नज़रिया: 'प्रणब मुखर्जी अच्छे प्रधानमंत्री हो सकते थे लेकिन...'

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प्रणब मुखर्जी का पांच साल का राष्ट्रपति का कार्यकाल सामान्य रहा. प्रणब देश के तेरहवें राष्ट्रपति थे.

उनसे पहले जो बारह राष्ट्रपति रहे उन सबने कोई न कोई नई बात की, नज़ीर कायम की, कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मामलों पर अपनी राय रखी.

प्रणब मुखर्जी ने सिर्फ़ अपने काम से काम रखा और सरकार के काम में कोई दखलअंदाज़ी नहीं की, कोई नई नज़ीर नहीं कायम की.

लेकिन आज जो देश की राजनीति है और देश का माहौल है उसमें हो सकता है कि कांग्रेसजन के मन में यह उम्मीद हो सकती है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी अपने कार्यकाल में कोई नई नज़ीर कायम करते.

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कोई नज़ीर कायम करते...

देश के तेरहवें राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने 25 जुलाई 2012 को शपथ ग्रहण किया था. करीब पांच दशक लंबे अपने राजनीतिक सफ़र में प्रणब मुखर्जी पांच बार राज्यसभा में रहे, वो देश के वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री भी रहे.

2014 में बीजेपी चुनाव जीती और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और बीते तीन साल से प्रणब मुखर्जी ने बीजेपी सरकार में राष्ट्रपति पद का दायित्व संभाला.

ऐसे में राष्ट्रपति ने मनमोहन सरकार और मोदी सरकार दोनों के साथ ही बहुत अच्छा तालमेल निभाया और इसके लिए अगर उन्हें नंबर देने हों तो उन्हें सौ में से सौ मिलने चाहिए.

लेकिन हमें देखना होगा कि भारत के संविधान में या राजनीति में या इस पद से होने वाली उम्मीदों की बात करें तो राष्ट्रपति संसद और सरकार से ऊंचा पद होता है. कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति से जनता को कुछ उम्मीदें होती हैं.

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बाबरी मस्जिद विध्वंस

उदाहरण के तौर पर पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन ने उस वक्त प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिख कर याद दिलाया कि क्यों न न्यायिक सेवा में दलितों पिछड़े वर्गों का भी आरक्षण हो.

हालांकि इस पर कुछ हुआ तो नहीं लेकिन चर्चा ज़रूर हुई.

जब पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे तब उस वक्त के राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने 6 दिसंबर 1992 को हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद कहा कि यह देश के लिए अच्छा नहीं है.

इसका एक इम्पैक्ट ये हुआ कि लोगों ने चर्चा की कि देश के प्रथम नागरिक संवेदनशील हैं.

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मोदी से संबंध

कभी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के तौर पर जाने जाने वाले प्रणब मुखर्जी इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी के साथ अपने सौहार्दपूर्ण संबंधों के कारण मीडिया में चर्चा में रहे.

अपने विदाई भाषण में प्रणब मुखर्जी ने मोदी के साथ अपने संबंधों का ज़िक्र भी किया और कहा कि उनके प्रति विनम्र व्यवहार के लिए वो हमेशा मोदी को याद रखेंगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 में एक कार्यक्रम के दौरान प्रणब को 'पिता की तरह' बताया. इसे राजनीतिक शिष्टाचार का बड़ा उदाहरण भी मान सकते हैं.

लेकिन प्रणब मुखर्जी के सहयोगियों में आशा थी कि अगर ऐसा सौहार्द है तो क्या उन्हें राष्ट्रपति का दूसरा कार्यकाल मिलेगा.

लेकिन न तो सरकारी पक्ष में इसकी चर्चा हुई न ही ऐसा देखने को मिला. हम कह सकते हैं कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री पद को छोड़ कर लगभग हर पद पर रहे.

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अच्छे प्रधानमंत्री हो सकते थे!

वो एक अच्छे प्रधानमंत्री हो सकते थे जो भारत को नहीं मिल पाया.

हमें ऐसा लगता है कि वो बहुत-सी चीज़ें कह सकते थे, लिख सकते थे, बोल सकते थे लेकिन उन्होंने अपने आप को एक तरीके से ढाल रखा है और उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का पूरा सहयोग किया.

दोनों सरकारों में उन्होंने बेहतर तालमेल रखा. कोई भी बिल हो या कोई भी मामला हो- राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने पर वो अपनी राय रख सकते थे लेकिन उन्होंने अपनी राय नहीं रखी.

(रशीद किदवई से बातचीत पर आधारित. उनसे बात की बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने)

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