'निजता का अधिकार संपूर्ण नहीं, कुछ पाबंदी संभव'

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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि निजता का अधिकार संपूर्ण अधिकार नहीं है और इस पर राज्य कुछ हद तक तर्कपूर्ण रोक लगा सकते हैं.

निजता का अधिकार संविधान के तहत मौलिक अधिकार है कि नहीं, इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ सुनवाई कर रही है.

कोर्ट की 9 सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने जानना चाहा कि निजता के अधिकार की रूपरेखा क्या हो? वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने दलील दी कि स्वतंत्रता के अधिकार में ही निजता का अधिकार निहित है. निजता का अधिकार पहले से मौजूद है और ये संविधान के दिल और आत्मा की तरह है.

इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि स्वतंत्रता के सभी अधिकारों में निजता को समाहित नहीं किया जा सकता. मसलन कोई बेडरूम में क्या करता है, ये स्वतंत्रता के अधिकार के तहत निजता हो सकती है, लेकिन बच्चे को स्कूल भेजना या न भेजना स्वतंत्रता के अधिकार के तहत निजता नहीं है.

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इस पूरी बहस पर बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने बात की अर्थशास्त्री तिका खेड़ा से.

ऋतिका खेड़ा बताती हैं, निजता का अधिकार क्यों मौलिक अधिकार होना चाहिए इस पर कोर्ट ने काफी ध्यान से याचिकाकर्ताओं की बात सुनी है.

लेकिन यह जो एक टिप्पणी आई है कि निजता का अधिकार अपने आप में संपूर्ण नहीं है, वो एक विशेष संदर्भ में की गई है.

जैसे आप बैंक लोन लेने जा रहे हैं और वो आपसे आपकी तमाम सूचनाएं मांगेंगे तो आप यह नहीं कह सकते कि ये मेरे निजता का अधिकार है और मैं ये सूचनाएं नहीं दूंगा या दूंगी.

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अंतरराष्ट्रीय क़ानून में भी निजता के अधिकार का प्रावधान है. भारत में भी कई बार निजता के अधिकार के पक्ष में अपने फ़ैसले सुनाए हैं.

अब यह आम कानून है या मौलिक अधिकार है, इसे लेकर बहस है. इन दोनों में सबसे बड़ा अंतर यह है कि मौलिक अधिकार के तहत अधिक सुरक्षा मिलती है.

यह स्टेट पर नियंत्रण रखता है और इसकी कोई हानि होती है तो हम कोर्ट में भी जा सकते हैं.

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निजता के अधिकार का हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बहुत गहरा संबंध है. 2009 में आधार परियोजना के शुरू होने के कुछ ही समय बाद 2013 में कोर्ट में निजता के अधिकार पर बहस शुरू हो गई थी.

इसके ख़िलाफ़ याचिका डालने वालों का कहना है कि आधार परियोजना निजता के अधिकार का उल्लंघन कर रही है.

इस वजह से इस परियोजना पर सख्त नियंत्रण होना चाहिए कि इसे कहां-कहां इस्तेमाल किया जा सकता है या फिर इसे पूरी तरह से ख़त्म ही कर देना चाहिए.

साल 2015 में कोर्ट में बहस के दौरान सरकारी वकील ने 55 साल पुराने एक केस के हवाले से कहा था कि यह मौलिक अधिकार नहीं है.

लेकिन यह एक तरह से उनकी चालाकी थी क्योंकि इसके बाद इस केस के फ़ैसले को नकारते हुए कई मामलों में कोर्ट ने निजता के अधिकार के पक्ष में फ़ैसले दिए हैं.

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