ब्लॉग: सच है संस्कृति मंत्रीजी! नौकरानियों के बिना कैसे काम चलेगा?

महेश शर्मा

भारत सरकार के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा को अपने एक मित्र का ये मज़ाक काफ़ी पसंद आया कि "हमारा काम नौकरानियों के बिना नहीं चल सकता, पति और पत्नियों के बिना चल जाता है." यह एक खाते-पीते, सफल, संतुष्ट और ख़ुद को हँसोड़ समझने वाले व्यक्ति का मज़ाक था.

महेश शर्मा भी एक खाते-पीते उच्चवर्णीय परिवार में पैदा हुए और उनके पास वो सब कुछ है जो एक सफल व्यक्ति के पास होना चाहिए —ख़ुद डॉक्टर हैं, पत्नी डॉक्टर हैं, नोएडा में एक बड़े महँगे अस्पताल के मालिक हैं, नोएडा (गौतम बुद्ध नगर) से सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं और नरेंद्र मोदी मंत्रिपरिषद में एक महत्वपूर्ण मंत्री भी.

सफल और संतुष्ट होने के लिए अब इससे ज़्यादा और क्या चाहिए?

ऊपर से उन्हें हँसने-हँसाने की इतनी आदत है कि तनाव भरे माहौल में वो कुछ न कुछ ऐसी बात कह देते हैं कि ग़ुस्से में भरे लोग भी खिलखिला के हँसने और तालियाँ पीटने लगते हैं.

'हम बंगाली हैं, हमें बांग्लादेशी क्यों कहते हैं'

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नेहरू युगीन

ख़ासतौर पर वो लोग जो ख़ुद महेश शर्मा की तरह ही खाते-पीते हों, महागुन मॉडर्न जैसे उत्तर आधुनिक नाम वाले आलीशान बहुमंज़िला अपार्टमेंट्स में रहते हों जहाँ स्विमिंग पूल है, जिम है, चौड़ी सड़कें हैं, क्लब है और नौकरानियों को घुसने के लिए गेट पर खड़े दरबान की इजाज़त लेनी होती है.

महागुन मॉडर्न की वेबसाइट आपको बताती है, "लाइफ़स्टाइल को नोएडा के सेक्टर 78 में 25 एकड़ में फैले सुंदर विस्तार में एक और मंज़िल मिली है. यहाँ के घर अमीर वर्ग की पसंद की झलक देते हैं."

यहाँ अमीरी को तहज़ीब की तहों में दिखाने का कोई नेहरू युगीन असमंजस नहीं है.

साफ़-साफ़ कहा गया है कि ये जगह सिर्फ़ अमीरों के लिए है. यानी ग़रीबों को अंदर आने की इजाज़त सिर्फ़ इसलिए मिलेगी क्योंकि वो दौलतमंदों की मजबूरी हैं वरना उनके बरतन कौन साफ़ करेगा, खाना कौन बनाएगा और कौन उनके घरों को चमकाएगा?

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संस्कृति मंत्री

ऐसे आलीशान बहुमंज़िला अपार्टमेंट्स में रहने वाले लोगों को दिलासा दिलाने भारत सरकार के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा पहुँचे थे क्योंकि 12 जुलाई को लगभग सौ लोगों की भीड़ (महेश शर्मा के मुताबिक़ पाँच सौ) गेट के अंदर घुस आई थी और उसने फ़्लैट मालिकों पर पथराव शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें पता चला कि उस सोसाइटी में रहने वाले मिथुल और हर्षुल सेठी ने अपने अपार्टमेंट में झाड़ू-पोंछा-चौका-बरतन करने वाली ज़ोहरा बीबी पर पैसे चुराने का आरोप लगाने के बाद उसे बंधक बना लिया था. जबकि सेठी परिवार का कहना है कि चोरी की बात पता चलने पर ज़ोहरा ख़ुद ग़ायब हो गई थी.

मगर कौन थे ये लोग जिन्होंने आलीशान अपार्टमेंट्स में रहने वालों और उनके चुने हुए जन-प्रतिनिधि को इतना क्रोधित कर दिया? कहाँ रहते थे ये सब? खाते-पीते पॉश लोगों से इनकी क्या दुश्मनी थी कि वो हाथों में पत्थर लेकर साहबों और मेमसाहबों की परवाह किए बग़ैर चमकदार फ़्लैटों पर चढ़ दौड़े?

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बहुमंज़िला इमारतें

ये लोग थे घरेलू नौकर-नौकरानियाँ —झाड़ू पोछा करने वालियाँ, बरतन साफ़ करने वालियाँ, झाड़ू लगाने वाले, इस्तरी करने वाले, ठेले लगाने वाले, अमीरों के बच्चों की देखभाल करने वालियाँ, साब-मेमसाब के अंडरवियर धोने वाले, उन्हें और उनके बच्चों को दफ़्तर, स्कूल, शॉपिंग के लिए लाने ले जाने वाले ड्राइवर.

और ज़्यादातर बांग्लाभाषी मुसलमान. ये लोग महागुन मॉडर्न के पास ही टीन-टप्पर की झुग्गी बस्ती में रहते थे.

इन्हें नोएडा-ग्रेटर नोएडा की ऐसी बहुमंज़िला इमारतें बनवाने के लिए मज़दूरों के तौर पर लाया गया था और अब ये अपने ही बनाए फ़्लैट्स में आ बसे उच्च मध्यवर्ग या अमीरों के घरों में चाकरी करने लगे थे. उन्हें वहाँ बांग्लादेशी कहा जाता है.

लंदन के द गार्डियन अख़बार ने इसे वर्ग संघर्ष जैसा वाक़या बताते हुए लिखा, "अपने ऐश्वर्य भरे अपार्टमेंट्स में डर के मारे दुबके हुए अमीरों की हिफ़ाज़त के लिए हथियारबंद पुलिस आ गई थी क्योंकि झुग्गी झोपड़ियों में रहने वालों की भीड़ उनकी इमारतों के गेट में जबरन घुसने पर आमादा थी."

वेरीफ़िकेशन

इन्हीं डरे हुए लोगों को दिलासा देते हुए संस्कृति महेश शर्मा ने बताया कि नौकर-नौकरानियों से काम करवाना 'हमारी मजबूरी' है.

उन्होंने कहा, "देखिए हमारी ज़रूरतें भी हैं. मजबूरियाँ भी हैं. मैं समझ सकता हूँ, मैं भी एक ऐसे ही सेक्टर 15 में रहता हूँ जहाँ वेरीफ़िकेशन करा कर हम अपने सर्वेंट्स को अंदर लेते हैं…जानते हुए भी कि ये कौन हैं, अनजान बनने की हम कोशिश करते हैं क्योंकि हमारी ज़रूरत है."

फिर उन्होंने वो 'खाते-पीते हँसोड़ आदमी' का मज़ाक दोहराया और कहा, "अभी कल किसी ने कहा - मैं कहना नहीं चाहता यहाँ पर - लेकिन उन्होंने कहा कि हमारा काम नौकरानी के बिना नहीं चलता, पति और पत्नी के बग़ैर चल जाता है."

उनके इस मज़ाक के बाद महागुन मॉडर्न के आभिजात्य बाशिंदों ने ठहाके लगाए गए और तालियाँ बजाईं.

महेश शर्मा जानते हैं कि ये कौन हैं फिर भी वो अनजान बनते हैं क्योंकि 'ऐसे लोगों' को रखना उनकी और उनके जैसे खाते-पीते लोगों की मजबूरी है.

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पुलिस जांच

और फिर नरेंद्र मोदी सरकार में संस्कृति की ज़िम्मेदारी निभा रहे मंत्री ने सीधे-सीधे फ़ैसला सुनाया, "ये सिद्ध हो चुका है और पुलिस जाँच में आ चुका है कि उस परिवार का बिल्कुल भी दोष नहीं है. और अगर किसी का दोष है तो कानून-व्यवस्था अपने हाथ में लेकर किसी के घर पर हमला करने का हक़ किसी को नहीं है चाहे वो कोई भी हो."

उन्होंने किसी पुलिस जाँच या अदालत के फ़ैसले की परवाह किए बिना मौक़े पर ही अपना फ़ैसला सुना दिया और सीधे-सीधे झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले नौकर-चाकरों और काम वालियों को अपराधी घोषित कर दिया.

उन्होंने कहा, "इसमें कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है. अब ये केस कोई बहस का केस नहीं है कि ग़लती किसकी थी. इसकी थी या उसकी थी. ये केस अब बिल्कुल पारदर्शी केस है. एक ग्रुप के लोगों ने इकट्ठे होकर... मॉब ने हत्या की दृष्टि से, मारने की दृष्टि से... धाराएँ लगाई जाएँगी उन पर... गुंडा एक्ट लगाया जाएगा उन पर, उनकी ज़मानतें साल साल भर तक नहीं होंगी. ये मैं विश्वास आपको दिलाता हूँ.. तालियाँ… उनका मुकदमा भी हम लोग लड़ें. कोर्ट कचहरी में पैरवी करनी पड़ी तो उस लड़ाई को भी हम लड़ेंगे."

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अख़लाक़ की हत्या

ज़ाहिर है कि अपने वोटरों को तो इतना भरोसा दिलाना एक चुने हुए जनप्रतिनिधि की ज़िम्मेदारी बनती है.

पर पाठकों, यहाँ पर थोड़ा-सा विषय परिवर्तन की इजाज़त दीजिए और अपनी याददाश्त को थोड़ा झकझोरिए.

तारीख़: 28 सितंबर, 2015. स्थान: ग्राम - बिसाड़ा, दादरी, नोएडा (उत्तर प्रदेश). घर में गोमांस रखने की अफ़वाह के आधार पर रात साढ़े दस बजे गाँव के कुछ हिंदुओं की भीड़ उसी गाँव में रहने वाले मोहम्मद अख़लाक़ के घर में घुस गई और लाठी, डंडे और ईंटों से मार-मार कर उनकी हत्या कर दी.

क्या इत्तेफ़ाक़ है कि बिसाड़ा और दादरी भी संस्कृति मंत्री महेश शर्मा के चुनाव क्षेत्र में पड़ता है.

एक ज़िम्मेदार चुने हुए जन प्रतिनिधि होने के नाते महेश शर्मा ने अख़लाक़ की हत्या होने पर भी बिना वक़्त गँवाए बिसाड़ा का दौरा किया जहाँ भीड़ ने 'क़ानून-व्यवस्था अपने हाथ में लेकर' अख़लाक़ के 'घर में घुसकर' उनकी हत्या की थी.

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सांप्रदायिक रंग

पर महेश शर्मा ने वहाँ क्या कहा? क्या उन्होंने महागुन मॉडेर्न नाम की अट्टालिका में रहने वालों की तरह अख़लाक़ के परिवार वालों को भी भरोसा दिलाया कि "अब ये केस कोई बहस का केस नहीं है कि ग़लती किसकी थी, इसकी थी या उसकी थी. ये केस अब बिल्कुल पारदर्शी केस है. अख़लाक़ की हत्या करने वालों पर हत्या की धाराएँ लगाई जाएँगी, उनकी ज़मानतें साल साल भर तक नहीं होंगी - ये मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ. और अगर कोई संगठन या एनजीओ आता है तो हमारी पार्टी के कार्यकर्ता उससे जवाब-तलब करेंगे. उनमें इतनी ताक़त है."

जी नहीं!

अख़लाक़ के घर में घुसकर उनकी पीट-पीट कर हत्या कर दिए जाने को भारत के संस्कृति मंत्री ने "महज़ एक दुर्घटना" बताया और कहा कि इसे सांप्रदायिक रंग देकर राजनीति करने वालों को बख़्शा नहीं जाएगा.

भारत सरकार

फिर कुछ महीने बाद जब अख़लाक़ की हत्या के एक अभियुक्त की जेल में बीमारी से मौत हो गई तो उसके शव को शहीद का दर्जा देकर तिरंगे में लिपटाया गया और महेश शर्मा ने उस शहीद को भरी सभा में दोनों हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर नमन किया.

अंत में एक सवाल: भारत के संस्कृति मंत्री का दिल जितना महागुन मॉडेर्न के खाते-पीते लोगों के लिए धड़कता है, उतना ही झुग्गी-झोपड़ी के ग़रीबों के लिए क्यों नहीं?

उनका सिर जिस तरह हत्या के अभियुक्त के लिए झुकता है, भीड़ के हाथों मारे गए मोहम्मद अख़लाक़ के लिए क्यों नहीं? भारत सरकार के वरिष्ठ मंत्री को नागरिक और नागरिक के बीच भेदभाव की इजाज़त किसने दी?

शायद इन सवालों का जवाब संविधान की किताब में मिल जाए.

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