स तभी करता है जब उसकी शादी हो जाती है. मुझे उनके बर्ताव पर बहुत गुस्सा आया और मैंने इस बारे में एक फ़ेसबुक पोस्ट लिख डाली.

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माता-बाप को बताना कब जरूरी होता है?

डॉक्टर प्रवीण झा ने भारत में काफी वक़्त तक ऐसे मामलों को हैंडल किया है, फिलहाल वह नॉर्वे में प्रैक्टिस कर रहे हैं.

डॉक्टर प्रवीण कहते हैं, "गाइडलाइंस की बात करें तो छोटी-मोटी दिक्कतों के लिए हमें मरीज के अलावा किसी और से बात करने की जरूरत नहीं होती. लेकिन बात अगर प्रेग्नेंसी तक पहुंच जाए तो लड़की के पार्टनर या किसी करीबी को बताना ज़रूरी हो जाता है."

वे कहते हैं, "कई बार गांवों की ऐसी लड़कियां मेरे पास आती थीं जिन्हें पता ही नहीं होता था कि वो प्रेग्नेंट हैं. उन्हें बस इतना पता होता था कि उनके पेट में दर्द हो रहा है. ऐसे में उनके माता-पिता से बात करना मजबूरी हो जाती थी."

वह इसके पीछे तर्क देते हैं कि किसी को बिना बताए अबॉर्शन करना ख़तरनाक होता है. इसमें मौत की आशंका भी होती है.

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कब तक इशारों में बात करेंगी लड़कियां?

'मर्दाना कमजोरी का इलाज', 'सेक्स रोगी मिलें', 'जवानी में भूल की है तो ना पछताएं' जैसे इश्तेहार जगह-जगह दीवारों देखने को मिल जाते हैं. लेकिन जहां बात लड़कियों की आती है, हर तरफ चुप्पी छा जाता है या फिर इशारों में बातें होने लगती हैं.

हमारे डॉक्टर भी उसी समाज से आते हैं जहां से हम.

मेडिकल साइंस और विज्ञान उन्हें इस काबिल तो बनाता है कि वो बीमारी पहचान सकें, इलाज कर सकें लेकिन शायद वो यह समझने में नाकामयाब होते हैं कि उनका काम यहीं तक है, फैसले सुनाने या मोरल साइंस पर लेक्चर सुनाने का नहीं.

क्या हम ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं जहां लड़कियां बेझिझक होकर अपनी सेक्स से जुड़ी तकलीफों के बारे में बात कर पाएं? कम से कम डॉक्टरों से अपनी तकलीफ़ खुलकर बता पाएं...?

आल्ता तब ही लगाया करो जब महीना हुआ करे...

'मेरी बहन पीरियड्स को अच्छे दिन कहती है'

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