'जंगल में छिपने वाले आदिवासी और सूअर खाने वाले दलित बने'

Image caption ब्रजबिहारी कुमार, ICSSR चेयरमैन
  • भगत सिंह 'कम्युनिकेशन गैप' के शिकार थे, वे राष्ट्रवादी थे, कम्युनिस्ट नहीं थे.
  • दलित शब्द में एक मार्क्सवादी नज़रिया है.
  • महाभारत के समय सभी हिंदुओं की एक ही जाति थी--ब्राह्मण.

ये विचार हैं भारत की समाज विज्ञान की शीर्ष शोध संस्था 'इंडियन काउंसिल फॉर सोशल साइंस रिसर्च' (आईसीएसएसआर) के चेयरमैन डॉक्टर ब्रज बिहारी कुमार के. उन्हें इसी साल मई में इस संस्था का प्रमुख बनाया गया है.

समाज विज्ञान के क्षेत्र में अब तक प्रचलित और स्थापित लगभग सभी सिद्धांतों से डॉक्टर कुमार असहमत दिखते हैं, वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ईमानदार मानते हैं लेकिन कहते हैं कि वे संघ से जुड़े नहीं हैं.

उनकी नियुक्ति पर सवाल उठाए गए हैं, 'चिंतन सृजन' नाम की एक पत्रिका के संपादकीय लेखों में उन्होंने कई ऐसी 'विवादित' बातें लिखीं हैं जिन्हें कई अख़बारों ने उनकी नियुक्ति के समय छापा था .

76 साल के बीबी कुमार ने बीबीसी से बातचीत की शुरुआत में ही ज़ाहिर कर दिया कि अपनी नियुक्ति पर आए मीडिया कवरेज से वे ख़ुश नहीं हैं.

आपकी अकादमिक यात्रा और सामाजिक विज्ञान से जुड़ाव के बारे में बताएं.

मैंने बिहार के एक कॉलेज से केमिस्ट्री के लेक्चरर के तौर पर नौकरी शुरू की थी, फिर नागालैंड कोहिमा साइंस कॉलेज चला गया. आज से 39 साल पहले मैं नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी की एकेडमिक काउंसिल का सदस्य था. तब एक मित्र के कहने पर एंथ्रोपॉलजी में एमएससी और पीचएडी दोनों की. फिर हिंदी में भी एमए किया. और वहीं से प्रिंसिपल पद पर रिटायर हुआ.

समाज विज्ञान में शोध के क्षेत्र में आपका क्या योगदान रहा है?

मैंने पूर्वोत्तर भारत की जनजातीय भाषाओं के कोश और व्याकरण देवनागरी में तैयार किया और प्रकाशित कराया. लगभग 13 हज़ार पृष्ठों का काम है. जाति व्यवस्था, इस्लाम, छोटे राज्यों के गठन पर मेरी किताबें हैं. मेरी 80 से अधिक पुस्तकें अमेरिकन लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस की सूची में शामिल हैं. लोगों ने मेरे बारे में कहा कि वे मुझे नहीं जानते. इस देश के लोग तो बहुतों को नहीं जानते. कुमारस्वामी और अरबिंदो को नहीं जानते. मुझे लोग जानें, ये मैं आवश्यक नहीं समझता.

सामाजिक विज्ञान के शोध में हमसे कुछ ग़लतियां हुई हैं?

बहुत कुछ अच्छा भी हुआ है, ग़लतियां भी हुई हैं. हम सर्वे कराने जा रहे हैं. सबसे बड़ी ग़लती ये है कि बहुत से विषयों पर कई-कई रिसर्च और डुप्लीकेशन हैं और बहुत सारे विषय अनछुए हैं. मुझे लगता है कि प्राथमिकता बदलने की ज़रूरत है.

बहुत से लोगों ने बहुत अच्छा काम किया है. धर्मपाल का ज़िक्र करूंगा. उन्होंने सर्वे करके पाया कि हर गांव में पारंपरिक स्कूल होते थे और उनमें हर जाति के बच्चे पढ़ते थे. सामने आया कि अंग्रेज़ों के आने के पहले हमारे यहां शिक्षा का स्तर अच्छा था. अंग्रेज आए तो 40 साल में शिक्षा तिहाई रह गई. लेकिन मिथक ये रचे गए कि हिंदुओं ने अपनी तथाकथित नीची जाति के लोगों को पढ़ने नहीं दिया. क्या हमें धर्मपाल को पढ़ना नहीं चाहिए? लेकिन हमारी मुख्यधारा के अकादमिक लोग उनका बहिष्कार करते हैं. उनका नज़रिया औपनिवेशिक है.

भारत में दलितों की मौजूदगी आप कब से मानते हैं?

मैं विदेशी लेखक अल बरूनी से बात शुरू करूंगा. वो मध्य एशिया से एक हजार वर्ष पहले भारत में आए थे. उन्होंने कहा है कि भारत में केवल चार जातियां हैं. आठ अन्य लोगों की बात भी की है, लेकिन हिंदुओं में सिर्फ़ चार जातियों का ज़िक्र किया है और लिखा है कि वे लोग एक स्थान पर भोजन करते थे. तो छुआछूत कहां रही? ये उल्लेख एक विदेशी मुसलमान का है.

फिर दस हज़ार जातियां बाद में कैसे बन गईं. इसके दो कारण रहे. हमारे यहां श्रेणियां होती थीं. वे अपनी जाति से बाहर विवाह करते थे, जैसे सुनार और लुहार में आपस में विवाह कर लेते थे. बाद में वे अंतर्विवाही बन गए. एक दूसरी वजह थी कि हिंदुओं ने ख़ुद में विश्वास करना छोड़ दिया. अल बरूनी ने कहा है कि महमूद के आक्रमण से हिंदू धूल की तरह बिखर गए. उनकी विद्या दूर चली गई.

फिर वे मानसिक सिकुड़न के शिकार हो गए और उन्होंने दूर के स्थानों पर विवाह करना बंद कर दिया.

लेकिन अल बरूनी का पूरा टेक्स्ट कुछ और है, उन्होंने लिखा है कि लोग एक स्थान पर खाते थे, लेकिन वे चार अलग-अलग समूहों मेंऔर एक समूह के लोगों को दूसरे में घुलने-मिलने की इजाज़त नहीं थी. जिसकी व्याख्या आप चार जातियों के तौर पर कर रहे हैं, अल बरूनी शायद चार वर्णों की बात कर रहे थे?

ऐसा है कि जाति शब्द हमारे साहित्य में उस रूप में नहीं आया है, जिस रूप में आप सोच रहे हैं. पाणिनि ने जाति के उल्लेख को गोत्र और चारण से जोड़ा है. अगर जाति को आप इतिहास में पीछे ले जाते हैं तो जाति वर्ण से अलग नहीं है. और अलग खाने की बात आप कहते हैं तो अल बरूनी ये भी लिखता है कि दो भाइयों में हिंसक द्वंद्व है तो उनके बीच में एक पर्दा लगा दिया जाए और वो एक पंगत में न खाएं.

छुआछूत की जिस परंपरा का बार-बार जिक्र होता है, उसमें एक स्थान में लोग नहीं खाते हैं. मैं कहूंगा कि संपादकीय में बातें संक्षिप्त होती हैं. मेरी बहुत मोटी किताब है, उसे आप पढ़ें तो लगेगा कि चीज़ें उतनी सरल नहीं हैं.

क्या आज अंतर्जातीय विवाह होने चाहिए?

हमारे यहां ऐसा होता रहा है. निषेध नहीं था. महाभारत में कहा गया है कि हिंदुओं में एक ही जाति थी- ब्राह्मण. सभी ब्राह्मण थे. इसलिए तथाकथित दलित, वैश्य, ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच आपस में विवाह नहीं होना चाहिए, इसे मैं नहीं मानता.

दलित के आगे आपने तथाकथित दलित क्यों लगाया?

इस शब्द में एक मार्क्सवादी नज़रिया है. मैं नहीं मानता कि एक वर्ग के साथ अन्याय नहीं हुआ. हुआ है. लेकिन कुछ बदलाव आए हैं, उसकी स्वीकृति तो आप नहीं देते. आज जो कुछ लिखा जा रहा है, क्या उसमें अंबेडकर और गांधी की स्वीकृति है?

आप मानते हैं कि अंबेडकर के लाए आरक्षण से बदलाव आया है?

आरक्षण की स्वीकृति है. कुछ लोग स्वीकृत नहीं करते हैं, लेकिन वे कम हैं. आरक्षण में ग़लतियां भी होती हैं. साधन संपन्न वर्ग अगर सब कुछ खा जाए तो उस वर्ग के लोगों को भी सोचना चाहिए. प्रयास उधर से होना चाहिए. जो सच में वंचित है उसे लाभ मिले.

आपने ऐसा भी लिखा था कि मुग़लों के हमले की वजह से आदिवासी और दलित अस्तित्व में आए?

अत्याचार के डर से हिंदू जंगलों में भागे और बहुत से हिंदू आदिवासी बन गए. इसका बड़ा भारी डेटा दिया है इतिहासकार अवकेश लाल ने.

इसका एक और पहलू है जिसका उल्लेख मैंने भी किया है. वो ये है कि बहुत से हिंदुओं ने मुसलमानों के डर से सूअर का मांस खाना शुरू किया. उनका सामाजिक दर्जा नीचे हो गया और उनमें सभी जातियों के लोग थे. तीसरी बात, यहां समझने की है कि हिंदू जाति व्यवस्था में ऊपर जाने की प्रवृत्ति भी थी और नीचे आने की भी. मोबिलिटी दोतरफ़ा थी.

मुग़ल तो भारत में बहुत बाद में आए. लेकिन हज़ारों साल पहले लिखी गई मनुस्मृति में दलितों का ज़िक्र है?

आप 14वीं या 15वीं शताब्दी में 'मनुस्मृति' का कहीं कोई ज़िक्र पाते हैं. जितना अंग्रेज़ों ने उसे महत्व दिया. अंग्रेज़ों ने एक साज़िश के तहत मनुस्मृति को स्वीकृति दी. मनुस्मृति को आप पढ़िए. आप पाएंगे कि बहुत सहजता से बातें चल रही हैं और अचानक एक रूखापन आता है. उसमें बहुत कुछ क्षेपक है (बाद में जोड़ा गया). उस पर हमारे विद्वान अध्ययन नहीं कर रहे हैं.

आप कह रहे हैं कि मनुस्मृति को संपादित किया गया?

संपादित नहीं किया गया. उसमें जोड़ दिया गया. बहुत कुछ जोड़ा गया. उदाहरण मैं देता हूं. तुलसी की रामायण में शंबूक का उल्लेख नहीं है. अकेला संस्करण जो बॉम्बे से छपा, उस आदमी को अंग्रेज़ों ने पुरस्कृत किया. इस साज़िश से हम आंख मूंद नहीं सकते. क्षेपक की या चीज़ों को जो़ड़ने की बातें इस देश में छिपकर नहीं हुई हैं. उन पर रिसर्च होना चाहिए.

लेकिन मनुस्मृति में एक ही अपराध के लिए ब्राह्मणों को कम सज़ा और शूद्रों को अधिक है.

ब्राह्मणों को ज़्यादा दंडित करने का प्रावधान है. आप समग्रता में पढ़िए चीज़ों को. एक और बात. ब्राह्मण हर जाति में होता है. आप वाल्मीकि को पढ़िए. वो लिखते हैं कि रावण की अर्थी जा रही है और उसके पीछे राक्षस कुल के यजुर्वेदी ब्राह्मण अग्नि लेकर चल रहे हैं. जब राक्षस कुल में ब्राह्मण हो सकता है तो नस्ल कहां आई, सामाजिक दर्जा कहां रहा.

जिस मोबिलिटी का ज़िक्र आप कर रहे हैं, उसके आधार पर क्या हम तथाकथित नीची जातियों को तथाकथित ऊंची जातियों में प्रवेश दे सकते हैं?

आज कई जाति क्लस्टर के लोग मिल रहे हैं, समूह बना रहे हैं. जैसे ओडिशा का तेलियों का संगठन हुआ, कई तेलियों की जातियां जो एक दूसरे में शादियां नहीं करती थीं, वे साथ मिल गईं. यादवों में भी ऐसा ही बदलाव आया.

लेकिन वे सभी समाज व्यवस्था के चौथे पायदान पर ही थीं और अब भी वही हैं. सिर्फ आपस में दूरियां घटी होंगी, लेकिन उनका सामाजिक दर्जा कहां बढ़ा?

चौथा पायदान उतना बड़ा नहीं था. तीसरे से लोग चौथे में गए हैं. यानी नीचे की ओर मोबिलिटी थी, इसे आप स्वीकृत करें. और विवाह हो रहे हैं. अंतर्जातीय विवाह हो रहे हैं, उनमें सामाजिक स्वीकृति मिल रही है.

मार्क्सवादी इतिहासकारों से आप ख़ासे नाराज़ हैं?

मार्क्सवादी इतिहासकार औपनिवेशिक इतिहासकारों की नकल हैं. वो एक सिक्के के दो पहलू हैं. दोनों में कोई अंतर नहीं है. मार्क्स ने ब्रिटिश साम्राज्य की तारीफ़ की है. उसके कंस्ट्रक्टिव और डिस्ट्रक्टिव दोनों पहलुओं की तारीफ की है. वो उनके चेले हैं. इससे ज़्यादा मैं कुछ नहीं बोलूंगा.

लेकिन भगत सिंह परंपरावादियों के प्रिय कैसे बने हुए हैं, जबकि उन्होंने खुलेआम मार्क्सवादी विचार लिखे हैं?

नास्तिकवाद का उल्लेख आपने किया तो ये बतलाइए कि चार्वाक क्या मार्क्स के चेले थे. मैं आपसे पूछता हूं कि नास्तिक परंपरा तो बहुत पुरानी परंपरा है. वो कब से मार्क्स के शिष्य बन गए.

लेकिन भगत सिंह ने अपने लेखों में मार्क्स को कोट किया है.

मार्क्स की बात छोड़िए. जिस व्यवस्था में लाखों लोगों को मार डाला गया. सोवियत व्यवस्था इतनी क्रूर व्यवस्था थी. बहुत से अच्छे लोग भी उसमें विश्वास करते थे. उसको कम्युनिकेशन गैप कहते हैं. जानकारी पूरी तरह से स्थान पर नहीं आ पाई.

भगत सिंह उस कम्युनिकेशन गैप के शिकार थे?

ज़रूर थे. कई मामलों में थे. मार्क्स को कई लोगों ने अच्छा माना. मैंने एक किताब की समीक्षा लिखी थी, किताब का नाम अभी याद नहीं आ रहा पायनियर में छपी है. तथ्य यही है कि वो राष्ट्रवादी थे. उनका साम्यवाद से कुछ लेना देना नहीं था.

मौजूदा सरकार कैसा काम कर रही है?

प्रधानमंत्री मोदी फ़ैसले लेने वाले प्रधानमंत्री हैं. इसके लिए हौसला चाहिए. कई तो सामाजिक आंदोलन के रूप में उनकी पहल हैं. उसके परिणाम बहुत समय लेते हैं. दस साल-बीस साल. उन्होंने जोखिम भरे कदम लिए हैं. जैसे नोटबंदी को आप लें तो कोई कमज़ोर प्रधानमंत्री वो कदम नहीं उठा सकता था. और इस सरकार के मंत्रियों के बारे में कोई घोटाले जैसी बात भी नहीं कही गई है.

लेकिन विपक्ष गोरक्षा के मुद्दे पर घेर रहा है?

गोरक्षा होनी चाहिए. लेकिन उसके नाम हिंसा नहीं होनी चाहिए. अगर हिंसा होती है तो मुझे नहीं लगता कि प्रधानमंत्री या उनके कैबिनेट के लोग इसमें शामिल हैं. समाज है. हर समाज में विकृत बर्ताव वाले लोग होते हैं और उसका प्रतिकार भी सरकारी मशीनरी करती है. लेकिन उसका दोष प्रधानमंत्री या कैबिनेट पर नहीं लगाया जा सकता.

क्या आपने प्रधानमंत्री को सबसे बेहतर प्रधानमंत्री कहा था?

मैंने एक संपादकीय में लिखा था कि 'मोदी को बर्दाश्त करना सीखो.' मेरा ये दृढ़ विश्वास है कि मोदी पर विश्वास करके, उन पर लगातार आक्रमण न करके, हम उन्हें बर्दाश्त करना सीखेंगे तो देश का भला होगा. प्रधानमंत्री पूरी क्षमता से देश और समाज का काम करेंगे.

मिथक और विज्ञान को जोड़ने के प्रयासों पर आपका क्या सोचना है? प्रधानमंत्री गणेश की 'सर्जरी' का उदाहरण दे चुके हैं. सुश्रुत को बहुत लोग पहला सर्जन बताते हैं.

सुश्रुत सच में पहले सर्जरी करने वाले थे. इन चीज़ों को स्कूलों में पढ़ाया नहीं जाता. जानकारी के बीच में एक गैप है. इसकी जानकारी स्कूलों में बच्चों को होनी चाहिए.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में आप क्या सोचते हैं?

मैं कभी आरएसएस का सदस्य नहीं रहा. लेकिन मैं ये भी मानता हूं कि संघ के लोग बड़े ईमानदार लोग हैं. ऐसा हमेशा मानता रहा. बाकी नासमझ और समझदार हर विचारधारा में हैं.

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