सीएजी ने रेलवे के खाने को दिखाई लाल झंडी

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भारत के कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (सीएजी) ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय ट्रेन में खाने-पीने की व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी की है.

भारतीय रेल की 66 हज़ार किलोमीटर लंबी पटरियों पर हर दिन सवा दो करोड़ से ज़्यादा लोग सफ़र करते हैं.

ऐसे में सफ़र के दौरान अच्छे खाने-पीने की सुविधा की महत्वपूर्ण भूमिका है.

भारत में 7,200 से ज़्यादा रेल स्टेशन हैं.

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आइए जानते हैं कि सीएजी रिपोर्ट में ट्रेन पर खाने-पीने की व्यवस्था पर क्या बातें कहीं गई हैं.

1. ट्रेन नंबर 12583-आनंद विहार टर्मिनल डबल डेकर ट्रेन की संयुक्त जांच में पता चला कि एक यात्री को कटलेट खाते वक्त एक कील मिली थी.

2. रेलवे स्टेशनों में बेस किचन बनाने का मक़सद था ट्रेन में बेचे जा रहे खाने की गुणवत्ता की निगरानी रखना लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक रेलवे स्टेशनों में मात्र 16 बेस किचन थे जबकि 115 बेस किचन रेलवे स्टेशनों के बाहर थे और उनकी गुणवत्ता की जांच भी नहीं होती थी.

3. 74 स्टेशनों और 80 ट्रेनों की जांच में पाया गया कि स्टेशन और ट्रेन पर खाने पीने में सफ़ाई पर ध्यान नहीं दिया जाता था. कॉफ़ी, चाय और सूप जैसे पेय के लिए गंदा पानी सीधे नल से लिया जाता था. कहीं कूड़ेदान नहीं था या फिर उसे खाली नहीं किया जाता था. ये भी पाया गया कि खाद्य पदार्थों को मक्खी, मच्छर और गंदगी से बचाने के लिए ढँक कर नहीं रखा जाता था.

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4. ट्रेन नंबर 12033-34 की शिकायत पुस्तिका में एक यात्री के नाश्ते में कील की शिकायत दर्ज थी लेकिन इस शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई ये पुस्तिका में दर्ज नहीं था.

जांच में पाया गया कि दूरंतो ट्रेन की पैंट्री में कॉकरोच और चूहे थे. बोकारो स्टील स्टेशन पर बिक रहे फ़्लेवर्ड मिल्क की शेल्फ़ लाइफ़ खत्म हो चुकी थी. आगरा स्टेशन पर बिक रहे पेठे पर फंफूद थी.

पश्चिमी रेलवे के एक स्टेशन पर मलाई पनीर, चिकन और रिफ़ाइंड तेल की क्वालिटी खराब थी लेकिन कांट्रैक्टर के खिलाफ़ रेल प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की थी. कानपुर-दिल्ली-कानपुर ट्रेन पर 100 पराठे मिले, जो बिके नहीं थे और उनका दोबारा इस्तेमाल हो सकता था.

इन पुराने खाद्य पदार्थों को दोबारा बेचने या इस्तेमाल से रोका जा सके, इस की कोई प्रक्रिया नहीं थी.

5. जांच में पाया गया कि यात्रियों को खरीदे हुए सामान का बिल नहीं दिया जाता था.

6. ऑडिट में पता चला कि हालांकि भारतीय रेल में शिकायतों के निराकरण के लिए सिस्टम बने हैं, इसके बावजूद शिकायतों की संख्या में पिछले सालों में गिरावट नहीं आई है. ये भी देखा गया है कि शिकायतों का मुख्य कारण अधिक दाम और गुणवत्ता से जुड़े मामले हैं.

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7. जन शताब्दी के हर कोच में मिनी पैंट्री होती है जिसका इस्तेमाल यात्रियों को गर्म और ताज़ा खाने की आपूर्ति के लिए होना था लेकिन रिपोर्ट के अनुसार कोच की सीटों को हटाकर मिनी पैंट्री बनाने और उसके नहीं इस्तेमाल करने से रेलवे को करोड़ों का नुकसान हुआ.

8. नीति के मुताबिक पैंट्री कार में गैस बर्नर को हटाकर बिजली के चूल्हे को लाने का प्रावधान था लेकिन 2011 अप्रेल से मार्च 2016 तक 103 पैंट्री कार का निर्माण हुआ जिनमें केंद्रीयकरण एलपीजी सिलेंडर का प्रावधान था.

9. लंबी दूरी की कई ट्रेनों में पैंट्री कार का प्रावधान नहीं था. एक संयुक्त निरीक्षण में पाया गया कि 24 घंटों से ज़्यादा दूरी की नौ ट्रेन में पैंट्री कार नहीं है.

रिपोर्ट में उत्तर पूर्वी रेल की गोरखपुर-लोकमान्य तिलक टर्मिनस एक्सप्रेस का ज़िक्र है जो 1710 किलोमीटर का सफ़र 36 घंटों में करती है लेकिन उसमें एक भी पैंट्री कार नहीं है और यात्रियों को अनाधिकृत विक्रेताओं से खाने पीने का सामान खरीदना पड़ता है.

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