चीन को चुनौती क्या सोची समझी रणनीति है?

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भारत ने आज़ादी के बाद, ल्हासा में अपना प्रतिनिधि ब्रितानी आईसीएस अफ़सर ह्यूज रिचर्ड्सन को चुना. वे 1947 से 1950 से भारतीय मिशन के इंचार्ज थे.

15 जून 1949 को भारत के विदेश मंत्रालय को भेजे गए संदेश में उन्होंने सुझाव दिया था कि 'भारत असाधारण परिस्थियों में चुंबी घाटी से लेकर फरी तक कब्ज़ा करने के बारे में विचार कर सकता है.'

चुंबी घाटी, भूटान और सिक्किम के बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तिकोना इलाक़ा है. इसके 16 महीने बाद, चीनी फ़ौज पूर्वी तिब्बत में घुस आई.

उस समय सिक्किम के राजनीतिक मामलों के अफ़सर हरिश्वर दयाल थे. उन्होंने रिचर्ड्सन जैसा ही संदेभ दिल्ली को भेजा.

उनका सुझाव था कि उस समय भारत सरकार ने रिचर्ड्सन की सलाह पर ध्यान नहीं दिया. जबकि ये शुद्ध रूप से एक रक्षात्मक उपाय का सुझाव था और इसमें आक्रमण की कोई मंशा नहीं थी.

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Image caption भारत और चीन के बीच 1962 की लड़ाई की फ़ाइल फोटो

विवादित इलाका

नेहरू को लिखे पत्र में उन्होंने कहा, "भारत की ओर से सिक्किम या भूटान पर हमला, एक रक्षात्मक सैन्य अभियान होगा."

भारत सरकार ने इस प्रस्ताव को भी दोबारा ख़ारिज कर दिया. हालांकि भारत में बहुत से लोग सोचते थे कि भारत को दलाई लामा को ज़ोरशोर से समर्थन देना चाहिए.

16 जून 2017 को जब चीनी सैनिक, चुंबी घाटी के दक्षिण में स्थित उसी विवादित इलाके में घुस आए तब भारत ने वो किया जो उसने 1950 में नहीं किया था. वो अपने क़रीबी दोस्त के बचाव में उतर आया और इस समय ये दोस्त था भूटान.

अपने प्रवक्ताओं और सरकारी मीडिया के मार्फत बीजिंग की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई, शायद उन्हें हैरानी हुई. चीन ने थिंपू को बचाने के लिए भारत के आगे आने की उम्मीद नहीं की थी.

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चीन का तिब्बत पर असर

ये भी सही है कि भारत के लिए ये तिकोना इलाक़ा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है और इसे कब्ज़ा करने को लेकर चीन की नज़र सिर्फ चुंबी घाटी ही नहीं बल्कि सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर भी थी जोकि सैन्य संकट के हालात में भारत की सबसे बड़ी कमज़ोरी है.

चीन की ये कार्रवाई 1890 में ब्रिटेन और मैनकस के बीच हुई संधि के आधार पर थी जिसे न तो कभी तिब्बती माने और ना ही भूटानी क्योंकि महान साम्राज्यवादी शक्तियों ने उनसे सलाह नहीं ली थी.

तिब्बती इतिहासकार सेपॉन डब्ल्यूडी शाकाब्पा के अनुसार, "बरतानवी हुक़ूमत जानती थी कि उस समय चीन का तिब्बत में कोई खास प्रभाव नहीं था."

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ब्रिटिश सरकार

तिब्बतियों को इस संधि में शामिल करने का आखिरकार नतीजा 1904 के यंगहसबैंड के सैन्य अभियान के रूप में सामने आया. इसके दस साल बाद त्रिपक्षीय शिमला समझौता हुआ.

इसके अलावा, 1890 की संधि का मुख्य मुद्दा उत्तरी सिक्किम था, जहां दो साल पहले ब्रिटिश सरकार और तिब्बतियों के बीच हथियारबंद संघर्ष हुआ था.

हालांकि संधि की धारा में ये लिखा है कि, "भूटान सीमा के माउंट गिपमोची से सीमा रेखा शुरू होती है." लेकिन इस इलाक़े का कभी सर्वे नहीं हुआ.

उत्तरी सिक्किम का पहला सर्वे 1895 में हुआ था. कुछ नक्शे तो उसके बाद के भी मिले हैं जिनमें कोई सीमा चिह्नित नहीं थी.

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चीन की आदत

30 जून 2017 को दिल्ली में विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि साल 2012 में चीन के साथ ये तय किया था कि यथास्थिति बनाए रखी जाएगी, और "भारत, चीन और तीसरे देश के बीच तिकोने इलाक़े को संबंधित देशों के साथ सलाह मशविरा के साथ निर्धारित किया जाएगा."

हो सकता है कि इस प्रक्रिया में देरी से उकता कर बीजिंग ने ख़ुद ही फ़ैसला करने का निर्णय लिया हो क्योंकि वो दक्षिण चीन सागर के मामले में पहले ही ऐसा कर चुका है.

बीजिंग को इस सिद्धांत में विश्वास करने की आदत रही है कि पहले कब्ज़ा करने और बाद में बातचीत शुरू करना बेहतर है.

हाल ही में दिल्ली में विदेशी राजनयिकों को संबोधित करते हुए विदेश सचिव एस जयशंकर ने कहा था चीन आम तौर पर आक्रामक रहा है.

उन्होंने सासंदों को बताया कि सीमा निर्धारण के मसले पर भारत की स्थिति बिल्कुल स्पष्ट रही है, हालांकि चीन का रुख अलग रहा है.

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कूटनीतिक समाधान

भारत और चीन के सैनिकों के बीच, तिकोने इलाके के सात किलोमीटर के दायरे में जो मौजूदा तनाव है उसमें एक दिलचस्प बात ये रही है कि दोनों देशों के सैनिक निहत्थे हैं.

ऊंचाई पर दोनों तरफ़ सैनिकों की दो-दो क़तारें आमने-सामने खड़ी हैं, ताकि एक दूसरे को आगे बढ़ने से रोका जा सके.

जबतक हथियार नहीं इस्तेमाल किये जा रहे, तबतक एक कूटनीतिक समाधान की उम्मीद की जा सकती है.

हालांकि चीनी प्रोपेगैंडा अभियान में बहुत आगे तक जा चुके हैं. इसने उनके लिए बिना नुकसान पहुंचाए समाधान तलाशने को और मुश्किल बना दिया है.

पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्याम शरण ने अपने एक ताज़ा साक्षात्कार में कहा था कि कड़वाहट भरे आरोप-प्रत्यारोप की कोई ज़रूरत नहीं है.

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श्याम शरण ने कहा, "मैं नहीं समझता कि हमें किसी संघर्ष की संभावना को देखना चाहिए. ये बहुत गंभीर बात है. मैं इस बात की सराहना करूंगा कि प्रतिक्रिया देने में भारतीय पक्ष काफी संतुलित और परिपक्व रहा है."

और इसे ऐसा ही बने रहना चाहिए. कोई सिर्फ़ ये उम्मीद कर सकता है कि कारण तो बना रहेगा, लेकिन समाधान में समय लगेगा.

और इस साल के अंत में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं कांग्रेस होने जा रही है जिसमें नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाओं को देखते हुए, इससे पहले तक हालात ऐसे ही बने रहेंगे.

इससे पहले एक अगस्त को चीन की सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की 90वीं सालगिरह है.

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भूटान की रक्षा

बीते अप्रैल में शी जिनपिंग ने पीएलए में बुनियादी सुधार लाने की शुरुआत की थी.

उन्होंने आपनी सभी फौजी यूनिटों को युद्ध के लिए तैयार होने और इलेक्ट्रॉनिक, इन्फॉर्मेशन और स्पेस वारफ़ेयर में अपनी क्षमता बढ़ाते हुए नए तरीके के युद्ध कौशल हासिल करने के आदेश दिए थे.

शायद वो ये उम्मीद नहीं कर रहे थे कि भारत इतनी जल्दी भूटान की रक्षा के लिए आगे आ जाएगा.

ये सभी कारण, किसी त्वरित समाधान को मुश्किल बनाते हैं, जोकि पहले जैसी यथास्थिति में आ जाने और क्षेत्र से सेनाएं हटाने से ही संभव है.

(क्लाउड आर्पी तमिलनाडु के ऑरोविले में 'पैवेलियन ऑफ़ तिब्बतन' में डायरेक्टर हैं.)

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