'फ़ेक न्यूज़ से लड़ना है तो रियल न्यूज़ को वायरल बनाना होगा'

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Image caption अधिकांश भारतीयों के लिए उनके पास इंटरनेट मोबाइल फ़ोन के ज़रिए पहुंचा. एक दुकानदार अपने फ़ोन पर 31 दिसंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण देख रहे हैं.

इस साल की शुरुआत में झारखंड में दो अलग-अलग घटनाओं में सात लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. इन घटनाओं ने देश को झकझोर कर रख दिया.

बाद में पता चला कि इन सात लोगों को इस संदेह में मार दिया गया कि वो बच्चों की तस्करी में शामिल हैं.

शक़ की शुरूआत हुई थी एक वॉट्सऐप संदेश से जो वायरल हो गया था. इस संदेश में कहा गया था कि लोगों को अजनबियों से बच कर रहना चाहिए क्योंकि वो 'किसी बच्चा चारी वाले गिरोह' में शामिल हो सकते हैं.

इस संदेश के बाद जैसे लोगों में पागलपन फैल गया. गांववालों ने अपनी सुरक्षा के लिए हथियार जमा करना शुरू किया और हर उस अनजान व्यक्ति पर हमले करने लगे जिन्हें वो नहीं जानते थे. नतीजा हुआ सात लोगों की हत्या.

अन्य देशों से अलग भारत में फ़ेक न्यूज़ यानी झूठी ख़बरें वॉट्सऐप और मोबाइल फ़ोन संदेशों के ज़रिए फैलती हैं क्योंकि अधिकांश भारतीयों के लिए इंटरनेट का झरोखा पहली बार उनके मोबाइल फ़ोन के ज़रिए ही खुला.

फ़ेक न्यूज़ की पोल खोलने के 8 तरीक़े

झूठी ख़बरों का इस्तेमाल और उनका असर

भारतीय दूरसंचार नियामक आयोग के अनुसार भारत में एक अरब से अधिक सक्रिय मोबाइल फोन कनेक्शन हैं और काफी कम समय में दस लाख से अधिक भारतीयों ने ऑनलाइन दुनिया तक अपनी पहुंच बना ली है.

Altnews.in के संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने बीबीसी से बताया, "लोगों तक पहुंच तेज़ी से बढ़ रही है, स्मार्टफ़ोन लोगों तक तेज़ी से पहुंच रहा है, डेटा पैकेज सस्ते हो रहे हैं. इसकी वजह से अफ़वाह तेज़ी से और जल्दी फैलती है. ग्रामीण इलाके के लोगों के पास तेज़ी से सूचनाएं पहुंच रही है और वे ये नहीं मालूम कर पाते हैं कि इनमें सच क्या है, उन्हें तो जो जानकारी मिलती हैं, उन्हें वो सच मान लेते हैं."

प्रतीक सिन्हा उन लोगों में हैं जो भारत में फ़ेक न्यूज़ के कहर से लड़ रहे हैं. वे पहले सॉफ़्टवेयर इंजीनियर रहे हैं और अब अपने बचत के पैसों से अपनी वेबसाइट चला रहे हैं.

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Image caption प्रतीक सिन्हा एक न्यूज़ वेबसाइट चलाते हैं

आल्टन्यूज़, सोशल मीडिया और वॉट्सऐप पर वायरल हो रही स्टोरीज के आंकड़ों की जांच करता है, फ़ोटोग्राफ़ और वीडियो की जांच करता है और मीडिया संस्थाओं की उन स्टोरीज़ पर नज़र रखता है जो फ़ेक न्यूज़ पर आधारित होते हैं.

उनकी वेबसाइट पर जिन रिपोर्ट्स को झूठा बताया गया है उनमें एक वायरल वीडियो भी शामिल है, जिसमें दावा किया जा रहा था कि एक हिंदू लड़की को मुस्लिम लोगों की भीड़ पीट रही है. सिन्हा के मुताबिक ये वीडियो बार बार वॉट्सऐप पर आ रहा था जिसमें ये अपील की जा रही थी कि शायद इसे देखकर अधिकारी इस पर कार्रवाई करेंगे.

हालांकि ये वीभत्स वीडियो, वास्तव में ग्वाटेमाला में भीड़ का शिकार बन रही एक लड़की की थी और दो साल पुरानी थी. सिन्हा के मुताबिक़ ऐसे वीडियो को कट्टरपंथी लोग प्रचारित करते हैं और इनमें अमूमन मुस्लिम विरोधी भाव देखने को मिलता है.

सच-झूठ का पता लगाने के कुछ तरीके

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  • गूगल रिवर्स इमेज सर्च से आप तस्वीरों का सच मालूम कर सकते हैं. इसके लिए आपको तस्वीर को ऑनलाइन अपलोड करना होगा और उसके बाद ये मालूम किया जा सकता है कि ये तस्वीर पहले कहां ऑनलाइन हुई थी. आप इसके लिए गूगल पर जा सकते हैं और इमेज सर्च कर सकते हैं या फिर गूगल सर्च इमेज का विस्तार करके क्रोम ब्राउजर पर सर्च कर सकते हैं.
  • Tineye भी पाठकों को ये सुविधा देता है कि वे पता लगा सकें कि तस्वीर के साथ छेड़छाड़ हुई है या नहीं.
  • वीडियो को जेपीजी में कन्वर्ट करने वाला मुफ्त कन्वर्टर वीडियो को तस्वीरों में बदल सकता है, और उसकी जांच अलग अलग संभव है. यह कन्वर्टर आप ब्राउजर में इंस्टाल भी कर सकते हैं.
  • InVid ने भी ऐसा ब्राउजर एप्लिकेशन डेवलप किया है जिसमें लोग वीडियो लिंक जोड़ सकते हैं. इसके बाद वह उस वीडियो का विस्तार से विश्लेषण करता है.

प्रतीक सिन्हा के मुताबिक भारत में फ़ेक न्यूज़ को बढ़ावा वॉट्सऐप के ज़रिए मिल रहा है जो एक तरह से वायरस की तरह बढ़ रहा है.

प्रतीक कहते हैं, "वॉट्सऐप में शुरू से अंत तक की चीज़ों का इनक्रिप्शन होता है. मतलब जिन दो लोगों के बीच संदेश भेजा जाता है, वह ख़ास तरह के कोड से बंधा होता है, भले वो आगे बढ़ाया हुआ संदेश क्यों न हो. यानी अगर कोई फ़ेक न्यूज़ है भी तो वहां कहां से शुरू हुआ था इसका पता वॉट्सऐप के लिए भी लगाना मुश्किल है."

डिजिटल मीडिया की एक एक्सपर्ट दुर्गा रघुनाथ दूसरी समस्या की ओर ध्यान दिलाती हैं, उनके मुताबिक लोग सोशल नेटवर्क मैसेजिंग ऐप पर वीडियो या संदेश के स्रोत के बारे में नहीं पूछते.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "लोगों का मानसिक रूझान अलग है, ज़्यादातर लोग भावनात्मक तौर पर इन संदेशों को लेते हैं. ऐसी सूचनाएं परिवार और दोस्तों के ज़रिए ही आती हैं, ऐसे में उसको चेक करने का रुझान और भी कम होता है."

SM Hoax slayer वेबसाइट चालने वाले पंकज जैन बताते हैं कि वेबसाइट शुरू करने की वजह ही वॉट्सऐप पर मिलने वाली अफ़वाहें रहीं.

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Image caption अफ़वाहों से तंग आकर पंकज जैन ने अपनी वेबसाइट शुरू की है

पंकज जैन कहते हैं, "मैंने लोगों को संदेश देना शुरू किया कि आप लोग जो फैला रहे हैं वह सच नहीं है, अब फ़ैसला लीजिए."

पंकज जैन उन पहले लोगों में थे, जिन्होंने उस वायरल ख़बर का खंडन किया था जिसमें दावा किया जा रहा था कि 2000 के नए नोटों में नैनो जीपीएस चिप लगी होगी.

पंकज जैन कहते हैं, "मैंने काफ़ी रिसर्च किया और पाया कि ज़्यादातर नैनो जीपीएस चिप्स के काम करने के लिए पावर चाहिए, साफ़ है कि नए नोटों में पावर का स्रोत तो नहीं होता."

इसके अलावा पंकज ने उस वायरल फ़ोटो का सच भी लोगों के सामने रखा, जिसे एक प्रमुख टीवी चैनल पर दिखाया जा रहा था और कहा जा रहा था कि ये तस्वीर भारत प्रशासित कश्मीर में दो चरमपंथियों की हत्या की है. हालांकि वो तस्वीर पंजाब की थी और वो भी दो साल पुरानी.

वास्तविक ख़बरों को वायरल बनाना होगा

हाल ही में उन्होंने वॉट्सऐप पर वायरल हो रही इसराइली संसद पर तिरंगे झंडे की तस्वीर के बारे में भी बताया कि ऐसा केवल फ़ोटोशॉप के ज़रिए किया गया है.

फ़ेक न्यूज़ से लड़ रहे इन लोगों में Check4spam.com चलाने वाले शाम्मास ओलियाथ भी रहे हैं. वे ऐसे कंटेंट को इंटरनेट पर अफ़वाह और प्रमोशन के तौर पर बांटते हैं लेकिन उनका मानना है कि ज़्यादातर ख़बरें राजनीति से संबंधित होतीं हैं.

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Image caption भारत में एक अरब से ज़्यादा मोबाइल कनेक्शन हैं

उन्हें रोजाना 200 से ज़्यादा वॉट्सऐप एनक्वायरी मिलती हैं, हालांकि जब से उनकी बदौलत एक मीडिया संथान ने भगोड़े दाऊद इब्राहिम की संपत्तियों को जब्त किए जाने के दावे वाली ख़बर को हटाया तबसे उनके पास अनुरोध बढ़ते जा रहे हैं.

अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद इन तीनों लोगों को इस बात का अहसास है कि वे अपने दम पर फ़ेक न्यूज़ से पूरी तरह नहीं लड़ सकते. सिन्हा बताते हैं कि आल्टन्यूज़ पर पांच महीने में औसतन 32 लाख पेज व्यूज हैं जबकि एसएम हॉक्सस्लेयर पर प्रति महीने ढाई लाख. वहीं चेक4स्पॉम पर रोज़ाना 15 हज़ार लोग आते हैं.

व्हाट्सएप पर संदेश का स्रोत पता लगाना मुमकिन?

ये संख्या भारत की मुख्यधारा की मीडिया के सामने कुछ नहीं है और दूसरी तरफ़ रोज़ाना फ़ेक न्यूज़ से संबंधित हज़ारों संदेश एक दूसरे को भेजे जाते हैं.

ओलियाथ तो ये भी कहते है कि भारत की मेनस्ट्रीम मीडिया भी समस्या में शामिल है. रघुनाथ कहती हैं, "जल्दबाज़ी के चक्कर में फैक्ट चेक करने पर ध्यान नहीं होता. भारत में टीवी का माध्यम टेबलॉयड जैसा रहा है और ये गंभीर नहीं रहा है. सरकारी दूरदर्शन कभी आगे नहीं बढ़ पाया और बाक़ी सब टेबलॉयड जैसा है."

दुर्गा रघुनाथ के मुताबिक भारत के डिज़िटल न्यूज़ रूम में भी फैक्ट चेक करने पर कम ही ध्यान होता है.

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Image caption इस तस्वीर में बायीं ओर दिख रहें चेक4स्पैम वेबसाइट चलाने वाले ओलियाथ

दुर्गा रघुनाथ के मुताबिक फ़ेक न्यूज़ पर अंकुश पाने के लिए मीडिया साक्षरता को बढ़ाना होगा और इसके ख़िलाफ़ मेनस्ट्रीम मीडिया को आगे आना होगा. दुर्गा रघुनाथ के मुताबिक यह असानी से किया जा सकता है. उनके मुताबिक़ न्यूज़ और एनालिसिस पीस के अंतर को समझते हुए न्यूज़ वाले लेखों में स्रोत, फैक्ट और एनालिसिस को चिन्हित करके पाठकों के सामने रखना चाहिए.

दुर्गा रघुनाथ कहती हैं कि फ़ेक नयूज़ से बचने के लिए वास्तविक ख़बरों को वायरल बनाना होगा. वह कहती हैं, "हम इसे फ़न वाले अंदाज में कर सकते हैं, अगर लोगों को लिस्टिकल चीज़ें पसंद आ रही हैं, तो हमें लिस्टिकल करने चाहिए. अगर लोगों को मीम्स पसंद आ रहे हों तो हमें वो भी करना चाहिए. हमें ये सब करते हुए ना तो अकादमिक होना चाहिए और ना ही अजीब लगना चाहिए."

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